'खुशनसीब हूं कि मैं लखनऊ में पैदा हुआ'
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‘नॉस्टेल्जिया’ यानी बीते वक्त की यादें छन-छन कर स्मृतियों में आए-जाए। जो बुरा है वह निकल जाए और जो अच्छा है वह हमेशा याद रहे और मन को गुदगुदाता रहे। बस ऐसी ही हैं मेरे जेहन में बसीं लखनऊ की यादें।
समय की छलनी में छन कर मेरी स्मृतियों में जो बचा है, उसके अनुसार लखनऊ यानी शांत, खुला और तहजीबयाफ्ता शहर। यहां जोर से बोलना तो दूर, पीक थूकने की भी एक तहजीब हुआ करती थी।
मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मेरी पैदाइश उस शहर की है, जहां अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, यशपाल और रघुवीर सहाय जैसी हस्तियां रहती थीं।
सच कहूं तो लखनऊ ऐसी साहित्यिक संपदा से समृद्ध रहा है, जिसकी पहचान राष्ट्रीय ही नहीं ,बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर रही। नागरजी से तो मिलने का भी सौभाग्य मुझे मिला।
मध्यम वर्ग के लिए मुफीद
इस शहर की खास बात जो लुभाती है कि यह मध्यम वर्ग के लोगों की जरूरतों के मुताबिक रहा है। मैं खुद सरकारी स्कूल में पढ़ा। बीमार पड़ने पर सरकारी अस्पताल में दिखाया जाता था।
लोग बाहर से पढ़ने, नौकरी करने यहां आते और यहीं की संस्कृति में ढल जाते, लेकिन अब वह बात नहीं रही। सरकारी स्कूल और अस्पताल मतलब, घटिया क्वालिटी।
आप ही सोचिए, आज भला कौन अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना पसंद करता है, जबकि यही वह शहर है जहां के प्रोडक्ट डॉ. नरेश त्रेहन जैसे लोग हैं।
युवाओं को आगे बढ़ाने की थी सोच
दिल दुखता है जब देखता हूं कि लखनऊ और यहां के लोग किस कदर बदल रहे हैं। राजीव जैन, रोशन अब्बास, अनूप जलोटा, मीरा सेठ जैसे अनगिनत नाम हैं, जो लखनऊ की सरजमीं से जुड़े हैं।
दरअसल इनकी परवरिश जिस माहौल में हुई, जिन्होंने इन्हें राह दिखाई, वे भी खुद में एक प्रतिष्ठित नाम और संस्था हुआ करती थीं।
मेरा अपना अनुभव है कि उस दौर में लोग युवा पीढ़ी के विकास के लिए सोचा करते थे। वे जो कुछ भी करते थे, उसके पीछे अपनी थाती छोड़ कर जाने की एक इच्छा थी। वे गहराई से अपनी सरजमीं से जुड़े लोग थे।
कबाब, नवाब से कहीं ज्यादा है यह शहर
जब भी लखनऊ की बात होती है तो इसकी पहचान लोग कबाब और नवाब से ज्यादा करते हैं। यही वजह है कि कुंअर नारायण जैसे व्यक्ति ने खिन्न होकर इस शहर को छोड़ दिया।
अरे भाई, यह शहर इससे बहुत ज्यादा है। जब संस्कृति की बात कीजिए तो कितने मॉल बने यह न देखिए। कितने और कैसे मानव बन रहे हैं, इस पर भी जरा विचार कीजिए। युवाओं के प्रति ज्यादा से ज्यादा प्रोग्रेसिव होने की जरूरत है।
प्रतिष्ठित संस्थाओं का शहर
भातखंडे संगीत संस्थान, आर्ट्स कॉलेज, सीडीआरआई, आरडीएसओ, हाईकोर्ट जैसी इमारतें और संस्थान लखनऊ के माथे का टीका हुआ करती थीं। हालांकि, अब इनक रुतबा घटा है।