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जानिए ‘शह-मात’ के खेल में शिवपाल को कितना हुआ नुकसान

Mon, 19 Sep 2016 11:10 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 19 Sep 2016 11:10 AM IST
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remaining budget under shivpal yadav after losing pwd
डेमो प‌िक - फोटो : amar ujala
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव के बीच अधिकारों की लड़ाई समझौते के फार्मूले पर जरूर ठंडी पड़ गई, पर इस लड़ाई में दोनों को ही बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। शिवपाल के लिए पीडब्ल्यूडी जैसा बड़ा महकमा जाना घाटे का सौदा माना जा रहा है। 
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पूर्व के महकमों से शिवपाल के पास चालू वित्त वर्ष 2016-17 में करीब 66,480 करोड़ का बजट आता। पीडब्ल्यूडी जाने के बाद यह आधे से भी कम 26,019 करोड़ रह गया है। पीडब्ल्यूडी का बजट 40460.81 करोड़ रुपये है। 
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एक के बदले तीन नए महकमे देकर पुराने बजट की भरपाई की कोशिश जरूर की गई है, लेकिन उससे जुड़ने वाले 33,500 करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा नॉन प्लान (वेतन, भत्ते जैसे खर्च) व छात्रवृत्ति जैसे मदों में जाएगा। इसमें मंत्री अपने विवेक से खर्च नहीं कर पाएंगे। 
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दरअसल, सरकार में लोक निर्माण महकमे को बहुत अहम माना जाता है। भारी भरकम बजट वाले इस विभाग में काम से न सिर्फ मंत्री का बड़ा नाम होता है, बल्कि वह नेताओं, कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों को भी उपकृत कर सकता है।

विपक्षी भी लगाते हैं चक्कर

remaining budget under shivpal yadav after losing pwd
डेमो प‌िक - फोटो : amar ujala

विपक्षी दल के विधायक तक अपने क्षेत्रों में सड़कों के लिए अर्जी लिए उसके चक्कर लगाते देखे जाते हैं। ठेकेदारी आदि के जरिए कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने में भी उसकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। 

जिस भी इलाके में काम होता है, वहां के जनप्रतिनिधि के इशारे पर ही ठेकेदार तय होता रहा है। अपने चुनाव क्षेत्र या जिले में अपना ठेकेदार ना लगाने पर अक्सर मंत्रियों तक में तकरार होती रही है। सपा के सत्ता में आने पर शिवपाल इस महकमे को अपने पास ही रखते आए हैं। 

मतभेद के बाद मुख्यमंत्री ने लोक निर्माण विभाग के बदले शिवपाल को समाज कल्याण, लघु सिंचाई और चिकित्सा शिक्षा (आयुष) जैसे नए महकमे दिए। इनका कुल बजट करीब 33500 करोड़ ही होता है। 

इसमें सबसे ज्यादा बजट 27887 करोड़ रुपये समाज कल्याण महकमे का है, जिसमें छात्रवृत्ति व वेतन, भत्ते जैसे वचनबद्ध खर्च ज्यादा हैं। जो नए विभाग जुड़े हैं, उनसे उसमें वह लोगों को उपकृत करने की भूमिका में ज्यादा नहीं रह गए हैं।

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