हादसे में खोए कान-नाक स्टेम सेल से फिर उगाए जा सकेंगे
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हादसे में कान-नाक जैसे महत्वूपर्ण अंग गवां चुके लोगों के लिए एक अच्छी खबर है। अब उनके कान और नाक को नया बनाया जा सकेगा। इन अंगों को पूरी तरह से विकसित करने के बाद चेहरे पर लगा दिया जाएगा। चिकित्सकों ने इसमें 25 फीसदी सफलता पा ली है।
10 साल के अंदर इसमें पूरी तरह से सफलता मिलने की उम्मीद है। क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज लुधियाना के निदेशक व माइक्रो सर्जरी विशेषज्ञ प्रो. अब्राहम थॉमस ने केजीएमयू के प्लस्टिक सर्जरी विभाग के स्थापना दिवस के मौके पर ये जानकारी दी।
केजीएमयू के ब्राउन हॉल में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. अब्राहम ने बताया कि कान और नाक जैसे अंगों को दोबारा बनाने के लिए स्टेम सेल तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत सहित अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और चीन जैसे देश इस पर कार्य कर रहे हैं।
इसमें मुख्य से कान की कार्टिलेज या पसलियों को कान के बीच पायी जाने वाली हड्डियों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
त्वचा को उगाने में भी मिल चुकी है सफलता
इसके बाद मरीज की स्टेम सेल को इन कार्टिलेज या हड्डियों पर प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इसके बाद इसे शरीर के किसी अंग से जोड़कर खून की आपूर्ति भी दे दी जाती है। इससे स्टेम सेल कान का आकार लेने लगती हैं। इस प्रयास को 25 फीसदी सफलता मिल चुकी है।
केजीएमयू के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के हेड प्रो.एके सिंह ने बताया कि प्रयोगशाला में त्वचा को उगाने में पूरी तरह से सफलता मिल चुकी है। इस त्वचा का उपयोग जले हुए मरीजों के इलाज में किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि केजीएमयू के प्लास्टिक सर्जरी और एसजीपीजीआई के माइक्रोबॉयोलॉजी विभाग के हेड प्रो. टीएन ढोल के साथ ये प्रयोग किया था।
इसमें एक सेंटीमीटर की त्वचा को लेकर विभिन्न प्रकार के रसायनों से परिष्कृत करने के बाद सफलता से 10 सेंटीमीटर तक ‘ग्रो’ करने में सफलता पाई थी। इस त्वचा की ऊपरी सतह खुरदरी थी। इसे कई चरणों की जांच के बाद मरीजों के इलाज के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकेगा।
चेहरा प्रत्यारोपित कर दुनिया को दिखाई राह
सीएमसी लुधियाना के निदेशक प्रो. अब्राहम थॉमस ने 1994 में पहली बार चेहरा प्रत्यारोपित कर दुनिया भर को प्लास्टिक सर्जन को नई राह दिखाई। उन्होंने लुधियाना में नौ साल की एक बच्ची का चेहरा प्रत्यारोपित किया था। इस बच्ची के बाल थ्रेशर के पट्टे में फंस गए थे।
बाल के साथ ही उसका चेहरा भी पूरी तरह नुच कर बाहर निकल गया था। बच्ची को लेकर परिवारीजन लुधियाना पहुंचे थे। साथ में वो बच्ची के बाल और चेहरा भी बैग में लेकर आए थे। जांच के बाद उसके चेहरे को प्रत्यारोपित करने का फैसला लिया गया।
प्रो. अब्राहम ने बताया कि ये प्रत्यारोपण पूरी तरह से सफल रहा था। इसके बाद ही चिकित्सा जगत में ये संदेश गया कि चेहरे को भी प्रत्यारोपित किया जा सकता है। इसके बाद फ्रांस में 2007 में पहला फेस ट्रांसप्लांट हुआ था। इसके बाद यूएसए व चीन में पांच-छह फेस ट्रांसप्लांट किए गए।
प्रो. अब्राहम देश में माइक्रो वैस्कुलर सर्जरी के अगुवा हैं। उन्होंने विदेश से प्रशिक्षण लेकर 1981 में माइक्रो वैस्कुलर सर्जरी देश में शुरू की थी। अभी तक वो सैकड़ों की संख्या में हाथ, पैर और अन्य कटें अंग जोड़ चुके हैं।
पैर की अंगुली से बना दी जननेंद्री
प्रो.अब्राहम थॉमस देश के पहले ऐसे माइक्रो वैस्कुलर सर्जन हैं जिन्होंने पुरुष जननेंद्री बनाने में सफलता प्राप्त की है। उन्होंने 21-22 साल के एक युवक की पैर के पंजे की दूसरी अंगुली से मांशपेशिया लेकर जननेंद्री बनाई थी। अन्य तकनीक से जननेंद्री तो विशेषज्ञ बना लेते थे लेकिन उससे परिवार बढ़ाने में सक्षम नहीं होते थे। इस तकनीक को ‘पिनाइल रिकंस्ट्रक्शन’ कहा जाता है।
आधुनिक उपकरणों से सुपर माइक्रो सर्जरी भी संभव
केजीएमयू के प्लास्टिक व माइक्रो वैस्कुलर सर्जन प्रो. विजय कुमार ने बताया कि आधुनिक उपकरणों से माइक्रो सर्जरी से अब सुपर माइक्रो सर्जरी करना भी संभव हो गया है। महीन से महीन नर्व, शिराओं और धमनी को भी जोड़ा जा सकता है।
आंख की क्षतिग्रस्त पलक हो या फिर अंगुली का पोर, छोटे से छोटे अंग को आधुनिक उपकरणों की मदद से देखकर जोड़ा जा सकता है।
प्रो. विजय कुमार ने बताया कि पहले दो मिलीमीटर तक की नर्व को जोड़ा जा सकता था। आधुनिक उपकरणों से 0.5 और 0.6 मिलीमीटर तक की नसों को जोड़ा जा सकेगा।