भयावह हादसे ने तबाह कर दी इन बच्चों की जिंदगी, आज भी रिसता है दर्द
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सपना था क्रिकेटर बनने का, लेकिन छत पर फंसी बॉल निकालने के दौरान हाई टेंशन लाइन के तेज झटके ने पूरे सपने को चकनाचूर कर दिया। बस इतना याद है कि मैं और मेरा दोस्त बॉल निकालने गए थे। अचानक एक झटका लगा और उसके बाद कुछ नहीं पता चला। जब होश आया तो अस्पताल में था और बेतहाशा दर्द हो रहा था।
बुआ और मां सामने खड़ी थी उनके आंखों के आंसू ने ये आभास करा दिया कि मैं अब खेल नहीं पाऊंगा। दोस्त के बारे में भी पता चला तो दिल दहल गया। आज करीब पांच साल होने को है और एचटी लाइन के झटके के साथ अपने अजीज दोस्त से मुलाकातों का सिलसिला भी बंद है।
11 जून 2011 को बिजली के झटके ने जिंदगी तो तबाह कर दी। घर परिवार और आसपास के लोगों के प्यार और सहयोग ने हमको जिंदादिल इंसान बना दिया है, जिसकी बदौलत जिंदगी जी रहे हैं। पांच साल पहले मिला दर्द आज भी आंसू बनकर बहता है लेकिन अपनों के प्यार ने हमारी जिंदगी को नई रफ्तार दे दी है।
चिनहट के गौरव विहार कॉलोनी में एचटी लाइन के करंट से अपने हाथ-पैर गंवाने वाले बच्चों और उनके परिवारीजनों की दर्द भरी कहानी पर एक विशेष रिपोर्ट...
क्रिकेटर बनने का सपना था क्रिकेट की बॉल ने अपंग बना दिया
चिनहट के गौरव विहार कॉलोनी के अंकित यादव (20) मूलरूप से गोरखपुर के रहने वाले है। अंकित ने बताया कि फूफा अजय कुमार यादव और बुआ कमला देवी के साथ रहता था।
क्रिकेटर बनना सपना था और मैदान पर दोस्तों की बॉल को चौके-छक्के की बाउंड्री पर पहुंचाने के बाद जो खुशी मिलती थी उसका कोई सानी नहीं था। पिता राम कुवल यादव खेती करते थे। वर्ष 2010 में हार्ट अटैक में वो हमसे बिछड़ गए।
मां मनभावती देवी गांव में ही रहती थी। 11 जून 2011 को जब एचटी लाइन से करंट लगा तो जिंदगी तबाह हो गई। बिजली के करंट से दोनों हाथ और दाहिना पैर खो बैठा। क्रिकेट की बॉल ने अपंग बना दिया पर हिम्मत नहीं हारी। घटना के बाद मां मेरे पास आ गईं। करंट लगा तो जिंदगी बेपटरी हो गई। स्कूल छूटने के साथ समाज से भी अलग हो गया। अब घर के भीतर ही एक पैर के सहारे दौड़-भाग करते हैं।
मैंने अपना बहुत कुछ खो दिया, लेकिन चंचलता कम नहीं हुई। स्मार्ट फोन पर गेम खेलना और दोस्तों से हेडफोन की मदद से बात कर समय काटते हैं। अधिकतर समय अखबार और मैगजीन पढ़ते हैं। अब नौवीं क्लास में प्राइवेट एडमिशन लिया है। पढ़ाई पूरी करने की योजना बनाई है और कोशिश है कि पढ़-लिख लें ताकि हम भी किसी से पीछे नहीं रहे।
तपती गर्मी में टिन के नीचे कट रही जिंदगी
बिजली के झटके ने जिंदगी तबाह कर दी तो ईश्वर ने पिता का साया छिन लिया। फूफा और बुआ ने साथ दिया तो आज राजधानी में जिंदगी बसर हो रही है। अंकित जिस कमरे में रहते हैं वहां पर सीमेंट की चादर पड़ी है।
गर्मी जैसे बढ़ती है उसके साथ ही सीमेंट की चादर कमरे के भीतर आग उगलती है। पर जिंदगी को जो जख्म मिला है वो उस जख्म से वो गर्मी बेहद कम है, जिसकी वजह से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। अब जिंदगी जो है उसी के साथ जी रहे हैं और उम्मीद है आने वाले समय में बेहतर होगी।
बहुत चंचल और तेज है मेरा अंकित
अंकित की बुआ कमला देवी कहती हैं कि अंकित बहुत चंचल और पढ़ाई में तेज था। करंट ने उसे अपंग तो बना दिया लेकिन आज भी हमारे घर का सबसे तेज बच्चा है जो चीजों को तेजी से समझता है। मां ने आंख के पास आंचल लगाकर अपने आंसू तो रोक लिए लेकिन जिगर के टुकड़े ने मां के दिल और मन की बात समझ ली तो उसका चेहरा भी उतर गया।
हर राखी पर आंख से बहती है अश्रुधारा
अंकित की बहन कृष्णा और लक्ष्मी भाई को देखती हैं तो उनकी आंखों से आंसू छलक जाते हैं। कृष्णा स्कूल में पढ़ाकर घर परिवार के खर्च में सहयोग करती है तो छोटी बहन लक्ष्मी की पढ़ाई भी पूरी करवा रही है। दोनों बहनों ने बताया कि वो दिन बहुत अखरता है जब भाई की कलाई पर राखी बांधनी होती है, पर चाहकर भी नहीं सजा पाते। फिर भी हम इस त्यौहार पर एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी का इजहार करते हैं।
अधूरा ही रह गया इंजीनियर बनने का ख्वाब
चिनहट के अशरफ विहार के यशपाल सिंह का सपना इंजीनियर बनना था, पर क्रिकेट खेलने की दीवानगी और छत पर फंसी बॉल को निकालने के चक्कर में लोहे की रॉड और एचटी लाइन में चिपकने के बाद जो घाव मिले उससे पूरे ख्वाब अधूरे रह गए।
दोनों हाथ और बायां पैर हमेशा के लिए खो बैठा तो दाहिने पैर का पंजा बुरी तरह झुलस गया, लेकिन एक अंगुली बच गई। यशपाल बताते हैं कि क्रिकेट खेलना शौक था और इंजीनियर बनना सपना।
दोस्त के साथ छत पर फंसी बॉल निकालने के चक्कर में हादसे का शिकार हुआ और पूरी जिंदगी की तस्वीर ही बदल गई। यशपाल को टीवी पर मैच देखना, फैमिली पार्टी और मोबाइल में पैर के अंगुली की मदद से गेम खेलना पहली पसंद है। यशपाल सिंह बताते हैं कि टेंपल रन में मैंने रिकॉर्ड पॉइंट बनाए हैं और घर में कोई उसका पीछा नहीं कर पाया।
अधूरा ही रह गया इंजीनियर बनने का ख्वाब
चिनहट के अशरफ विहार के यशपाल सिंह का सपना इंजीनियर बनना था, पर क्रिकेट खेलने की दीवानगी और छत पर फंसी बॉल को निकालने के चक्कर में लोहे की रॉड और एचटी लाइन में चिपकने के बाद जो घाव मिले उससे पूरे ख्वाब अधूरे रह गए।
दोनों हाथ और बायां पैर हमेशा के लिए खो बैठा तो दाहिने पैर का पंजा बुरी तरह झुलस गया, लेकिन एक अंगुली बच गई। यशपाल बताते हैं कि क्रिकेट खेलना शौक था और इंजीनियर बनना सपना।
दोस्त के साथ छत पर फंसी बॉल निकालने के चक्कर में हादसे का शिकार हुआ और पूरी जिंदगी की तस्वीर ही बदल गई। यशपाल को टीवी पर मैच देखना, फैमिली पार्टी और मोबाइल में पैर के अंगुली की मदद से गेम खेलना पहली पसंद है। यशपाल सिंह बताते हैं कि टेंपल रन में मैंने रिकॉर्ड पॉइंट बनाए हैं और घर में कोई उसका पीछा नहीं कर पाया।
पिता बोले- पढ़ाई दिमाग और इच्छाशक्ति से होती है
यशपाल हादसे का शिकार हुए लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी। पापा श्रीकृष्ण कुमार सिंह शिक्षा विभाग में डीआईओएस हैं और मौजूदा समय में सुल्तानपुर में तैनात हैं। घटना के बाद मेरे पिता ने मुझे नया जीवन देने में अहम भूमिका निभाई।
उस वक्त वो कहते थे कि बेटा पढ़ाई दिमाग और मजबूत इच्छाशक्ति से होती है। बस इसी जज्बे ने मुझे मजबूत बनाया। जब घटना हुई तब मैं एलपीएस गोमतीनगर में आठवीं क्लास का स्टूडेंट था। पढ़ाई जारी रही और रानी लक्ष्मीबाई स्कूल बाराबंकी से दसवीं की परीक्षा 86 फीसदी जबकि बारहवीं परीक्षा 93 फीसदी अंकों के साथ पास की। अब बीए फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट हूं।
सपना है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ा सकूं और उनके सपनों को पूरा करने में मेरा योगदान रहे, जिससे मेरा सपना भी उड़ान भर सके। यशपाल 2011 में हुई घटना को याद करते हुए कहते हैं अंकित मेरा अजीत दोस्त था लेकिन घटना के बाद से कभी मुलाकात नहीं हुई। ये शब्द बोलते ही यशपाल का चेहरे का रंग बदल गया।
हैंड मेरा, माइंड मेरे प्यारे यशपाल का
मां पंकज सिंह बताती हैं कि मेरा यशपाल बहुत तेज तर्रार और होशियार है। बचपन में खराब चीज को बनाना और उसमें प्रयोग करना उसकी पहली पसंद थी। आज भी पंकज की वो कला उसके भीतर है।
हैंड मेरा होता था और माइंड उसका। बस जब हम दोनों साथ बैठते हैं तो जिंदगी फिर से खुशनुमा हो जाती है क्योंकि मेरा यशपाल उसी अंदाज में सब काम करता है जिस अंदाज में वो पहले करता था।
पूरा पढ़ डाला मैने कोर्ट का फैसला
यशपाल को पहले से पता था कि आज उनके साथ हुई घटना पर कोर्ट का फैसला आना है। भाई सतपाल सिंह ने बताया कि शाम को जब फैसला आया तो यशपाल ने कोर्ट का पूरा फैसला पढ़ा। इसके बाद अपने दोस्तों को व्हाट्एप पर मैसेज किया। फिर क्या था यशपाल के खास दोस्त लवलेश वर्मा और शिवम सिंह घर पहुंच गए और पिज्जा पार्टी के साथ इस जीत का जश्न मनाया गया।
बच्चे जिंदगी भर के लिए दूसरों पर निर्भर हो गए, बच नहीं सकता पॉवर कॉर्पोरेशन
क्रिकेट खेलते वक्त हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से दिव्यांग हुए दो बच्चों के मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने लापरवाही पर पॉवर कॉर्पोरेशन पर तल्ख टिप्पणी की। न्यायमूर्ति नारायण शुक्ल और न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह-प्रथम ने दोनों बच्चों को 60-60 लाख रुपये मुआवजे का आदेश देते हुए कहा कि इस हादसे की जिम्मेदारी लेने से पॉवर कॉर्पोरेशन बच नहीं सकता।
दोनों बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए यूपी पावर कॉर्पोरेशन उन्हें तत्काल 60-60 लाख रुपये मुआवजा दे। अदालत ने सख्त लहजे ने कहा, हादसे ने न केवल बच्चों की जिंदगी दूभर कर दी है बल्कि जीवन भर के लिए वे दूसरों पर निर्भर हो गए। भविष्य में उनके रोजगार पाने की संभावना भी खत्म हो गई।
चिनहट थाना क्षेत्र स्थित गौरव विहार कॉलोनी में 11 जून 2011 को हुए हादसे में 12 वर्षीय यशपाल सिंह और 14 वर्षीय अंकित कुमार यादव की जान बचाने के लिए उनके दोनों हाथ और एक पैर काटने पड़े। इस मामले में बच्चों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। इसमें राज्य सरकार और पॉवर कॉर्पोरेशन के अलावा चार अन्य को प्रतिवादी बनाया गया।
याचिका में कही गईं ये बातें
याचिका में बताया गया कि जख्मी होने पर यशपाल को उनकी बहन ऋचा लोहिया अस्पताल ले गयी, जहां से उसे केजीएमयू ले जाया गया। हालत बिगड़ने पर डॉक्टरों ने उनकी जान बचाने के लिए दोनों हाथ कंधे व कलाई से और एक एक पैर जांघ से काटे।
याचिका में कहा गया कि गैंगरीन के खतरे से तो बच गए लेकिन दोनों बच्चे जीवन के सभी आनंद और उल्लास को गंवा बैठे। यशपाल उस समय क्लास 8 एलपीएस का स्टूडेंट था और अंकित क्लास 10 का। अंकित के पिता नहीं हैं।
उसकी दो बहन और मां के पास आय का कोई साधन नहीं था। साथ ही याचिका में बताया गया कि खुली हुई हाईटेंशन लाइन कॉलोनी में डालने का यहां के निवासियों ने विरोध किया था, लेकिन उनकी कोई बात नहीं सुनी गई।
आधी राशि का बैंक में एफडी कराएं
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, 60-60 लाख में से 50 फीसदी रकम प्रत्येक बच्चे और उनके अभिभावक के संयुक्त नाम से लखनऊ के राष्ट्रीयकृत बैंक में फिक्स डिपॉजिट करना होगा। बालिग होने पर याचियों को यह राशि दी जाएगी।
शेष 50 फीसदी राशि दोनों बच्चों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए लखनऊ की स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में दीर्घकालीन फिक्स डिपॉजिट के तहत ब्याज पाने के लिए निवेश की जाएगी। इस राशि पर हर महीने बना ब्याज उसी बैंक शाखा में खोले गए दोनों याचियों के बचत खाते में ट्रांसफर किया जाएगा।
यह बचत खाता याचियों के नाम अलग-अलग होगा, जिसका संचालन याची और उनकेअभिभावक संयुक्त रूप से कर सकेंगे। हर महीने मिलने वाली इस राशि का उपयोग बच्चों की पढ़ाई, पौष्टिक भोजन और अटेंडेंट के भुगतान पर किया जा सकेगा।
मानसिक कष्ट और केस पर खर्च के लिए 4.5-4.5 लाख दें
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि इस घटना के कारण प्रत्येक याची के अभिभावक को पहुंचे मानसिक आघात और कष्ट की भरपाई के लिए चार लाख रुपये भी देने होंगे। प्रत्येक याची के अभिभावक को इस केस में होने वाले खर्च के तौर पर 50 हजार रुपये अलग से देने होंगे।
इतना ही नहीं कोर्ट ने बिजली विभाग के एमडी को निर्देश दिए हैं कि वे महानिदेशक (स्वास्थ्य) के परामर्श से दोनों याचियों को कृत्रिम या रोबोटिक लिम्ब लगवाने पर भी विचार करेंगे।
हाईटेंशन लाइन को आबादी के लिए बनाएं सुरक्षित
कोर्ट ने निर्देश दिए कि आबादी से गुजरने वाली हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइन से लोगों को किसी तरह के नुकसान से बचाव के लिए सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए जाएं।
बचाव में कहा, एक लाख मुआवजे का प्रावधान
बिजली विभाग और कॉरपोरेशन ने अपने बचाव में कहा कि दुर्भाग्य से बच्चों ने खुले तार छू लिए थे, इसमें बिजली निगम की गलती नहीं है। मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के एमडी ने कहा कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट के अनुसार पावर कारपोरेशन 1 लाख मुआवजा दे सकता है, याचिका के अनुसार नहीं।
जांच में साबित हुई गलती
हाईकोर्ट ने अगस्त 2014 में इस घटना की जांच के निर्देश पावर कॉर्पोरेशन एमडी को दिए थे। अपनी रिपोर्ट में बिजली संरक्षा निदेशक ने बताया था कि यूपी पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड और विद्युत वितरण मंडल चिनहट की गलती से यह घटना हुई थी।