अटल ने आडवाणी से मतभेदों पर लखनऊ में दी थी सफाई, कही थी ये बातें
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अटल यहां अपने प्रिय मित्र और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक प्रताप नारायण ‘प्रतापजी’ की अंत्येष्टि में शामिल होने आए थे। प्रतापजी ही जनसंघ के विभाग संगठन मंत्री के नाते पं. दीनदयाल उपाध्याय से आग्रह कर अटलजी को बलरामपुर ले गए थे और उन्हें चुनाव जितवाकर पहली बार लोकसभा भिजवाया था। बाद में वही प्रतापजी संघ के प्रांत प्रचारक हो गए। जब 27 अगस्त 1993 को प्रतापजी की मृत्यु हुई तो उस समय अटलजी नेता प्रतिपक्ष थे। पर, वे न सिर्फ लखनऊ आए बल्कि प्रतापजी की अंतिम यात्रा में अन्य सभी के साथ चलकर बैकुंठ धाम पहुंचे।
...शुरुआती दिनों में ही लोग पैसा खर्च कर अटल को सुनने आते थे
अटल का बचपन तो ग्वालियर में बीता लेकिन किशोरावस्था से लेकर यौवन और बुढ़ापे की यात्रा का लखनऊ नजदीकी गवाह रहा। इस दौरान उनकी चाल, शैली, चरित्र और चिंतन सभी ने लोगों के दिल व दिमाग पर अमिट छाप छोड़ी। वे 70 के दशक में लखनऊ के कई जिलों में बड़े नेता के रूप में मशहूर हो चुके थे।
मुझे याद है कि कैसे गांव के लोग अटल को सुनने लखनऊ आया करते थे। वह भी अपना किराया खर्च करके। उस समय जब, कांग्रेस की सभाओं में लोगों को लाने के वास्ते आसपास के गांवों में बसों के बेड़े और उन पर बैठकर आने वालों को खाने-पीने की सुविधा मिलती थी। मुझे भी पहले विद्यार्थी, दर्शक और श्रोता के रूप में वाजपेयी को देखने और सुनने का सौभाग्य मिला। बाद में पत्रकारिता के नाते उनके कार्यक्रमों का कवरेज करने का अवसर मिला। परिवार के लोगों से अटल की निकटता के नाते कई बार उत्साह के चलते उस सीमा को पार कर गया जिसकी संवेदनशीलता अब समझ में आती है। पर, हर बार अटल ने इसकी अनदेखी की।
‘अंधेरा है पर, अंधेर नहीं’
बात 1986-87 की होगी। लखनऊ से निकलने वाले एक सांध्य दैनिक में संवाददाता था। अटलजी लखनऊ में स्टेट गेस्ट हाऊस के कमरा नंबर एक में रुके हुए थे। हमने उनसे मुलाकात की और भाजपा के भविष्य को लेकर सवाल किया। उन्होंने अपने अंदाज में कहा, ‘अंधेरा है पर, अंधेर नहीं।’ पर, मेरे यहां हेडिंग लगी, ‘अंधेरे में भाजपा।’ मैं परेशान, कैसे अटलजी का सामना करूंगा। अगले दिन अटलजी से सामना हो ही गया। मुझे देखते ही ठहाका लगाकर बोले, ‘आओ! शायद कुछ कसर रह गई।’
छोटी बातें, बड़े सरोकार
अटलजी वर्ष 1991 का चुनाव लड़ रहे थे। लखनऊ के प्रदीप भार्गव कार चला रहे थे और अटलजी उस पर बैठे क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। चिनहट में एक जगह गाड़ी गड्ढे में फंस गई। सभा में अटलजी ने इसे मुद्दा बना दिया। बोले-‘समझ में नहीं आता, गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा है।’ सांसद चुने गए तो उन्होंने सड़कों के सुधार का जितना काम किया, वह आज भी चर्चा में रहता है।
... शायद ही उनके कद का कोई नेता इतनी सहजता से ऐसा कर पाता
अटलजी ने इस चुनाव के दौरान अनौरा चौकी पर एक सामान्य तख्त पर सभा की तो अमराई गांव में एक छोटा-सा चबूतरा उनका मंच बना। कुम्हरावां में एक मैदान में डाले गए तख्त पर चढ़कर वे बोले तो महोना जाते हुए रास्ते में कुछ पुराने चेहरों को देखकर उन्होंने गाड़ी रुकवा ली। एक जगह कुछ गांव वालों ने हाथ दिया तो वहां कोई तख्त या चबूतरा न देख नांद (जानवरों का चारा खिलाने वाली जगह) के चबूतरे पर चढ़कर बोल दिए। शायद ही उनके कद का कोई नेता इतनी सहजता से ऐसा कर पाता।
...और बैरिकेडिंग को बना दिया मुद्दा
इसी बीच राजीव गांधी की हत्या हो गई। स्वाभाविक रूप से अटल की भी सुरक्षा कड़ी हो गई। दो दिन पहले तक बिना सुरक्षा के लोगों से घुल-मिलकर चुनावी अभियान में जुटे अटल की सभा बेहटा में हुई तो माहौल बदला हुआ था। अटल पहली बार लखनऊ में बल्लियों की बैरिकेडिंग में थे। मुझे याद है कि उन्होंने बेहटा में बल्लियों को ही अपने भाषण का मुद्दा बना लिया। कहा, ‘ये बल्लियां देश की सुरक्षा पर सवाल उठा रही हैं। कांग्रेस की ढीली-ढाली नीतियों ने आतंकवादियों के पैर हमारे देश में भी मजबूत करना शुरू कर दिए हैं। अटल इस चुनाव में पहली बार लखनऊ से बड़े अंतर से सांसद चुने गए।
अरे भाई! यहां प्राइम मिनिस्टर नहीं
अटलजी प्रधानमंत्री होते हुए कई बार लखनऊ आए। शुरुआत में उनकी सुरक्षा काफी सख्त रहती। पूरे शहर में बैरिकेडिंग। एक जगह पत्रकारों से अटलजी का आमना-सामना हो गया तो कहा गया, ‘अब आपको भी लखनऊ में इतना खतरा हो गया कि पूरा शहर कैद होने लगा।’ वे बोले तो कुछ नहीं। पर, उसके बाद जब भी वे आए तो फिर वैसा माहौल नहीं दिखा। वे जिस चौराहे से गुजरते वहां रस्सी लगाकर पांच मिनट ट्रैफिक रोक लिया जाता और उनके काफिले के निकलते ही फिर सब कुछ सामान्य।
एक-एक बात का ख्याल
अटलजी प्रधानमंत्री के रूप में यहां गोमती किनारे स्थित मरी माता मंदिर पर संत गाडगे की प्रतिमा का अनावरण करने आ रहे थे। पत्रकारों को पुलिस वालों ने मेडिकल कॉलेज तिराहे के पास रोक लिया, जहां से पहुंचना मुश्किल था। बहरहाल लालजी टंडन के हस्तक्षेप से जाने को मिला।’ अटलजी को पता चला तो बोले, ‘मेरी सुरक्षा का ध्यान रखने वाले इस बात का भी ख्याल रखें कि लखनऊ से सांसद होने के नाते ही प्रधानमंत्री हूं। यहां मुझे बिल्कुल खतरा नहीं है। कम से कम पत्रकारों से तो हरगिज नहीं।’
रात में पहुंच गए मेडिकल कॉलेज
घटना 12 अप्रैल 2004 की है। लोकसभा चुनाव चल रहा था। महानगर में भाजपा के कुछ नेताओं ने गरीब महिलाओं को साड़ी वितरण का कार्यक्रम रखा था, पर साड़ी लेने के लिए भगदड़ मची तो उसमें कई गरीब महिलाओं की मृत्यु हो गई। अटलजी को जैसे ही पता चला, वे सारे कार्यक्रम निरस्त कर रात में ही लखनऊ आए और मेडिकल कॉलेज (अब मेडिकल विश्वविद्यालय) पहुंचे। उन्होंने घायलों से मुलाकात के साथ उनकी आर्थिक मदद भी कराई। साथ ही भाजपा वालों को नसीहत भी दे दी कि गरीबों की मदद ठीक, पर प्रदर्शन नहीं।
खोलते रहे मन की गांठ
अटलजी अपने हर दर्द को लखनऊ वालों से साझा कर खुद को हल्का कर लेते थे। प्रसंग 2004 का है। लालकृष्ण आडवाणी से मतभेदों की चर्चा प्राय: अखबारों में रहती थी। अटलजी का निरालानगर में कार्यक्रम था। भाषण के अंत में बोले, ‘एक बात और कहनी है। मेरे और आडवाणीजी के बीच मतभेदों की खबरें फैलाई जा रही हैं। ये निराधार हैं। मैंने और आडवाणी ने पिछले 50 सालों से मिलकर काम किया है। मुझे भरोसा है, दूसरे इस पर भरोसा करें न करें लेकिन मेरे लखनऊ वाले जरूर करेंगे।’
मुखबिरी की होती तो यहां आपके सामने जिंदा न खड़ा होता...
यहां अंबेडकर मैदान में आडवाणी की भारत उदय यात्रा की अगुआनी होनी थी। सांसद के नाते प्रधानमंत्री अटल ने स्वागत किया। एक बार फिर दर्द छलक पड़ा, ‘1942 में मैं ग्वालियर में पढ़ता था। उसी समय आजादी का आंदोलन छिड़ गया तो उसमें कूद पड़ा, गिरफ्तारियां शुरू हो गईं तो घरवालों ने गिरफ्तारी के डर से गांव बटेश्वर भेज दिया। कहा-‘मैंने किसी के खिलाफ गवाही नहीं दी, किसी की मुखबिरी नहीं की, चुगलखोरी नहीं की, कोई लज्जित करने वाला काम नहीं किया। लखनऊ वाले भरोसा रखें कभी ऐसा काम न किया है और न करूंगा जिससे यहां के लोगों को यह सुनना पड़े कि अटल ऐसे-वैसे हैं? मुखबिरी की होती तो यहां आपके सामने जिंदा न खड़ा होता।’
शवयात्रा में कोई गाड़ी से नहीं चलता
प्रतापजी की अंत्येष्टि से लेकर आज अटल के अनंत में लीन होने की श्मशान यात्रा तक ढेरों ऐसे प्रसंग दिमाग में कौंधते हैं, जो उनकी पहचान बड़ी सियासी शख्सियत होने के बावजूद संवेदनशील और छोटी-छोटी बातों के सरोकारों का ख्याल रखने वाले शख्स के रूप में स्थापित करते हैं। कैंट से विधायक सतीश भाटिया (वर्तमान महापौर संयुक्ता भाटिया के पति) की मृत्यु पर 1996 में आए अटल 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री रह चुके थे। पूर्व प्रधानमंत्री होने के कारण एसपीजी सुरक्षा थी। पर, वे शवयात्रा के साथ पैदल ही आलमबाग श्मशान घाट तक गए। अधिकारियों के लाख कहने पर भी सुरक्षा और गाड़ी नहीं ली।
बोले, ‘शवयात्रा में कोई गाड़ी से नहीं चलता।’ आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल की अंतिम यात्रा में पैदल चलकर अटल की लखनऊ में श्मशान तक पैदल यात्रा की याद दिला दी। अटल जब अनंत यात्रा पर निकल चुके हैं तब 2004 में उनके जन्मदिन पर लखनऊ में एक वक्ता के मुंह से निकले इस वाक्य ‘अग्ने तिग्मने दीदिह!’ अर्थात ‘हे अग्निधर्मा! आप अपने तेज के साथ सदा दीपित रहें।’ की बरबस याद आ गई।