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गोल्डन ऑवर में इलाज न मिलने से दम तोड़ रहे मरीज

Sun, 10 Nov 2013 01:50 AM IST
मनीष कुमार सिंह/लखनऊ
मनीष कुमार सिंह/लखनऊ Updated Sun, 10 Nov 2013 01:50 AM IST
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scarcity of educated ambulence staff

मार्ग दुर्घटना में लोगों की मौत का कारण खराब सड़कों से ज्यादा समय पर उचित इलाज का न मिलना है। गोल्डन ऑवर में इलाज नहीं मिलने से ज्यादातर घायलों की सांसें थम जाती हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि गोल्डन ऑवर में अगर मरीज को जरूरी बेसिक इलाज भी मिल जाए तो उसे बचाया जा सकता है। इसके उलट एंबुलेंस स्टाफ के प्रशिक्षित नहीं होने से समस्या बढ़ जाती है।
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शनिवार को साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में 59वें इक्सिसकॉन-2013 में दूसरे दिन केजीएमयू के सर्जरी विभाग के विशेषज्ञ डॉ. समीर मिश्रा ने एमपी महादेवन बेस्ट रिसर्च पेपर अवॉर्ड सेशन के दौरान ‘एपिडिमोलॉजी ऑफ ट्रॉमा क्लिीनिकल एंड प्रिवेंटिव प्रिस्पेक्टिव’ विषय पर अपनी स्टडी साझा की।
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उन्होंने बताया कि वर्ष 2011-12 में लखनऊ में किए गए शोध के अनुसार, हादसे में घायल पाए गए 3,429 मरीजों में से सिर्फ दस को ही ‘गोल्डेन ऑवर’ में इलाज मिल सका।

अगर किसी व्यक्ति को हादसे में या किसी अन्य कारण से गंभीर चोट लगती है तो उसे तुरंत फुली इक्विप्ड मेडिकल एंबुलेंस में ऑन रोड प्री हॉस्पिटल केयर मिलनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पाता है।

डॉ. मिश्रा ने बताया कि इसकी वजह सरकारी या अन्य एंबुलेंस सेवाओं में स्टाफ का प्रशिक्षित न होना है। इससे मरीज अस्पताल आते-आते दम तोड़ देता है। मेडिकल स्टाफ को बेसिक लाइफ सपोर्ट ट्रेनिंग प्रोग्राम देना जरूरी होता है।


पूरे प्रदेश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। हादसों से हो रही मौतों के आंकड़े को प्रॉपर मेडिकल केयर ट्रीटमेंट से कम किया जा सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, हादसों में घायल होने वाले 73 फीसदी लोग वयस्क, जबकि 27 फीसदी बच्चे होते हैं। ट्रॉमा में 64 फीसदी मरीज सड़क हादसों के होते हैं, जबकि 23 फीसदी मरीज ऊंचाई से गिरकर घायल होने वाले होते हैं।

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