सपा की सोशल इंजीनियिरिंग: ब्राह्मण कार्ड फेंका, मुस्लिमों को रिझाया
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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आठवें मंत्रिपरिषद विस्तार में 2017 में सत्ता का लक्ष्य साधने के लिए जातीय समीकरणों का दांव चला है। विस्तार में ब्राह्मण कार्ड खेलने के साथ ही मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की गई है। तीन ब्राह्मणों और दो मुसलमानों को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है।
अखिलेश की टीम में अब नौ काबीना मंत्रियों समेत 12 मुस्लिम और चार काबीना समेत 6 ब्राह्मण मंत्री हो गए हैं। यानी मंत्रिपरिषद में मुसलमानों को 20 और ब्राह्मणों को 10 फीसदी नुमाइंदगी मिली है। अखिलेश यादव मंत्रिपरिषद के सोमवार को हुए विस्तार में चुनावी आहट साफ दिख रही है।
जिस समय कांग्रेस और बसपा में ब्राह्मणों को लुभाने की होड़ दिख रही है, उसी वक्त सपा ने तीन ब्राह्मण नेताओं को कैबिनेट मंत्री मंत्री बनाकर अपने इरादे भी जाहिर कर दिए हैं। मुख्यमंत्री ने पूर्व में बर्खास्त किए गए मनोज कुमार पांडेय और शिवाकांत ओझा को कैबिनेट में वापस बुलाया है तो राज्यमंत्री अभिषेक मिश्र को प्रमोट कर काबीना मंत्री बना दिया है।
माना जा रहा है कि इस फैसले से राजनीतिक दलों के बीच ब्राह्मण वोटों की जंग में सपा ने खुद को मजबूत दावेदार के रूप में शामिल कर लिया है। प्रदेश में अब कुल 6 ब्राह्मण मंत्री हो गए हैं। इनमें ब्रह्माशंकर त्रिपाठी, मनोज पांडेय, शिवाकांत ओझा और अभिषेक मिश्र जहां कैबिनेट मंत्री है, वहीं विजय कुमार मिश्र स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री और तेजनारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय राज्यमंत्री हैं।
चुनावी नतीजों में ब्राह्मणों की अहम भूमिका
सपा ने सरकार में ब्राह्मणों को भागीदारी यूं ही नहीं बढ़ाई है। ब्राह्मण मतों का रुझान सूबे में सत्ता के दरवाजे खोलता रहा है। 2007 में पहली बार बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो उसमें ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
2012 में सपा की सत्ता में वापसी में भी ब्राह्मणों का रुझान अहम रहा था। 2017 के चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दलों की नजरें ब्राह्मणों पर टिकी हैं। ऐसे में सपा मुस्लिम-यादव के साथ ब्राह्मणों की कुंजी से सत्ता का ताला खोलना चाहती है।
यह भी कोशिश हो सकती है कि ब्राह्मण किसी एक दल के साथ लामबंद न हो और उनका बड़ा हिस्सा सपा के पक्ष में आए। सपा की यह रणनीति कितनी कारगर रही यह तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे लेकिन ब्राह्मणों में मंत्रिपरिषद विस्तार से संदेश जरूर चला गया है।
मुसलमानों का समर्थन बनाए रखने की जद्दोजहद
पिछले कुछ दिनों से सपा में शीर्ष स्तर पर चल रही उठापटक से मुसलमानों में बेचैनी की खबरें मिल रही हैं। दरअसल, यूपी से लोकसभा में मुस्लिम नुमाइंदगी शून्य हो जाने से विधानसभा चुनाव में उनके वोटिंग पैटर्न पर सभी की नजर है।
मुसलमानों का बड़ा तबका लंबे समय से मुलायम सिंह यादव और सपा का समर्थक माना जाता है। विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए मुस्लिम वोटों का बंटवारा न हो, इसलिए सपा ने मंत्रिपरिषद विस्तार में उन्हें तरजीह दी है।
यूं भी कह सकते हैं कि बसपा और कांग्रेस की तरफ मुस्लिमों का रुझान रोकने के लिए रियाज अहमद और यासिर शाह को पदोन्नत करके कैबिनेट मंत्री बनाया गया है।
अखिलेश की कैबिनेट में अब कुल 12 मुस्लिम मंत्री हैं। इनमें नौ काबीना, दो राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और एक राज्यमंत्री हैं। सियासी तौर पर इस नुमाइंदगी को अच्छा माना जा रहा है। कैबिनेट में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 20 फीसदी हो गया है।
ये हैं मुसलमान मंत्री : आजम खां, अहमद हसन, इकबाल महमूद, महबूब अली, शाहिद मंजूर, कमाल अख्तर, जियाउद्दीन रिजवी, रियाज अहमद और यासर शाह कैबिनेट मंत्री हैं। फरीद महफूज किदवई और सैयद शादाब फातिमा स्वतंत्र प्रभार की राज्यमंत्री और वसीम अहमद राज्यमंत्री हैं।
अति पिछड़ी जातियों पर भी साधा निशाना
मंत्रिपरिषद के विस्तार में अति पिछड़ी जातियों को साधने का भी ख्याल रखा गया है। एक पखवाड़ा पहले बर्खास्त किए गए गायत्री प्रजापति को फिर से कैबिनेट में लिया गया है।
मुख्यमंत्री ने निषाद समाज से ताल्लुक रखने वाले खाद्य एवं राज्य राज्यमंत्री लक्ष्मीकांत उर्फ पप्पू निषाद को बर्खास्त किया है तो इसी समाज से शंखलाल मांझी को राज्यमंत्री से प्रोन्नति देकर कैबिनेट मंत्री बनाया गया है।
पिछड़े वर्ग की कुर्मी जाति के नरेन्द्र वर्मा को राज्यमंत्री से प्रमोट करके काबीना मंत्री गया है। माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल से बर्खास्त हो चुके भगवत शरण गंगवार की भरपाई के लिए उनका कद बढ़ाया गया है।