अगस्त क्रांति पर कुछ यूं धरी रह गई अंग्रेजों की सारी चौकसी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
महात्मा गांधी के आह्वान पर 9 अगस्त, 1942 को पूरे देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा हुई। इसे अगस्त क्रांति दिवस के नाम से भी जाना जाता है। लखनऊ में भी आंदोलन की जबरदस्त तैयारी थी। अंग्रेजों को भनक लगी तो उन्होेंने लखनऊ में धारा 144 लगाते हुए अमीनाबाद का झंडे वाला पार्क और घंटाघर पार्क की सुरक्षा बलों से घेराबंदी करा दी ताकि कोई आंदोलनकारी पार्कों में प्रवेश न कर सके।
सुबह होते ही पुलिस ने कांग्रेस के नगर, जिला और प्रांतीय कार्यालयों पर छापेमारी शुरू कर दी। पूरा रिकॉर्ड जब्त कर लिया और दफ्तरों में ताले डलवा दिए। लखनऊ के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट मिस्टर ल्यूइस लॉइड खुद सड़कों पर घूम रहे थे।
‘क्रांति आंदोलन : कुछ अधखुले पन्ने’ के संस्मरण से पता चलता है, ‘अंग्रेज सोच रहे थे कि उन्होंने आजादी के आंदोलनकारियों की रणनीति विफल कर दी है। तभी अचानक अमीनाबाद की गलियों में हलचल शुरू हुई।
पकड़े जाने लगे सड़कों पर चलते लोग
सुरक्षा बल कुछ समझते तब तक भारी भीड़ सड़कों पर उतर आई। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नारे लगाते हुए लोग प्रदर्शन करने लगे। अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी शुरू कर दी। सड़कों पर चलते लोग पकड़े जाने लगे।
इसी बीच, उमा नारायण वाजपेयी और छात्र नेता जगदीश नारायण त्रिवेदी कूदकर पार्क के अंदर पहुंच गए और ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नारे लगाने लगे। डिप्टी एसपी ओंकार सिंह ने पुलिस को वाजपेयी व त्रिवेदी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। इन्हें पकड़ा जा रहा था कि पता नहीं कहां से फेंका गया एक पत्थर आकर ओंकार सिंह के माथे पर लगा और खून निकलने लगा। इसके बाद पूरी व्यवस्था तितर-बितर हो गई और अंग्रेजों की चौकसी धरी रह गई।’