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जब जवानी में ही निकलवाने पड़े पूर्व मुख्यमंत्री को पूरे दांत, जानें- पूरा मामला
Tue, 29 Oct 2019 04:23 PM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Tue, 29 Oct 2019 04:23 PM IST
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चंद्रभानु गुप्त
चंद्रभानुु गुप्त प्रदेश के ऐसे नेता थे जो मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भी अपने निजी आवास में रहते थे और अपनी निजी कार से चलते थे। बात उन दिनों की है जब महात्मा गांधी ने 9 अगस्त 1942 से करो या मरो नारे के साथ ‘अंग्रेजों भारत छोड़ों’ आंदोलन का शंखनाद किया। देश भर में आंदोलन शुरू हो गया।
लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘खून का बदला’ नारा लगा दिया। गांधी जी ने ‘करेंगे या मरेंगे’ नारा दिया था परंतु छात्रों ने ‘मारेंगे या मरेंगे’ नारे के साथ अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया। चंद्रभानु गुप्त पर पुस्तक ‘सफर कहीं रुका नहीं, झुका नहीं’ में इस सिलसिले में गुप्त जी ने खुद एक संस्मरण लिखा है, ‘उस समय मैं अस्वस्थ था, लेकिन अंग्रेजों का अत्याचार सुनकर रहा नहीं गया।
आंदोलन में शामिल होने के लिए अमीनाबाद पहुंचा और मुझे शहर कोतवाल ओंकार सिंह ने गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले मुझे जेल में ‘ए’ क्लास दिया जाता था, लेकिन उस बार सभी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया। यहां तक अगस्त की भीषण गर्मी में भी बाहर खुले में सोने की इजाजत नहीं मिली।
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लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘खून का बदला’ नारा लगा दिया। गांधी जी ने ‘करेंगे या मरेंगे’ नारा दिया था परंतु छात्रों ने ‘मारेंगे या मरेंगे’ नारे के साथ अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया। चंद्रभानु गुप्त पर पुस्तक ‘सफर कहीं रुका नहीं, झुका नहीं’ में इस सिलसिले में गुप्त जी ने खुद एक संस्मरण लिखा है, ‘उस समय मैं अस्वस्थ था, लेकिन अंग्रेजों का अत्याचार सुनकर रहा नहीं गया।
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आंदोलन में शामिल होने के लिए अमीनाबाद पहुंचा और मुझे शहर कोतवाल ओंकार सिंह ने गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले मुझे जेल में ‘ए’ क्लास दिया जाता था, लेकिन उस बार सभी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया। यहां तक अगस्त की भीषण गर्मी में भी बाहर खुले में सोने की इजाजत नहीं मिली।
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अंग्रेज अफसरों ने किया काफी उत्पीड़न
हम लोगों ने जब बैरकों में जाने से इन्कार कर दिया तो जेल अधिकारियों ने लाठीचार्ज करा दिया और हम सभी को जबरन काल कोठरी में ठूंस दिया गया। मेरे साथ हरिहर नाथ शास्त्री, हरिश्चंद्र वाजपेयी तथा राजाराम शास्त्री भी थे। अंग्रेज अफसरों ने सबसे ज्यादा उत्पीड़न मेरा ही किया।
मुझे दांत साफ करने के लिए दातून का भी उपयोग करने की इजाजत नहीं मिली। अखबार और मुलाकातें भी बंद करा दी गईं। इससे मेरे दांतों में भयानक पायरिया हो गया और मुझे रिहा होने पर अपने सभी दांत निकलवाने पडे़े।
मुझे दांत साफ करने के लिए दातून का भी उपयोग करने की इजाजत नहीं मिली। अखबार और मुलाकातें भी बंद करा दी गईं। इससे मेरे दांतों में भयानक पायरिया हो गया और मुझे रिहा होने पर अपने सभी दांत निकलवाने पडे़े।