दोस्तों से मिलने जाता हूं, वो खाना बनवा लेते हैं: संजीव कपूर
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लखनऊ आते हैं तो खाने में पहली पसंद क्या रहती है?
मेरठ में काफी समय रहा हूं, वहां की गुड़ रेवड़ियां पसंद थीं। यहां की रेवड़ियां शक्कर की होती हैं, लेकिन होती बड़ी टेस्टी हैं। इसके अलावा कबाब।
लेकिन बाहर का खाने से बचता हूं। पिछली बार जब आया तो चौक की मशहूर दुकान पर किसी से मिलने गया तो वहां बाहर निकलने पर सैकड़ों लोग गलियों में जमा हो गए।
मुझे लगा कि हीरो हिरोइन भी होंगे, बाद में पता चला कि वो सब मुझे ही देखने, मिलने फोटो खिंचाने आए थे। उसके बाद से किसी रेस्तरां वगैरह में जाने से बचता रहता हूं।
वैसे लखनऊ खान-पान के शौकीनों का शहर है। बाहर कहते हैं कि लखनऊ खवइयों का शहर है। वैसे सादा-सिंपल फूड मेरी प्राथमिकता में रहता है।
22 साल बाद संजीव किन अनुभवों से दो-चार हो रहे हैं?
एक तो अब खाना बनाना सांस लेने जैसा हो चला है, दूसरा अब खाना बनाने के टिप्स एयरपोर्ट पर भी शेयर हो रही हैं। कहीं भी आओ जाओ एयरपोर्ट पर लोग दौड़कर फोटो खिंचवा कर कोई न कोई टिप्स शेयर करने लगते हैं।
इनमें बच्चों की अच्छी खासी तादाद है। लखनऊ में उतरते ही लोगों से सामना हो गया। अच्छी बात है कि नई पौध कुकिंग की ओर झुक रही है। दुनिया भी वेजी हो रही है।
‘पापा भी दिखते हैं किचन में’
22 साल बाद संजीव किन अनुभवों से दो-चार हो रहे हैं?
इनमें बच्चों की अच्छी खासी तादाद है। लखनऊ में उतरते ही लोगों से सामना हो गया। अच्छी बात है कि नई पौध कुकिंग की ओर झुक रही है। दुनिया भी वेजी हो रही है।
कुकिंग स्टाइल देश में क्या बदलाव लाई है या और कितना बदलाव लाएगी?
जरा अब किचन या कुकिंग से जुड़े ऐड देखिए। पापा भी किचन में दिखते हैं। ये बदलाव आया है। दो दशक पहले ऐसा नहीं था। वहीं आपस में इसको लकर चर्चा भी बढ़ी है।
हम खाना पेट भरने के लिए पकाते हैं। लोग उसे अब बिजनेस की तरह लेते हैं। देशी-विदेशी न जाने कितने चैनल हैं जिन पर कुकिंग टीवी शो 24 घंटे चलता है। इंटरनेट पर कुकिंग वेबसाइट्स की बूम आई हुई है। अब कुकिंग फैशन सरीखा बनता जा रहा है।
दिल से पकाएं खाना
कुकिंग को लेकर लखनऊ के अनुभव शेयर करना चाहेंगे?
पहला टीवी रियलिटी कुकरी शो मैंने यहीं से शूट किया। विनर भी लखनऊ की रहीं। उसके बाद जब मास्टर शेफ की शुरुआत हुई तो पहली विनर भी यहीं की पंकज भदौरिया रहीं। अब जब ऑडिशन हो रहा है तो यहीं हो रहा है। तमाम सारे अनुभव हैं लखनऊ को लेकर।
खाने को कैसे परिभाषित करना चाहेंगे आप?
न्यूट्रीन, टेस्ट, प्रजेंटेशन और सुलभ। बस खाना ऐसा ही होना चाहिए। हां, बस पकाया दिल से गया हो, क्योंकि हीरे-मोती लगाकर खाने में स्वाद नहीं आता।
1992 से ऑन स्क्रीन पका रहा हूं, कितनी डिशेज बना डाली याद भी नहीं। अब तो लोग शेफ संजीव की बजाय कपूर साहब भी कहने लगे हैं। सुनने में ये राज साहब की ही तरह लगता है।