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केजीएमयू में धर्मांतरण : शिकायतों को दबाने पर घिरे अफसर-डॉक्टर, चार विभागों में नेटवर्क एक्टिव होने के साक्ष्य

Sun, 01 Nov 2026 11:25 PM IST
Ishwar Ashish Bhartiya अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: Ishwar Ashish Bhartiya Updated Sun, 01 Nov 2026 11:25 PM IST
सार

यूपीएसटीएफ की रिपोर्ट में डॉक्टरों के अलावा नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोपों के दायरे में पैथोलॉजी, मेडिसिन, बायोकेमिस्ट्री समेत अन्य विभागों से जुड़े लोग शामिल हैं। 

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Religious conversion at KGMU: Officials and doctors under fire for suppressing complaints
- फोटो : amar ujala

विस्तार

केजीएमयू में धर्मांतरण और महिला डॉक्टरों के शोषण से जुड़े मामलों में अब संस्थान के डॉक्टरों और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। एसटीएफ की जांच रिपोर्ट में पैथोलॉजी, गांधी वार्ड, माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी समेत कई विभागों में नेटवर्क सक्रिय होने के साथ शिकायतों को दबाने के तथ्य सामने आए हैं। जेल में बंद रेजिडेंट डॉक्टर रमीजुद्दीन के खिलाफ बार-बार शिकायतें मिलने के बावजूद समय रहते कार्रवाई न होने से भी प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

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जांच में महिला डॉक्टरों की शिकायतों को गंभीरता से न लेने और विभागीय स्तर पर मामले दबाने की भूमिका भी सामने आई है। एक वरिष्ठ प्रोफेसर के मुताबिक, पैथोलॉजी विभाग में महिला डॉक्टर की शिकायत मिलने पर विभागाध्यक्ष को तत्काल कुलपति को इसकी जानकारी देनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। महिला रेजिडेंट के महिला आयोग पहुंचने के बाद ही प्रशासन सक्रिय हुआ।
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नर्सिंग स्टाफ से डॉक्टरों तक पर आरोप
एसटीएफ की रिपोर्ट में डॉक्टरों के अलावा नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोपों के दायरे में पैथोलॉजी, मेडिसिन, बायोकेमिस्ट्री समेत अन्य विभागों से जुड़े लोग शामिल हैं। इससे संस्थान के भीतर अलग-अलग स्तरों पर संपर्क और सहयोग के नेटवर्क की आशंका गहराई है।
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कोविड के दौरान जमातियों को भर्ती कराने का मामला भी चर्चा में
जांच रिपोर्ट में नाम सामने आए एक डॉक्टर का जमातियों से करीबी संबंध होने का मामला वर्ष 2020 में भी सामने आया था। उस दौरान लखनऊ में जमातियों का जमावड़ा हुआ था। इनमें कई लोग कोरोना संक्रमित मिले थे और कुछ की हालत गंभीर होने पर उन्हें केजीएमयू में भर्ती कराया गया था।

आरोप है कि संबंधित डॉक्टर ने एक बीमार जमाती को सीधे ट्रॉमा सेंटर में भर्ती करा दिया था। इस दौरान ट्रायज एरिया में स्क्रीनिंग से जुड़े प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया। इससे दूसरी बीमारियों का इलाज करा रहे मरीजों में संक्रमण फैलने का खतरा पैदा हो गया था। बाद में कई मरीजों के संक्रमित होने के बाद मामला सामने आया और शासन ने जांच के आदेश दिए थे।


अब एसटीएफ की मौजूदा जांच में संबंधित डॉक्टर का नाम सामने आने के बाद पुराने मामले की भी चर्चा तेज हो गई है। इससे संस्थान में डॉक्टरों के प्रभाव, प्रशासनिक जवाबदेही और शिकायतों पर कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।

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