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हिंदी दिवस विशेष: बदलते दौर में और दिल के करीब आई हिंदी, जानें- क्या कहती हैं ये हस्तियां

Sat, 14 Sep 2019 05:28 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sat, 14 Sep 2019 05:28 PM IST
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Special story on Hindi Diwas see what these people say.
- फोटो : hindi diwas

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ हिंदी को इक्कीस कोटि-जन-पूजिता यूं ही नहीं कहते हैं। साल दर साल बीते, तारीखें बदलीं पर हमारी मातृभाषा हिंदी इतिहास के पन्नों पर एक सशक्त हस्ताक्षर की तरह आज भी दर्ज है। इसका महत्व लगातार बढ़ता गया।

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आज यह रोजगार, बाजार, संचार और आधुनिक तकनीक का एक अहम हिस्सा है। तथाकथित ‘अंग्रेजी दां’ भी इसके आकर्षण में बंध चुके हैं। यूं तो अब हर रोज, हर कहीं बातें होती हैं हिंदी की, पर आज 14 सिंतबर वह खास दिन है, जब हमने इसे राजभाषा के रूप में अपनाने का फैसला किया था। इस मौके पर अमर उजाला ने बात की हिंदी प्रेमियों से।
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वे अपने लेखन के जरिए लंबे समय से हिंदी की सेवा करते चले आ रहे हैं। आइए जानते हैं उनकी कोशिशों के बारे में और उन्हीं से पूछते हैं कि बदलते दौर में हिंदी के प्रति लोगों के आकर्षण की सीमा क्या है। पेश है एक रिपोर्ट :

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खोए बचपन को लौटाने की कोशिश का जरिया बनी यह भाषा

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संजीव जायसवाल। - फोटो : amar ujala

खोया हुआ बचपन, डेमोक्रेसी का चौथा स्तंभ, ऑपरेशन डम-डम डिगा-डिगा, फूलों की राजकुमारी, बादल और सूरज का गुस्सा जैसी पुस्तकों के लेखक संजीव जायसवाल ‘संजय’ कहते हैं कि अपने शौक और जुनून को पूरा करने के लिए वक्त निकल ही आता है। आरडीएसओ से निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए संजीव की पहली कहानी थी विवाह पंजीकरण कार्यालय।

सरकारी नौकरी में आने से पहले सरकारी कार्यालय में देखे भ्रष्टाचार के प्रति आक्रोश शब्दों के रूप में फूट पड़ा और चल पड़ा लेखन का सिलसिला। हिंदी लेखन का उनका यह सफर 38 सालों का है। कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, चित्रकथाएं और कई और विधाओं में लेखन करने वाले संजीव बाल साहित्य को अपनी एक सामाजिक जिम्मेदारी मानते हैं। वे कहते हैं कि बच्चों को संस्कार देने का काम मां और साहित्य दोनों करते हैं।

इसे रोजगार से जोड़ना होगा : मेरा मानना है कि हिंदी, अंग्रेजी की तुलना में अब भी रोजगार से कम जुड़ी है। हालांकि यह सुखद संकेत है कि इसकी अनिवार्यता से भी लोगों को इन्कार नहीं है। अहमदाबाद के प्रबंधन संस्थान भी अब राग दरबारी और मैला आंचल जैसी किताबें पढ़ने के लिए छात्रों को कहते हैं। उनका मानना है कि यदि बिजनेस करना है तो ग्रामीण भारत को समझना होगा और गांव को जानने के लिए हिंदी की ये दोनों रचनाएं पढ़ना जरूरी है।

बन गए अंग्रेजी-हिंदी के बीच का सेतु

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डॉ आरपी सिंह। - फोटो : amar ujala

शेक्सपीयर की सात रातें, अंतर्द्वन्द्व, नीली आंखों वाली लड़की जैसी हिंदी पुस्तकों के लेखक हैं लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर डॉ. आरपी सिंह। खुद को हिंदी और अंग्रेजी के बीच का सेतु मानते हैं। कहते हैं कि हिंदी से जो मिलता है वह अंग्रेजी को देता हूं और अंग्रेजी में नया है उसे हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल करता हूं।

साहित्य कहीं निर्वात से नहीं जन्मता। यह तो जीवन की पथरीली पगडंडियों से पैदा होता है। सच कहूं तो हिंदी में जब अपनी बात रखता हूं तो अपनेपन का अहसास होता है। मेरा विश्वास है कि हिंदी में लिखकर मैं पाश्चात्य ज्ञान दर्शन और अंग्रेजी की साहित्य की परंपराओं को भारतीय परिवेश में कहीं बेहतर तरीके से व्यक्त कर पाता हूं।

बढ़ रही है लोकप्रियता : कहते हैं कि हिंदी की लोकप्रियता वैश्विक पटल पर बढ़ रही है। मैंने स्वयं ब्रिटिश कौंसिल के अधिकारियों, अफ्रीकी, कैरेबियाई, श्रीलंका, अमेरिका के अधिकारियों व विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ाई है। सोशल मीडिया ने हिंदी को बल दिया है।

खाकी की नौकरी, हिंदी की सेवा

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महेश चंद्र द्विवेदी। - फोटो : amar ujala

2001 में डीजी पुलिस यूपी के पद से सेवानिवृत्त हुए महेश चंद्र द्विवेदी नौकरी से खाली होकर अब पूरी तरह से हिंदी की सेवा में जुटे हैं। कहते हैं कि न तो पढ़ते वक्त लिख पाया न ही नौकरी में आने के बाद लिखना शुरू कर सका। 1992 में 52 साल का था और आईजी गोरखपुर था। सोनभद्र में एक कवि सम्मेलन में मुझे आमंत्रित किया गया।

साइंस का स्टूडेंट था, कविता कैसे लिखता, लेकिन एक कविता लिख गई। सोनभद्र की मिट्टी की खुशबू शब्दों के रूप में कागजों में ऐसी उतरी की एक-एक कर 19 किताबों के रूप में बिखरती चली गई। 18 किताबें हिंदी में हैं और एक अंग्रेजी में है। वीरप्पन की मूछें, भाईजी का जूता जैसे व्यंग्य मुझे खुद भी संतुष्टि देते हैं और लोगों को भी खूब पसंद आए।

विश्व में हो रहा है प्रचार-प्रसार : यह खुशी की बात है कि हिंदी का प्रसार पूरे विश्व में हो रहा है। सभा, संगोष्ठियों की संख्या बढ़ती जा रही है। विदेशों में भी हिंदी सेवियों की बहुत मांग है, सम्मान से उन्हें आमंत्रित किया जाता है। पर पुस्तकें पढ़ने में लोगों की घटती रुचि खतरनाक है।

भारत में साइंस और मेडिकल के क्षेत्र में हिंदी का इस्तेमाल न के बराबर है। अब कोर्ट ने भी अपने फैसले हिंदी में देना शुरू कर दिया है। यदि हिंदी को हम हर क्षेत्र में इस्तेमाल करने लगे तो मल्टीनेशनल कंपनियां हिंदी भाषियों के प्रति अपना नजरिया बदलेंगी।

हिंदी के आगे सभी नतमस्तक

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मानव प्रकाश। - फोटो : amar ujala

शहर के एक बड़े प्रकाशन समूह के मुखिया मानव प्रकाश कहते हैं कि हिंदी हमारे माथे की बिंदी कल भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी। विश्व के नंबर वन प्रकाशक अब हिंदी प्रकाशकों की मदद से उनकी गुणवत्ता को सुधार कर हिंदी में किताबों की सीरीज का प्रकाशन कर रहे हैं।

यह हिंदी की विश्व में स्वीकार्यता का उदाहरण है। जितने भी बेस्ट सेलर लेखक हैं, उनकी किताबों के हिंदी संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं। नए युवा लेखक अच्छा लिख रहे हैं।

सबसे बड़ी बात है कि सोशल मीडिया, वाट्सएप ग्रुप में हिंदी में बातचीत हो रही है, कमेंट्स हो रहे हैं। मैं जब खुद किसी को थैंक्यू लिखता हूं तो उसका जवाब हिंदी में मिलता है। इससे मैं खुद हिंदी लिखने के लिए प्रोत्साहित होता हूं।

नई वाली हिंदी बनी पसंद

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सरोज सिंह व डॉ. अंजना मिश्रा। - फोटो : amar ujala
लेखिका सरोज सिंह हिंदी व भोजपुरी लेखन में समान अधिकार रखती हैं। रंगमंच के जरिए हिंदी को बढ़ावा देने और युवाओं को जोड़ने पर काम कर रही हैं।

कहती हैं कि बीच में एक समय था जब युवा पीढ़ी हिंदी से विमुक्त सी थी। सोशल मीडिया ने एक नई हिन्दी यानी आम बोलचाल वाली भाषा को जन्म दिया और इसी बहाने युवा इससे जुड़ रहे हैं। बस हमें ध्यान रखना है कि मूल रूप में बदलाव न हो।

कॉन्वेंट स्कूलों में विशेष प्रयास करने होंगे
लॉरेटो कॉन्वेट में हिंदी की शिक्षिका रहीं डॉ. अंजना मिश्रा कहती हैं कि कॉन्वेंट स्कूलों में बच्चों को हिन्दी की गतिविधियों से ज्यादा से ज्यादा जोड़ना होगा। बच्चों में पत्रिकाएं पढ़ने की आदत नहीं रहीं।

अभिभावकों को भी बच्चों को घर में वह माहौल देना होगा। जब बच्चे अच्छी हिन्दी सुनेंगे तो अच्छी बोलेंगे भी। अंग्रेजी जरूरी है, लेकिन आप अपनी मातृभाषा की अनदेखी कर आगे नहीं बढ़ सकते हैं।
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