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बजट में सीएम ने धीरे से दिया जोर का झटका!

Sat, 28 Feb 2015 01:52 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 28 Feb 2015 01:52 AM IST
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Subsidy reduced by Akhilesh in UP Budget.

अखिलेश सरकार भले ही रोटी-कपड़ा सस्ता, दवा-पढ़ाई मुफ्त के नारे को बुलंद कर सत्ता में आई है लेकिन 2015-16 के बजट में उसने बेहद होशियारी से सब्सिडी पर कैंची चला दी है।

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दरअसल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सब्सिडी आधारित व्यवस्था को समाप्त करने का चौतरफा दबाव है। ऐसे में यूपी सरकार ने अगले साल के बजट में सब्सिडी की राशि को पिछले साल की तुलना में 1.24 फीसदी कम करना ही मुनासिब समझा है।
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शुक्रवार को संसद में पेश देश के आर्थिक सर्वेक्षण में भी यह बात साफ तौर पर कही गई है कि सब्सिडी से गरीबों के जीवन स्तर में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। संकेत साफ हैं कि केंद्र के साथ ही राज्यों पर सब्सिडी व्यवस्था पर पुनर्विचार करने का भारी दबाव है।
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अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि सब्सिडी पर पुनर्विचार समय की जरूरत है। हाल के वर्षों में यह पहला मौका है जब यूपी में सब्सिडी का बजट बढ़ाने के बजाय घटाया गया है। यह आकलन सहायता अनुदान को छोड़कर सिर्फ सब्सिडी से जुड़े बजट का है।

इन योजनाओं पर दी जा रही है सब्सिडी

Subsidy reduced by Akhilesh in UP Budget.

सामाजिक जिम्मेदारी के नाम पर प्रदेश में फिलहाल बड़े पैमाने पर सब्सिडी से जुड़ी योजनाएं चल रही हैं। इनमें खाद, बीज, खाद्यान्न, केरोसिन, रसोई गैस, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन व खेती-किसानी के प्रोत्साहन से जुड़ी तमाम योजनाएं शामिल हैं।

कई योजनाएं केंद्र की मदद से चलती हैं तो प्रदेश अपने स्तर पर भी तमाम कार्यक्रम चला रहा है। 2014-15 के बजट में सरकार ने 8343.47 करोड़ रुपये की सब्सिडी की योजना पेश की थी।

यह 2013-14 में प्रस्तावित सब्सिडी से 23.89 फीसदी ज्यादा थी। बाद में 2014-15 के पुनरीक्षित बजट का मौका आया तो सब्सिडी का आंकड़ा 9093.95 करोड़ पंहुच गया, लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गत 24 फरवरी को जब 2015-16 का बजट पेश किया तो इसमें चालू वित्त वर्ष के मुकाबले सब्सिडी रकम 1.24 फीसदी कम कर दी। बहरहाल अभी सरकारी खजाने पर 8240.38 करोड़ रुपये सब्सिडी का बोझ है।

सब्सिडी पर नए सिरे से सोचने की जरूरत

Subsidy reduced by Akhilesh in UP Budget.

लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर मनोज अग्रवाल कहते हैं कि वोट की खातिर खैरात बांटकर लोगों को पंगु बनाने की अर्थनीति वर्षों से चलती आ रही है।

अर्थनीति से लेकर समाजनीति से जुड़े लोग समय-समय पर सब्सिडी की सियासत पर चिंता जताते रहे हैं, पर किसी ने नहीं सुनी। नतीजतन सब्सिडी पाने वाले गरीब आज भी गरीब बने हुए हैं और सब्सिडी सिस्टम से जुड़े लोग मालामाल होते जा रहे हैं। सब्सिडी पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

मसलन, गरीबों को राशन, केरोसिन और रसोई गैस जैसी तमाम तरह की सब्सिडी में अब भी किस-किस तरह की सब्सिडी चाहिए? फिर जो सब्सिडी अपरिहार्य हो, उसका लाभ सिर्फ पात्र ही पाएं, इसका स्पष्ट मैकेनिज्म होना चाहिए।

इस लिहाज से डीबीटीएल (सीधे खाते में भुगतान) अच्छी पहल है। जेटली ने सब्सिडी की सच्चाई को कुबूलकर और यूपी सरकार ने इस ओर कदम बढ़ाकर अच्छी पहल की है। यह आज की जरूरत है।

इन वर्षों में इस तरह दी सब्सिडी

Subsidy reduced by Akhilesh in UP Budget.

वित्त वर्ष--सब्सिडी
2012-13--5963.69 (वास्तविक आंकड़े)
2013-14--6607.87 (वास्तविक आंकड़े)
2014-15--9093.95 (पुनरीक्षित अनुमान)
2015-16--8240.38  (बजट अनुमान)
(आंकड़े करोड़ रुपये में)
स्रोत: प्रदेश सरकार के अनुदानवार अनुमानों पर स्मृति पत्र 2014 व 2015 से।

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