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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   UP: State ordered to pay Rs 2 lakh in compensation for depriving someone of their property for 70 years

यूपी: 70 साल से संपत्ति से वंचित रखने पर राज्य पर दो लाख रुपये हर्जाना, बकाया पर आठ फीसदी ब्याज भी देना होगा

Sun, 01 Nov 2026 11:11 PM IST
Ishwar Ashish Bhartiya अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: Ishwar Ashish Bhartiya Updated Sun, 01 Nov 2026 11:11 PM IST
सार

न्यायालय ने कहा कि 70 साल से अधिक समय तक संपत्ति से वंचित रखने की क्षति को ध्यान में रखते हुए वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर मुआवजा तय किया जाए। इसके लिए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 के प्रावधानों का पालन किया जाए। 

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UP: State ordered to pay Rs 2 lakh in compensation for depriving someone of their property for 70 years
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 70 साल से अधिक संपत्ति से वंचित रखने पर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य अधिकारियों पर दो लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को विवादित भूमि के वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर मुआवजा देने और निर्धारित समय में भुगतान करने का भी निर्देश दिया है। बकाया राशि पर आठ फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा।

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न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने दीपक कुमार गुप्ता और अन्य की ओर से 2021 में दाखिल याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के अपर मुख्य सचिव के नौ अक्तूबर 2023 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में मुआवजे का दावा खारिज कर दिया गया था। उन्होंने संबंधित प्राधिकारी को मुआवजा निर्धारित कर वैधानिक लाभों सहित भुगतान करने का निर्देश देने की मांग की थी।
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न्यायालय ने कहा कि 70 साल से अधिक समय तक संपत्ति से वंचित रखने की क्षति को ध्यान में रखते हुए वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर मुआवजा तय किया जाए। इसके लिए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 के प्रावधानों का पालन किया जाए। आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के दो महीने के भीतर दो लाख रुपये हर्जाना भी देना होगा। निर्धारित मानकों का पालन नहीं करने पर अतिरिक्त भुगतान करना होगा।
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यह है पूरा मामला: विवाद गाजियाबाद के भोंजा गांव, परगना लोनी, तहसील व जिला गाजियाबाद (पूर्व में मेरठ) स्थित गाटा संख्या 532-एम, 582-एम, 582/1 और 582/2 की करीब 98858.51 वर्ग गज भूमि से जुड़ा है। 

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता शोभित मोहन शुक्ल के अनुसार, भूमि मूल रूप से उत्तर रेलवे ने अपनी जरूरतों के लिए अधिग्रहित की थी। अतिरिक्त बची भूमि नीलामी में रखी गई जिसमें याचिकाकर्ताओं के पूर्वज मुकुंद दास उर्फ मुकुंद लाल सबसे ऊंची बोली लगाने वाले बने। एक लाख रुपये जमा करने पर उन्हें बिक्री प्रमाणपत्र जारी किया गया। दो जून 1945 को पंजीकृत विक्रय विलेख भी निष्पादित हुआ। 


याचिकाकर्ताओं ने उत्तराधिकारियों के माध्यम से दावा किया। स्वामित्व पर विवाद नहीं था। हालांकि, 29 सितंबर 1958 को तत्कालीन तहसीलदार एवं सहायक कलेक्टर प्रथम श्रेणी, गाजियाबाद ने यूपी जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 117(1) के तहत भूमि ग्राम सभा में निहित करने का आदेश दिया। इसके बाद मुआवजे को लेकर लंबा कानूनी विवाद चला।

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