हथेली में भी होने लगा जानलेवा कैंसर, पढ़िए इसके लक्षण...
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रीढ़ और हाथ-पैर की हड्डी में पाया जाने वाला इविंग सारकोमा कैंसर हथेली में होने लगा है। दावा किया जा रहा है कि विश्व में अब तक का ये सातवां मामला है और ये लाइलाज बीमारी है।
हथेली में सूजन के बाद बाराबंकी का एक मरीज लोहिया संस्थान पहुंचा तो पैथोलॉजी जांच में कैंसर की पुष्टि हुई। डॉक्टर का कहना है कि ये कैंसर अधिकतर बच्चों को हड्डी में होता है। हथेली यानि सॉफ्ट टिशु में कैंसर एक अलग मामला है।
लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के पैथोलॉजी विभाग के डॉ. सुब्रत चंद्रा ने बताया कि बीते नवंबर में बाराबंकी का एक 42 वर्षीय व्यक्ति दाहिने हथेली में सूजन की शिकायत लेकर संस्थान आया। पैथोलॉजी में फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी (एफएनएसी) जांच की गई जिससे सूजन का कारण पता चल सके।
उसके हाथ में करीब 4 से 5 इंच तक सूजन थी। जांच में पता चला कि मरीज की दाहिने हथेली में राउंड सेल ट्यूमर का गुच्छा था जो कैंसर का बड़ा कारण हो सकता है।
जांच में पता चला कि हथेली में कैंसर से पीड़ित मरीज दूसरी स्टेज में संस्थान पहुंचा था। सारकोमा कैंसर की खोज करने वाले डॉ. सुब्रत चंद्रा ने देहरादनू में 18 से 20 नवंबर तक इंडियन एसोसिएशन ऑफ साइटोलॉजी वर्कशॉप में इस लाइलाज बीमारी की प्रेजेंटेशन भी दी।
देश-विदेश से आए डॉक्टरों ने सारकोमा कैंसर की स्टडी रिपोर्ट एक साथ साझा कर जानकारी एकत्र की और भविष्य में ऐसे मरीजों के इलाज को लेकर चर्चा की गई। अमेरिका, यूरोप भारत समेत कुछ चुनिंदा देशों में अब तक छह मामले मिले हैं जिसमें राजधानी लखनऊ में पहला मरीज मिला है।
हाथ-पैर की सूजन को नजरअंदाज ना करें
डॉ. सुब्रत चंद्रा बताते हैं कि हथेली में कैंसर लेकर पहुंचे मरीज की जांच में पुष्टि हुई तो उसके इलाज की पूरी तैयारी की गई। इसके बाद मरीज कई बार संस्थान इलाज के लिए आया लेकिन नवंबर के मध्य के बाद उसने आना बंद कर दिया। मरीज से कई बार फोन कर संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उससे बात नहीं हो सकी।
डॉ. सुब्रत चंद्रा बताते हैं कि शरीर के किसी मांस वाले हिस्से में सूजन है तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। शरीर में किसी तरह की सूजन लंबे समय से है तो हो सकता है कि वो ट्यूमर हो। ट्यूमर सेल्स जैसे-जैसे फैलती है सूजन अधिक होने लगती है।
ऐसे में तुरंत डॉक्टरी सलाह के साथ बायोप्सी जांच जरूरी हे। समय पर इलाज शुरू न होने से मांस में कैंसर तेजी से फैलता है और इससे सबसे अधिक नुकसान शरीर के मुख्य अंगों को होता है और गंभीर स्थितियों में मरीज ऑर्गन फेल्योर का शिकार हो जाता है।