'नंबर वन' बनने के लिए हुई थी सपा-भाजपा की भिड़ंत!
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अखिलेश यादव का पुतला फूंकने को लेकर सपा कार्यकर्ताओं और भाजपा कार्यकर्ताओं में भिड़ंत क्या किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी?
यह सवाल यूपी के सियासी गलियारों में चर्चा का विषय है। इस बारे में जांच की रिपोर्ट जब आएगी तब साफ होगा कि दोषी सपाई हैं या भाजपाई, पर राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि यह भिड़ंत अचानक नहीं हुई।
इसके राजनीतिक कारण हैं। सोची-समझी योजना है। सूबे में सरकार चला रहे सपा नेता लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद से ही उस अवसर को ढूंढने की कोशिश में हैं जो उन्हें हार की हताशा से निकलने का रास्ता मुहैया करा दे।
भाजपा की भी कोशिश दिख रही है कि किसी न किसी तरह वह सूबे में सपा से लड़ती दिखे, जिससे यह संदेश चला जाए कि लोगों ने उसे जिन अपेक्षाओं के साथ वोट दिया है, वह उन पर खरे उतरने में पीछे नहीं है। सपा सरकार से दो-दो हाथ करने को वह तैयार भी है और सक्षम भी।
सपा का दांव
राजनीतिक समीक्षकों का निष्कर्ष सही भी दिखता है। लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद सपा में छटपटाहट है। उसके नेताओं में पार्टी की पहुंच व पकड़ कमजोर होने की बेचैनी भी है।
वे आशंकित हैं कि इस स्थिति से न उबरे तो भविष्य में संकट बढ़ेगा। सपा समर्थकों में, खास तौर से अल्पसंख्यकों में पार्टी के कमजोर होने का संदेश गया तो राजनीतिक अस्तित्व पर ही संकट छा जाएगा।
भाजपाइयों ने कानून-व्यवस्था पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पुतले की अर्थी निकालकर जलाई तो उन्हें अपने समर्थकों को यह संदेश देने का मौका मिल गया कि केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद भी सपा किसी दबाव में नहीं है।
भाजपा में भी बेचैनी
भाजपा की बात करें तो बेचैनी इनमें भी है। पार्टी नेता लोकसभा चुनाव नतीजों से मिली जीत और उत्साह को विधानसभा चुनाव तक बरकरार रखना चाहते हैं।
इससे पहले निकट भविष्य में लोकसभा चुनाव में विधायकों के सांसद चुन लिए जाने से खाली हुई विधानसभा की 12 सीटों के उपचुनाव में भी अपनी बढ़त व पकड़ बरकरार रखना चाहते हैं।
भाजपा के रणनीतिकारों को पता है कि पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए उन्हें सपा से भिड़ते हुए दिखना होगा। लोगों में यह संदेश देना होगा कि सपा की अराजकता और मनमाने फैसलों का माकूल जवाब भाजपा ही दे सकती है।
इस घटना ने उसकी भी मंशा पूरी कर दी। भाजपा ने अपने कार्यालय पर हमले को मुद्दा बनाकर पूरे प्रदेश में आंदोलन का ऐलान कर दिया।
लड़ाई अपने बीच समेटने की
सपा और भाजपा दोनों की कोशिश सूबे की सियासत को अपने बीच समेटकर रखने की है। सपा के रणनीतिकारों का मानना है कि लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे का लाभ भाजपा को हुआ है।
इसलिए सपा नेताओं की मंशा है कि वे भाजपा से इस हद तक जाकर भिड़ते दिखाई दें जिससे मुस्लिम वोटों की नजर में वही पहली प्राथमिकता रहें।
साथ ही यह संदेश चला जाए कि भले ही सपा लोकसभा चुनाव में अपेक्षित सीटें न हासिल कर पाई हो लेकिन सांप्रदायिक ताकतों को रोककर वह रख सकती है।
दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद भगवा खेमा इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका है कि अल्पसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण का लाभ उसे ही होगा। लिहाजा भाजपा भी सपा से दो-दो हाथ करने में पीछे नहीं रहना चाहती।