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Lucknow News: माध्यमिक स्कूलों में मानवाधिकार शिक्षा का अधूरा परिदृश्य
Fri, 30 May 2025 02:16 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
Updated Fri, 30 May 2025 02:16 AM IST
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- राज्य बोर्ड के स्कूलों में प्रशिक्षण की कमी, सीबीएसई-आईसीएसई में बेहतर स्थिति
- लोहिया विधि विश्वविद्यालय के शोध में सामने आए अहम तथ्य, 13 जिलों में हुआ फील्ड सर्वे
संवाद न्यूज एजेंसी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में मानवाधिकार शिक्षा अभी भी केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित है। राज्य बोर्ड से संबद्ध स्कूलों में न तो शिक्षक प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था है और न ही विषय को व्यावहारिक स्तर पर अपनाया गया है। इसके विपरीत, सीबीएसई बोर्ड और आईसीएसई से संबद्ध संस्थानों में इस शिक्षा का अपेक्षाकृत बेहतर समावेश पाया गया है। विशेष रूप से यह देखा गया कि जिन विद्यार्थियों को मानवाधिकार शिक्षा से व्यवस्थित रूप से अवगत कराया गया, उनमें आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति की क्षमता अधिक विकसित हुई।
यह खुलासा लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में संचालित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के शोध में हुआ है, जिसे डॉ. अपर्णा सिंह के नेतृत्व में संचालित किया जा रहा है। इस शोध में 13 जिलों के 492 विद्यार्थियों, 84 शिक्षकों, 56 प्रशासनिक अधिकारियों और आठ एनजीओ प्रतिनिधियों से संवाद के माध्यम से आंकड़े जुटाए गए हैं।
डॉ. सिंह ने बताया कि अब तक चार अध्याय पूरे हो चुके हैं, जिनमें भारतीय दर्शन आधारित मानवाधिकार शिक्षा की रूपरेखा, राज्य की माध्यमिक शिक्षा प्रणाली की समीक्षा, वर्तमान शैक्षणिक व्यवस्था में मानवाधिकार शिक्षा की स्थिति और अन्य बोर्डों में प्रस्तावित पाठ्यक्रम शामिल हैं। आगे के अध्यायों में डाटा विश्लेषण और निष्कर्ष पर कार्य जारी है।
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संवेदनशील, जागरूक और न्यायप्रिय नागरिकों के निर्माण की प्रक्रिया है मानवाधिकार शिक्षा
डॉ. अपर्णा सिंह ने बताया कि मानवाधिकार शिक्षा केवल एक विषय नहीं, बल्कि यह संवेदनशील, जागरूक और न्यायप्रिय नागरिकों के निर्माण की प्रक्रिया है। यह परियोजना शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाने की दिशा में एक सशक्त प्रयास है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार शिक्षा कार्यक्रम की दिशा में ठोस कदम है। विश्वविद्यालय की ओर से गठित अनुश्रवण व मूल्यांकन समिति में जून माह में इस शोध की प्रगति रिपोर्ट पर विस्तृत चर्चा प्रस्तावित है। उल्लेखनीय है कि यह परियोजना उच्च शिक्षा विभाग की वित्तीय सहायता से संचालित की जा रही है।
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- लोहिया विधि विश्वविद्यालय के शोध में सामने आए अहम तथ्य, 13 जिलों में हुआ फील्ड सर्वे
संवाद न्यूज एजेंसी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में मानवाधिकार शिक्षा अभी भी केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित है। राज्य बोर्ड से संबद्ध स्कूलों में न तो शिक्षक प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था है और न ही विषय को व्यावहारिक स्तर पर अपनाया गया है। इसके विपरीत, सीबीएसई बोर्ड और आईसीएसई से संबद्ध संस्थानों में इस शिक्षा का अपेक्षाकृत बेहतर समावेश पाया गया है। विशेष रूप से यह देखा गया कि जिन विद्यार्थियों को मानवाधिकार शिक्षा से व्यवस्थित रूप से अवगत कराया गया, उनमें आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति की क्षमता अधिक विकसित हुई।
यह खुलासा लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में संचालित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के शोध में हुआ है, जिसे डॉ. अपर्णा सिंह के नेतृत्व में संचालित किया जा रहा है। इस शोध में 13 जिलों के 492 विद्यार्थियों, 84 शिक्षकों, 56 प्रशासनिक अधिकारियों और आठ एनजीओ प्रतिनिधियों से संवाद के माध्यम से आंकड़े जुटाए गए हैं।
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डॉ. सिंह ने बताया कि अब तक चार अध्याय पूरे हो चुके हैं, जिनमें भारतीय दर्शन आधारित मानवाधिकार शिक्षा की रूपरेखा, राज्य की माध्यमिक शिक्षा प्रणाली की समीक्षा, वर्तमान शैक्षणिक व्यवस्था में मानवाधिकार शिक्षा की स्थिति और अन्य बोर्डों में प्रस्तावित पाठ्यक्रम शामिल हैं। आगे के अध्यायों में डाटा विश्लेषण और निष्कर्ष पर कार्य जारी है।
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संवेदनशील, जागरूक और न्यायप्रिय नागरिकों के निर्माण की प्रक्रिया है मानवाधिकार शिक्षा
डॉ. अपर्णा सिंह ने बताया कि मानवाधिकार शिक्षा केवल एक विषय नहीं, बल्कि यह संवेदनशील, जागरूक और न्यायप्रिय नागरिकों के निर्माण की प्रक्रिया है। यह परियोजना शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाने की दिशा में एक सशक्त प्रयास है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार शिक्षा कार्यक्रम की दिशा में ठोस कदम है। विश्वविद्यालय की ओर से गठित अनुश्रवण व मूल्यांकन समिति में जून माह में इस शोध की प्रगति रिपोर्ट पर विस्तृत चर्चा प्रस्तावित है। उल्लेखनीय है कि यह परियोजना उच्च शिक्षा विभाग की वित्तीय सहायता से संचालित की जा रही है।