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अवध में नवाबों ने घोला था होली पर गंगा-जमुनी तहजीब का रंग

Wed, 20 Mar 2019 01:31 AM IST
sahaj sahaj न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ Published by: sahaj sahaj Updated Wed, 20 Mar 2019 01:31 AM IST
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The nawabs of lucknow were the founder of holi with GANGA-JAMUNI culture
holi
लखनऊ की होली अन्य जगहों से अलग है। यहां नवाबों ने घोला था गंगा-जमुनी तहजीब का रंग। मजहब की दीवारें भी यहां होली के रंगों में गुम हो जाती हैं। गली-मोहल्लों और चौराहों पर जलती होलिका, हर मोहल्ले में रंगे-पुते चेहरों संग गुजरते होरियारे। चौक में होली का रंग तो राजा बाजार में गुझिया की मिठास के साथ होली। यहां की होली में समाज का हर वर्ग शरीक होता है। वरिष्ठ इतिहासकर रवि भट्ट बताते हैं कि लखनऊ की होली को नवाबी दौर में नई पहचान मिली। 1775 में जब फैजाबाद से राजधानी बदलने के दौरान नवाब आसिफुद्दौला ने लखनऊ में राजधानी का ठिकाना बनाया तो उन्होंने दरबारियों संग फूलों के रंग होली खेलने की परंपरा और मजबूत की। वे खुद भी उन रंगों से होली खेलते थे और उनके दरबारी भी। नवाब सआदत अली खां केजमाने में होली का ये रंग और गाढ़ा हुआ। उन्होंने बाकायदा होली के लिए अलग राशि का प्रबंध करवाया। नवाब वाजिद अली शाह केसमय तक फूलों के रंगों से होली खेलने का रिवाज घर कर गया। गंगा जमुनी तहजीब की यही होली लगातार जारी रही। आज जो चौक, चौपटियां राजा बाजार इलाकों में देखते हैं वो उसी होली की परंपरा का स्वरूप है। हिंदू भाई होली खेलते हैं और जब मुस्लिम इलाकों से गुजरते हैं तो वे वहां इत्र छिड़ककर मुंह मीठा कर स्वागत करते हैं।
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हांडी फोड़ प्रतियोगिता में दिखता है सौहार्द
मलिहाबाद में होली पर हिंदू-मुस्लिम सौहार्द देखने को मिलता है। होरियारे युवाओं की टोलियां दो धड़ों में बंटकर हांडी फोड़ प्रतियोगिता का आयोजन करती हैं। विजेता युवाओं को कमेटी द्वारा तय की गई धनराशि नगर पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि अहसान अजीज देकर हौसला बढ़ाते हैं। गौशाला परिवार द्वारा ग्रामीण क्षेत्र से होरिहरों की टीमें बुलाई जाती हैं। जो दिन भर गीतों से लोगों का मनोरंजन करती हैं। प्रबंधक उमाकांत गुप्ता बताते है कि यह परंपरा बहुत ही पुरानी है। प्राचीन काल से पक्का तालाब के किनारे बैठकर होरियारों द्वारा छंद गीत प्रस्तुत किए जाते रहे हैं।
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