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एचओडी ने भर्ती किया पेशेंट, रेजीडेंट डॉक्टरों ने भगाया

Wed, 23 Sep 2015 04:19 PM IST
Updated Wed, 23 Sep 2015 04:19 PM IST
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senior doctor admits patient, resident doctor misbehaved

केजीएमयू के कार्डियक वैस्कुलर थोरेसिक सर्जरी (सीवीटीएस) विभाग में रेजीडेंट डॉक्टरों की लापरवाही से हृदय रोग से पीड़ित फिदाउल हरमैन (40) की जान पर बन आई। मंगलवार सुबह तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर विभागाध्यक्ष डॉ. एसके सिंह ने फिदाउल को आईसीयू में शिफ्ट कराया लेकिन जैसे ही वह आईसीयू से बाहर गए रेजीडेंट डॉक्टरों ने ऑक्सीजन हटाकर उन्हें बाहर कर दिया।

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इससे बाहर स्ट्रेचर पर ही फिदाउल बेहोश हो गया। इस पर परिवारीजन चीखने-चिल्लाने लगे और पुलिस को बुला लिया। पुलिस के आने के बाद फिदाउल को वेंटिलेटर यूनिट में शिफ्ट किया गया। जहां उसकी हालत नाजुक बनी हुई है। वहीं रेजीडेंट डॉक्टरों के रवैये को लेकर परिवारीजनों का हंगामा चार घंटे तक चलता रहा। देर शाम तक पुलिस सीवीटीएस के वेंटिलेटर यूनिट में मौजूद रही।
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फिदाउल हरमैन को हृदय संबंधी समस्या के बाद 15 सितंबर को सीवीटीएस विभाग में भर्ती कराया गया। उनके हार्ट का वॉल्व बदला जाना है। परिवारीजन अरशद ने बताया कि सोमवार को फिदाउल की तबीयत बिगड़ने लगी थी और पेट में सूजन आने लगी। डॉक्टरों से कहा तो किसी ने इलाज करने की बजाय नजरअंदाज कर दिया। मंगलवार सुबह करीब ग्यारह बजे तबीयत ज्यादा ही खराब हो गई।
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रेजीडेंट डॉक्टरों से कहा तो उन्होंने अनसुना कर दिया। परिवारीजन रोते रहे लेकिन कोई नहीं पसीजा। इसपर परिवारीजन हंगामा करने लगे। हंगामे की सूचना के बाद मौके पर पहुंचे सीवीटीएस विभागाध्यक्ष डॉ. एसके सिंह ने मरीज को तुरंत आईसीयू में शिफ्ट कराया।

मरीज को भर्ती करके गया था सीनियर डॉक्टर

senior doctor admits patient, resident doctor misbehaved

दो घंटे तक आईसीयू में इलाज चलता रहा। दो घंटे बाद डॉ. एसके सिंह चले गए तो रेजीडेंट डॉक्टरों ने उन्हें ट्रॉमा ले जाने की सलाह देते हुए बाहर कर दिया। बगैर ऑक्सीजन बाहर निकालते ही वह बेहोश हो गया। इससे गुस्साए परिवारीजनों ने हंगामा शुरू कर दिया और फोन कर पुलिस को बुला लिया। पुलिस ने उन्हें शांत कराया। फिर मरीज को वेंटिलेटर यूनिट में भर्ती किया गया।

फिदाउल की पत्नी अजरा खातून और भाई इमरान ने बताया कि मरीज को डॉक्टरों ने पूरी तरह फिट बताया था। सभी जांचे पूरी तरह सामान्य थीं और ऑपरेशन के लिए चार यूनिट ब्लड भी जमा कराया गया था। परिवारीजनों का आरोप है कि डॉक्टरों ने मरीज को गलत दवा दे दी जिसकी वजह से हालत बिगड़ी। तीन दिन बाद मरीज का वॉल्व बदला जाना था।

इसके लिए असाध्य रोग के तहत वॉल्व बदलने के लिए सरकार से एक लाख रुपये की फीस भी जमा हो गई थी। विभाग के सीनियर और रेजीडेंट डॉक्टरों ने जमकर लापरवाही बरती। मरीज के पेट में सूजन देखने के बाद भी डॉक्टरों ने गैस्ट्रो के डॉक्टर को नहीं बुलाया। डॉक्टर बस यही कहते रहे कि सूजन बढ़ती रही तो दिक्कत बढ़ सकती है।

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