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UP News: स्वामी प्रसाद मौर्य ने सपा महासचिव के पद से दिया इस्तीफा, भेदभाव का लगाया आरोप
Tue, 13 Feb 2024 08:47 PM IST
ishwar ashish
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Tue, 13 Feb 2024 08:47 PM IST
सार
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने सपा नेतृत्व पर अपने बयानों को लेकर भेदभाव करने का आरोप लगाया है।
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सपा एमएलसी स्वामी प्रसाद मौर्य।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
पूर्व कैबिनेट मंत्री व एमएलसी स्वामी प्रसाद मौर्या ने सपा के राष्ट्रीय महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर दलितों व पिछड़ों को उचित भागीदारी न देने समेत कई गंभीर आरोप लगाए हैं। लेकिन, अंदरखाने माना जा रहा है कि वे राज्यसभा के टिकट वितरण से नाराज चल रहे हैं। उनके इस्तीफे को सपा नेतृत्व पर दबाव की राजनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।
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सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को भेजे त्यागपत्र में उन्होंने कहा है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर और डॉ. राममनोहर लोहिया समेत सामाजिक न्याय के पक्षधर महापुरुषों ने 85 बनाम 15 का नारा दिया था। लेकिन, समाजवादी पार्टी इस नारे को लगातार निष्प्रभावी कर रही है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी बड़ी संख्या में प्रत्याशियों का पर्चा व सिंबल दाखिल होने के बाद अचानक प्रत्याशियों को बदला गया। इसके बावजूद वह पार्टी का जनाधार बढ़ाने में सफल रहे। विधानसभा के अंदर पार्टी को 45 से 110 पर पहुंचा दिया।
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अखिलेश यादव को भेजे गए इस्तीफा पत्र में उन्होंने कहा कि जबसे मैं सपा में शामिल हुआ तब से ही पार्टी का जनाधार बढ़ाने की कोशिश की है। यही कारण है कि जिस सपा के पास पहले सिर्फ 45 विधायक थे वहीं विधानसभा चुनाव 2022 के बाद यह संख्या 110 हो गई।
उन्होने कहा कि मैंने पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए अपने तरीके से प्रयास किए। इसी क्रम में मैंने आदिवासियों, दलितों व पिछड़ों को जो जाने-अनजाने भाजपा के मकड़जाल में फंसकर भाजपामय हो गए उनके सम्मान व स्वाभिमान को जगाकर व सावधान कर वापस लाने की कोशिश की।
इस पर पार्टी के कुछ छुटभईये नेताओं ने इसे मौर्य जी का निजी बयान कहकर धार कुंद करने का प्रयास किया। मुझे हैरानी तब हुई जब पार्टी के वरिष्ठतम नेता इस पर चुप रहे। उन्होंने कहा कि पार्टी के कुछ राष्ट्रीय महासचिव का बयान पार्टी का होता है जबकि मेरा बयान निजी हो जाता है। ऐसे में इस भेदभावपूर्ण और महत्वहीन पद पर रहने का कोई औचित्य नहीं। मैं पार्टी महासचिव के पद से इस्तीफा दे रहा हूं। कृपया इसे स्वीकार करें।
संज्ञानार्थ,@yadavakhilesh@samajwadiparty pic.twitter.com/SYPBhEvhe8
— Swami Prasad Maurya (@SwamiPMaurya) February 13, 2024
सपा को धन्यवाद भी दिया
त्यागपत्र में उन्होंने खुद को सपा का महासचिव और एमएलसी बनाने के लिए सपा अध्यक्ष को धन्यवाद भी दिया। खुद के सुझावों को न माने जाने की पीड़ा रखते हुए कहा कि जनवरी-फरवरी 2023 में उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को जातीय जनगणना समेत अहम मुद्दों पर प्रदेश में रथयात्रा निकालने का सुझाव दिया था। लेकिन, इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
स्वामी प्रसाद ने त्यागपत्र में कहा है कि पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों को भाजपा के मकड़जाल से निकालने की कोशिश की तो पार्टी के कुछ छुटभैये और कुछ बड़े नेता इसे ''मौर्या का निजी बयान'' बताकर संघर्ष की धार को कुंद करने की कोशिश कर रहे हैं। यहां उन्होंने किसी का नाम तो नहीं लिया है, लेकिन माना जा रहा है कि उनका इशारा सपा के प्रमुख महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव, महासचिव शिवपाल यादव और विधानसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक मनोज पांडे की ओर है।
स्वामी प्रसाद लिखते हैं कि कुछ राष्ट्रीय महासचिव का हर बयान पार्टी का हो जाता है, जबकि उनका निजी, यह समझ से परे है। जबकि, उनके इन बयानों से ही दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों का रुझान सपा की तरफ बढ़ा है। अगर राष्ट्रीय महासचिव पद में भी भेदभाव है, तो ऐसे भेदभावपूर्ण और महत्वहीन पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। अंत में उन्होंने कहा है कि पद के बिना भी वह पार्टी को सशक्त बनाने के लिए तत्पर रहेंगे।
स्वामी प्रसाद ने त्यागपत्र में कहा है कि पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों को भाजपा के मकड़जाल से निकालने की कोशिश की तो पार्टी के कुछ छुटभैये और कुछ बड़े नेता इसे ''मौर्या का निजी बयान'' बताकर संघर्ष की धार को कुंद करने की कोशिश कर रहे हैं। यहां उन्होंने किसी का नाम तो नहीं लिया है, लेकिन माना जा रहा है कि उनका इशारा सपा के प्रमुख महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव, महासचिव शिवपाल यादव और विधानसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक मनोज पांडे की ओर है।
स्वामी प्रसाद लिखते हैं कि कुछ राष्ट्रीय महासचिव का हर बयान पार्टी का हो जाता है, जबकि उनका निजी, यह समझ से परे है। जबकि, उनके इन बयानों से ही दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों का रुझान सपा की तरफ बढ़ा है। अगर राष्ट्रीय महासचिव पद में भी भेदभाव है, तो ऐसे भेदभावपूर्ण और महत्वहीन पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। अंत में उन्होंने कहा है कि पद के बिना भी वह पार्टी को सशक्त बनाने के लिए तत्पर रहेंगे।