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UP News: मानसिक रोग की दवाओं का युवाओं पर दुष्प्रभाव सबसे ज्यादा, KGMU में हुए अध्ययन में हैरान करने वाले तथ्य

Thu, 12 Dec 2024 05:31 PM IST
भूपेन्द्र सिंह अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Thu, 12 Dec 2024 05:31 PM IST
सार

मानसिक रोग की दवाओं का दुष्प्रभाव युवाओं पर सबसे ज्यादा होता है। KGMU में हुए अध्ययन में हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं।

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side effects of mental illness medicines on youth are most shocking truth in study conducted in KGMU
दवाएं (सांकेतिक) - फोटो : Freepik.com

विस्तार

राजधानी लखनऊ में विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह से खाई जा रहीं मानसिक रोग की दवाएं 50 फीसदी मरीजों में साइड  इफेक्ट पैदा करती हैं। यह दुष्प्रभाव युवाओं में ज्यादा होता है। केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग ने करीब एक साल के अपने अध्ययन में यह बात निकलकर आई है। इस रिपोर्ट में मानसिक रोग की दवाएं खाने वाले रोगियों की नियमित निगरानी और बगैर सलाह दवाएं नहीं खाने की सलाह दी गई है।

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केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग में आने वाले ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) से पीड़ित लोगों पर यह अध्ययन फरवरी 2023 से जनवरी 2024 के बीच किया गया। इसमें कुल 72 मरीजों को शामिल किया गया। इसमें फार्माकोलॉजी विभाग का सहयोग लिया गया। 
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अध्ययन के दौरान ओसीडी से पीड़ित लोगों पर दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों की समीक्षा की गई। यह अध्ययन फार्मास्यूटिकल रिसर्च इंटरनेशनल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में डॉ. शिव कुमार नाइक, डॉ. अनुराधा निश्चल, डॉ. अनलि निश्चल, डॉ. अमित सिंह और डॉ. आमोद कुमार सचान शामिल हुए।

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51.3 फीसदी पर प्रतिकूल असर, इनमें भी 62.1 फीसदी युवा

अध्ययन में शामिल 72 मरीजों में से 37 (51.3 फीसदी) में दवा का प्रतिकूल प्रभाव देखा गया। प्रतिकूल प्रभाव वाले मरीजों में से 62.1 फीसदी की आयु 18 से 30 साल के बीच थी। दुष्प्रभाव वाले 72.9 फीसदी मामले फ्लुओजेक्टिन दवा के थे। दुष्प्रभाव की बात की जाए तो 54 फीसदी मामलों में अन्य मानसिक समस्याएं देखी गईं। 24.3 फीसदी मामलों में अपच की समस्या देखी गई। 75.7 फीसदी मामलों में साइड इफेक्ट का इलाज करने की जरूरत भी पड़ी।

नियमित निगरानी और जागरूकता से कम होगा जोखिम

रिपोर्ट में कहा गया है कि मनोचिकित्सा की ओपीडी में दवाओं के साइड इफेक्ट की नियमित निगरानी और जागरूकता से दुष्प्रभाव का जोखिम कम किया जा सकता है। इससे मरीज के देखभाल की गुणवत्ता, उपचार की लागत में कमी, दवाओं का पालन और बेहतर परिणाम में सुधार हो सकता है।

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