राम मंदिर निर्माण की जमीन तैयार करने में जुटा संघ, पूरी ताकत झोंकी, पहले से तय कार्यक्रम रद्द
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राम मंदिर पर भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी में सुनवाई तय की हो, पर पर्दे के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। उसने पहले से तय कार्यक्रम और पदाधिकारियों के सामान्य प्रवास स्थगित करते हुए पूरी ताकत मंदिर निर्माण की मांग को लेकर अयोध्या, बंगलूरू, नागपुर और दिल्ली में हो रही संतों की धर्मसभाओं की सफलता में लगाने का फैसला किया है।
सभी पदाधिकारियों से कहा गया है कि प्रवास अब सिर्फ राम मंदिर निर्माण का वातावरण बनाने और जरूरत पड़ने पर इस मुद्दे को लेकर फिर आंदोलन की जमीन तैयार करने पर केंद्रित रहें। वैसे इस फैसले के पीछे संघ की अपनी साख बनाए रखने और समर्थकों को सहेजने की चिंता भी मानी जा रही है।
संघ ने 90 के दशक की तरह मंदिर मुद्दे पर जमीन तैयार करने और लोगों को जुटाने की जिम्मेदारी प्रचारकों को सौंप दी है। प्रचारक जगह-जगह बैठकें करके लोगों से श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पर मुखर और सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान कर रहे हैं। बैठकों में संघ परिवार के सभी संगठनों के प्रतिनिधि बुलाए जा रहे हैं।
सभी को 25 नवंबर को अयोध्या में होने वाली धर्मसभा में लोगों को पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। राजधानी लखनऊ में शनिवार को संघ परिवार की बैठक हुई तो रविवार को अयोध्या में बैठक कर इस सिलसिले में भाजपा सहित सभी संबंधित संगठनों के प्रतिनिधियों को धर्मसभा की सफलता की जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रखंड स्तर पर भी बैठकें शुरू हो गई हैं।
इस तरह तैयार हो रही रणनीति
संघ की कोशिश है कि मंदिर पर आंदोलन सियासी खेमेबाजी में न उलझे। इसलिए उसकी रणनीति 1990 की तरह इस बार भी प्रत्यक्ष तौर पर मंदिर आंदोलन की कमान पूरी तरह संतों और हिंदुओं के हाथों में रहने का संदेश बनाए रखने की है। बैठकों में सभी को आगाह किया जा रहा है कि संघ से जुड़े किसी संगठन या भाजपा का नाम कहीं आगे नहीं आना चाहिेए।
कोशिश यह भी
माना जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के रुख के साथ-साथ मंदिर निर्माण की मांग को लेकर कानून बनाने के लिए मुखर हो रहे संतों के स्वर, विहिप के बागी डॉ. प्रवीण भाई तोगड़िया और भाजपा की सहयोगी शिवसेना के तेवरों ने भी संघ को इस मद्दे पर सक्रिय होने को मजबूर कर दिया है।
राजनीति शास्त्रियों का कहना है कि संघ जानता है कि चुप या तटस्थ रहने से उसकी साख प्रभावित होगी। हिंदुओं में भरोसा घटेगा। इसीलिए वह संतों के साथ खड़े होकर यह संदेश साफ रखना चाहता है कि हिंदू हित, संस्कृति और स्वाभिमान उसके लिए सर्वोपरि है।
मंदिर निर्माण के लिए केंद्र और प्रदेश में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकारें जरूरी
संघ के रणनीतिकार जानते हैं कि अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए केंद्र और प्रदेश में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकारें जरूरी हैं। राज्यसभा में भाजपा का बहुमत न होने से मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की राह में खड़ी बाधा से भी संघ के लोग परिचित हैं। पर, वे चाहते हैं कि यह संदेश भी बना रहे कि संघ ही नहीं बल्कि भाजपा की सरकारें भी मंदिर निर्माण के पक्ष में हैं।
इससे सरकार यदि मंदिर निर्माण को लेकर कोई पहल करे तो उसके पास यह कहने का आधार रहे कि जनमत की अनदेखी कहां तक की जाए। साथ ही किसी तकनीकी दिक्कत से यदि यह काम अभी न हो पाए तो भी ऐसा माहौल रहे जिससे भाजपा की वापसी के समीकरण आसान हो जाएं ताकि इस बार नहीं तो अगली सरकार में मंदिर निर्माण के एजेंडे पर काम पूरा किया जा सके।
मकसद यह तो नहीं
संघ की कोशिश इस बहाने हिंदू समाज को पूरी तरह एकजुट करने की है। नजरें कहीं न कहीं 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी टिकी हैं। प्रदेश में जिस तरह भाजपा विरोधी दलों के बीच गठबंधन की आहट सुनाई दे रही है। इसके चलते भी संघ का प्रयास है कि हिंदुओं को एकजुट कर गठबंधन के जातीय गणित को कमजोर किया जाए जिससे भाजपा की राह बहुत मुश्किल न होने पाए। संघ को पता है कि हिंदुत्व के एजेंडे को परवान चढ़ाने में भाजपा ही सहायक सिद्ध हो सकती है।
धर्मसभाओं की सफलता के लिए प्रत्येक रामभक्त तत्पर
विश्व हिंदू परिषद के क्षेत्र संगठन मंत्री अंबरीष सिंह का कहना है कि धर्मसभाओं की सफलता के लिए प्रत्येक रामभक्त तत्पर है। अयोध्या में दिव्य और भव्य मंदिर निर्माण हो, यह संकल्प हम सबका है। संघ परिवार का प्रत्येक संगठन धर्मसभा की सफलता के लिए जुटा है। हिंदुओं की श्रद्धा, भक्ति और आस्था के केंद्र श्रीराम जन्मभूमि के लिए लाखों रामभक्तों ने प्राणों की आहुति दी है। पर, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हिंदुओं की आस्था के केंद्र को प्राथमिकता नहीं देते हैं तो देश की जनता को यह बताना जरूरी हो गया है कि मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिंदू परिषद सहित पूरा संघ परिवार हरसंभव कोशिश करेगा।