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यूपी विधानसभा उपाध्यक्ष चुनाव: नतीजे से ज्यादा निहितार्थ अहम, 2022 के लिए पक्ष-विपक्ष ने बिछाई भावी बिसात

Tue, 19 Oct 2021 04:02 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Tue, 19 Oct 2021 04:02 PM IST
सार

यूपी विधानसभा उपाध्यक्ष के चुनाव में भाजपा समर्थित प्रत्याशी का जीतना तय था पर इन चुनाव से राजनीतिक दलों ने 2022 के लिए सियासी संकेत दे दिए हैं। पढ़ें, वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश वाजपेयी की एक रिपोर्ट

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See what is the political message of UP Vidhansabha Deputy Chief Election result.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व कैबिनेट मंत्री सुरेश खन्ना (बायें) व विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित। - फोटो : amar ujala

विस्तार

यूपी विधानसभा उपाध्यक्ष के चुनाव में भाजपा की जीत और सपा की हार से ज्यादा इस नतीजे के निहितार्थ को समझने की जरूरत है। विधानसभा चुनाव को अब जब पांच माह से भी कम वक्त बचा है, तब इस चुनाव को कराना अपने आप में कई सियासी संदेश व संकेत दे रहा है। इसमें उम्मीदवारों के चेहरों के सहारे चुनावी चौसर पर सियासी दलों ने जातियों को साधने और विरोधी को घेरने की रणनीति बनाने की कोशिश की है। साथ ही इस चुनाव के सहारे पक्ष व विपक्ष की वर्ष 2022 की चुनावी बिसात पर अपनी-अपनी गोटें आगे बढ़ाने और बचाने के साथ साख को बचाने की चिंता भी दिख रही है।

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जहां तक जीत और हार का सवाल है तो विधानसभा सदन में विधायकों की दलीय संख्या देखते हुए शायद ही किसी को भाजपा की जीत पर शंका रही हो। रही बात क्रॉस वोटिंग की तो भाजपा समर्थित और सपा समर्थित उम्मीदवार के बीच में वोट का अंतर इतना ज्यादा था, जिसके मद्देनजर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इतने बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग की संभावना कम ही थी। अगर हुई भी है तो वह इतनी बड़ी नहीं है, जिससे राजनीतिक समीकरणों में बड़ा उलटफेर दिख रहा हो।
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इस चुनाव में भाजपा के पास अपने विधायकों के साथ सहयोगी और बसपा, रालोद, कांग्रेस व निर्दल समर्थक विधायकों के वोटों का आंकड़ा 316 था। शेष की संख्या 100 के अंदर। एक मनोनीत सदस्य सहित 404 सदस्यीय विधानसभा सदन में सात रिक्त स्थानों के बाद 397 विधायकों में 368 के ही मतदान में शामिल होने और इसमें भी वैध निकले 364 मतों में भाजपा समर्थित नितिन अग्रवाल को अनुमानित 316 से कम 304 ही मत मिलना कुछ इशारा तो करता है। पर, यह भाजपा के अभी सब पर भारी होने का संदेश पूर्ववत कायम नजर आ रहा है।
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सपा को मिले 60 वोटों की संख्या थोड़ा ही सही, लेकिन उसका हौसला बढ़ाएगी। वह इसे आधार बनाकर पार्टी में बिखराव न होने का दावा कर सकेगी। पर, यहां आज पड़े वोट और पार्टियों को मिले मतों की गणित से ज्यादा इसके गुणाभाग से 2022 के चुनाव के लिए निकल रहे राजनीतिक फलितार्थ को समझने और मतदान से दूर रहे विधायकों व दलों की मंशा समझना ज्यादा दिलचस्प दिख रहा है।

भाजपा का वैश्यों को साधने के साथ समीकरणों पर ध्यान

पहले बात परिणामों की तो नतीजों से भाजपा और सपा दोनों की मंशा पूरी होती दिख रही है। भाजपा ने प्रदेश की सियासत के चर्चित किरदारों में शुमार पूर्व मंत्री व पूर्व सांसद नरेश अग्रवाल के पुत्र व सपा के बागी नितिन अग्रवाल को विधानसभा उपाध्यक्ष निर्वाचित कराकर एक तरह से केंद्र और प्रदेश में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में उत्तर प्रदेश के वैश्यों में से किसी को जगह न मिल पाने की भरपाई करने का संदेश दिया है। हालांकि दोनों जगह मंत्रिमंडल में पहले से वैश्यों का प्रतिनिधित्व है, लेकिन विस्तार में जगह न मिलने से भाजपा को लग रहा था कि कहीं विपक्ष इसको लेकर सवाल न खड़ा करने लगे।

नितिन को उपाध्यक्ष बनाकर भाजपा ने वैश्यों को पूरा सम्मान देने के साथ अपने दलों को छोड़कर साथ आने वालों का ख्याल और समायोजन की चिंता का संदेश देने के साथ विकल्प तलाश रहे नेताओं को मूक आमंत्रण भी दिया है। कहा जा सकता है कि भाजपा के साथ बसपा के अनिल सिंह, कांग्रेस के राकेश सिंह व अदिति सिंह और रालोद व निर्दलीय भी हैं, फिर नितिन को ही क्यों?

इसका उत्तर सिर्फ  इसी से मिल जाता है कि सदन में संख्या के लिहाज से भाजपा के बाद सपा ही आती है। फिर नितिन के सहारे भाजपा वैश्यों को संदेश देने के साथ यह भी कहने की स्थिति में आ गई कि उसने मुख्य विपक्षी दल को यह पद दिया। साथ ही सिर पर खड़े विधानसभा चुनाव के मद्देनजर नरेश जैसे सियासी शख्स के संभावित कदमों से भाजपा की साख पर पड़ने वाले असर को भी टाल लिया है। यही नहीं, ऐसा करके भाजपा ने विपक्ष में बिखराव का भी राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।

हार में छिपी सपा की भविष्य की तैयारी

राजनीतिक विश्लेषक प्रो. एपी तिवारी बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री और समाजवादी नेता स्व. चंद्रशेखर अकसर कहते थे कभी-कभी हारकर भी भविष्य में जीत और जनाधार बढ़ाने के समीकरण तलाशे जाते हैं। सपा हार जरूर गई है, लेकिन उसने इस चुनाव के जरिए पिछड़ों के वोट के मुद्दे पर भाजपा को घेरने की बिसात बिछाने की पूरी कोशिश की है। साथ ही नितिन और नरेश का सपा से कोई वास्ता न होने का संदेश भी देने का प्रयास किया है। प्रो. तिवारी की बात सही है।

मौजूदा परिस्थितियों पर नजर दौड़ाएं तो सपा के लिए ऐसा जरूरी भी हो गया था। सपा के बागी नितिन के भाजपा के समर्थन से उम्मीदवार बनने के बाद भी अखिलेश मुकाबले में किसी को न उतारते तो नकारात्मक संदेश जाता। लोग मानते कि नरेश अग्रवाल के साथ सपा की नरमी में कुछ न कुछ तो जरूर है। यह भी संदेश निकलता कि शायद सपा भाजपा का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। इसलिए बचना चाह रही है। जाहिर है कि इसका सपा को राजनीतिक नुकसान ज्यादा होता। चुनाव लड़कर और अपने विधायकों की संख्या से ज्यादा वोट अपने उम्मीदवार को दिलाकर सपा ने यह कहने का आधार तो तलाश ही लिया कि भाजपा का मुकाबला वही कर सकती है।

पार्टी में कोई बिखराव नहीं है। उल्टे दूसरी पार्टी के लोग उससे जुड़ रहे हैं। सपा ने इस चुनाव में भाजपा के समर्थन से मैदान में उतरे वैश्य उम्मीदवार नितिन के मुकाबले अपना कुर्मी प्रत्याशी दिया। जाहिर है कि अखिलेश ने इस चुनाव के जरिये गैर यादव पिछड़ों को भी सपा में  महत्व देने के साथ सियासी बिसात पर भाजपा को उसी के कोर वोट कुर्मियों के बीच घेरने के मोहरे बैठाने की कोशिश की है। आज बिछाई गई बिसात के दांवपेंच की झलक आने वाले दिनों में सियासी मंचों से दिखेगी।

कांग्रेस व बसपा का बिखराव पर बचाव

कांग्रेस और बसपा ने इस चुनाव में मतदान से दूर रहकर एक तरह से चुनावी दहलीज पर खड़े प्रदेश में अपने बिखराव की यादें ताजा होने से रोकने की कोशिश की है। दोनों पार्टियों के नेताओं को यह हकीकत मालूम ही थी कि उनके पास इतने विधायक नहीं है, जिनके आधार पर वे इस चुनाव में कोई निर्णायक भूमिका निभा सकें।

उल्टे यह खतरा जरूर था कि पार्टी से रिश्ता तोड़ चुके विधायकों के अलावा एक-दो अन्य ने भी कहीं इस मौके पर पाला बदल लिया तो चुनावी माहौल बनाने की कोशिशों पर पानी फिर सकता है। इसलिए दोनों दलों ने फिलहाल अपनी मुट्ठी को खोलने के बजाय बंद रखना ही मुनासिब समझा।

रही बात अन्य कुछ विधायकों के मतदान से गैरहाजिर रहने की तो यह भी काफी महत्वपूर्ण है। संकेत साफ  है कि प्रदेश में अभी कुछ विधायक सियासी हवा का रुख भांप रहे हैं। जो आने वाले दिनों में पाला बदल के रूप में सामने आएगा। इसलिए इन लोगों ने आज मतदान से गैरहाजिर रहकर नई विधानसभा में अपनी हाजिरी सुनिश्चित करने के समीकरणों पर काम करने का विकल्प बचाए रखने की कोशिश की है।

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