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वह बड़ा लेखक, जो खरीद पाया सिर्फ एक किताब, वह भी सेकंड हैंड, पढ़ें पूरा मामला

Fri, 17 May 2019 05:24 PM IST
Amulya Rastogi अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Fri, 17 May 2019 05:24 PM IST
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story related to writer manohar shyam joshi
मनोहर श्याम जोशी

प्रख्यात लेखक मनोहर श्याम जोशी उन दिनों लखनऊ में रहते थे। उनका कॉफी हाउस में उठना-बैठना शुरू हुआ तो उन्हें महसूस हुआ कि उनके दिमाग में अभी तक भावुकता का भूसा ही भरा हुआ है। दिमागी सेहत के लिए जरूरी है कि इसे निकाल बाहर किया जाए। अमृतलाल नागर ने भी उन्हें ‘इंटेलैक्चुअलता’ में दीक्षित होने की हिदायत दी।

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कुछ बुजुर्ग साहित्यकारों को जोशी के ‘इंटेलैक्चुअल’ बनने की कोशिश का पता चला तो उन्होंने चुटकी लेनी शुरू कर दी। जोशी जहां मिलते उनसे कहते, ‘तुमने अमुक किताब पढ़ी है बरखुर्रदार?’ जोशीजी के मुंह से जैसे ही ‘नहीं’ निकलता तो वे कहते, ‘फिर तुमने क्या पढ़ा?’
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लखनऊ मेरा लखनऊ के एक संस्मरण से पता चलता है, ‘बेचारे जोशी जी! जेब में तो पैसे रहते नहीं थे। ऊपर से ‘इंटेलैक्चुअल’ बनने की धुन। कहीं से ढूंढकर उस किताब को पढ़ते। फिर उसे कुछ दिन बगल में दबाए घूमते ताकि उनकी ‘इंटेलैक्चुअलता’ पर शक न हो।’

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हजरतगंज आते तो ‘आक्सफोर्ड बुकडिपो’ में घुस जाते

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मनोहर श्याम जोशी

इस चक्कर में जोशी लखनऊ विवि के रवींद्र नाथ टैगोर पुस्तकालय और अमीरुद्दौला पुस्तकालय में घंटों गुजारते। वहां किताबें पढ़ते। हजरतगंज आते तो ‘आक्सफोर्ड बुकडिपो’ में घुस जाते और वहां आई नई किताबों को उलट-पलटकर देखते। उनके पन्ने खोलकर पढ़ते और उन्हें दिमाग में बैठाने की कोशिश करते।

तब  ‘आक्सफोर्ड बुकडिपो’ में लंदन से जान लेह्मान के संपादन में प्रकाशित पत्रिका ‘पेनगुइन न्यू राइटिंग’ भी बिक्री के आती थी। पैसे न होने से जोशी इस पत्रिका को दुकान में ही पूरी पढ़ जाने का प्रयास करते थे। जिस पर एक बार दुकानदार ने आपत्ति भी कर दी। बेचारे! जोशी जी लखनऊ में केवल एक किताब खरीद पाए और वह भी सेकंड हैंड। किताब के लेखक थे ‘चार्ल्स डिकेन्स।’ और किताब का नाम था, ‘’स्केचेज बाइ बॉज।’

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