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जब सहित्यकार जोशी जी बन गए ‘कल के वैज्ञानिक’, पढ़ें- ये मजेदार वाक्या
Fri, 26 Apr 2019 04:15 PM IST
Amulya Rastogi
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Fri, 26 Apr 2019 04:15 PM IST
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मनोहर श्याम जोशी
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वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, कहानीकार मनोहर श्याम जोशी को लखनऊ विश्वविद्यालय ने उनके शोधपत्र के लिए ‘कल का वैज्ञानिक’ घोषित किया था। इसका किस्सा काफी मजेदार है। प्रदेश सरकार में उस समय शिक्षा मंत्री डॉ. संपूर्णानंद थे। उन्होंने प्रत्येक विश्वविद्यालय से एक-एक ‘कल का वैज्ञानिक’ चुनने और उसे 200 रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की।
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‘लखनऊ मेरा लखनऊ’ पुस्तक के संस्मरण से पता चलता है, ‘उन्होंने उन पुस्तकों को पढ़कर उनके तथ्यों पर शोध लिख डाला और उस पर एक निहायत साहित्यिक शीर्षक जड़ दिया, ‘रोमांस ऑफ द इलेक्ट्रॉन्स।’ अपने एक साथी की मदद से उस पर सुंदर चित्र बनवा लिए।
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पर, इसकी एवज में उन्हें अपने उस साथी को कुछ दिनों के लिए अपनी रेसिंग साइकिल देनी पड़ी। तमाम शोधपत्र पढ़ने के बाद निर्णायक प्रोफेसर साहब ने दो शोध पसंद किए। एक जोशी जी का और दूसरा एक अन्य लड़के का जो आगे चलकर बड़ा वैज्ञानिक बना तथा अमेरिका में काफी नाम कमाया।
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जब प्रोफेसर ने डपटते हुए जोशी जी से पूछा- ‘कहां से लिख लाए’
मनोहर श्याम जोशी
बहरहाल प्रोफेसर साहब ने दोनों लोगों को बुलाया और उन्होंने डपटते हुए जोशी जी से पूछा, ‘कहां से लिख लाए।’ जोशी जी घबरा गए और सच बता दिया। प्रोफेसर साहब खुश हुए और उन्होंने उनसे आइंस्टीन और नील्स बोहर के बारे आसान सवाल पूछकर प्रक्रिया पूरी कर ली।
अब बारी आई दूसरे लड़के की तो उसने प्रोफेसर साहब के सवाल पर कहा, ‘लखनऊ के ऊपर के अयनमंडल पर यह शोधपत्र मैंने स्वयं के प्रयोग करके लिखा है।’ प्रोफेसर साहब बोले, ‘झूठ बोलते हो। तुम्हारा भाई रिसर्च स्कॉलर है, उससे लिखवाया है।’ जोशी जी की सच्चाई से खुश प्रोफेसर साहब ने उन्हें ‘कल का वैज्ञानिक’ घोषित कर दिया।
अब बारी आई दूसरे लड़के की तो उसने प्रोफेसर साहब के सवाल पर कहा, ‘लखनऊ के ऊपर के अयनमंडल पर यह शोधपत्र मैंने स्वयं के प्रयोग करके लिखा है।’ प्रोफेसर साहब बोले, ‘झूठ बोलते हो। तुम्हारा भाई रिसर्च स्कॉलर है, उससे लिखवाया है।’ जोशी जी की सच्चाई से खुश प्रोफेसर साहब ने उन्हें ‘कल का वैज्ञानिक’ घोषित कर दिया।