राजनीति में चुनाव जीतना ही होता है अंतिम लक्ष्य: शीला दीक्षित
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समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन होने के बाद कांग्रेस की मुख्यमंत्री पद की दावेदार शीला दीक्षित ने अपनी दावेदारी वापस ले ली है। उन्होंने कांग्रेस आलाकमान को इस आशय का औपचारिक पत्र भी दे दिया है। वे कहती हैं, राजनीति में जीतना ही लक्ष्य होता है। चुनाव में किसी भी प्रकार हो, जीत मिलनी चाहिए।
यह गठबंधन भी जीतने के लिए किया गया है। इससे दोनों ही पार्टियों को फायदा मिलेगा। ‘अमर उजाला’ ने शीला दीक्षित से सोमवार को फोन पर बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश :
सवाल - गठबंधन होते ही आपने मुख्यमंत्री पद की दावेदारी वापस लेने की बात कही थी। क्या आप दावेदारी वापस लेंगी?
जवाब - जैसे ही गठबंधन फाइनल हुआ, मैंने वादे के मुताबिक अपनी दावेदारी छोड़ दी। गठबंधन के बाद मुख्यमंत्री पद के दो-दो दावेदार नहीं हो सकते।
'अब अधिकतर सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय होगा'
सवाल - सूबे में कितना स्थायी रहेगा यह गठजोड़?
जवाब - जब भी सियासी गठजोड़ होता है तो पॉजिटिव चीजें ही देखी जाती हैं। सपा व कांग्रेस का यह गठजोड़ चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेगा। सपा-कांग्रेस की ही सरकार बनेगी।
सवाल - अखिलेश यादव से आपके अच्छे संबंध हैं। आपको इसलिए तो नहीं लाया गया कि गठबंधन को परवान चढ़ाया जा सके?
जवाब - मैं इस बारे में क्या टिप्पणी करूं। इतना जरूर है कि यह गठजोड़ सूबे में मजबूती के साथ चुनाव लड़ेगा। धर्म के नाम पर जो लोग राजनीति करते हैं, इस गठजोड़ से उन पर असर पड़ेगा। अब धर्मनिरपेक्ष ताकतें एक मंच पर आ गई हैं। सांप्रदायिक ताकतों को इससे नुकसान पहुंचेगा।
सवाल - विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन कितना सफल होगा?
जवाब - मैं अभी से कोई भविष्यवाणी तो नहीं कर सकती, लेकिन इतना जरूर है कि यह गठबंधन चुनाव में व्यापक असर डालेगा। पहले सूबे में चार पार्टियां भाजपा, कांग्रेस, सपा व बसपा चुनाव लड़ रही थीं। गठबंधन के बाद अब अधिकतर सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय रहेगा।
'कहीं सपा को सीढ़ी तो नहीं बना रही है कांग्रेस'
सवाल - कांग्रेस सूबे में अपनी खोई सियासी ताकत पाने के लिए कहीं सपा को सीढ़ी तो नहीं बना रही?
जवाब - चुनाव से पहले राजनीतिक दलों का गठबंधन तभी होता है, जब उन्हें एक-दूसरे की जरूरत हो। इसलिए यह कहना कि कांग्रेस ने खोई सियासी ताकत पाने के लिए सपा को सीढ़ी बनाया है, पूरी तरह गलत है।
सवाल - कांग्रेस का ‘27 साल यूपी बेहाल’ नारा तो बेकार हो गया?
जवाब - यूपी में राहुल गांधी की किसान यात्रा के समय यह नारा दिया गया था। किसानों की हालत काफी खराब है, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। यह बात सही है कि गठबंधन के बाद यह नारा बेकार हो गया है। अब हमें नया नारा बनाना होगा।