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अकाल की आहट से पलायन को मजबूर हुए किसान

Wed, 10 Feb 2016 01:36 PM IST
शिशिर द्विवेदी/अमर उजाला, झांसी
शिशिर द्विवेदी/अमर उजाला, झांसी Updated Wed, 10 Feb 2016 01:36 PM IST
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real farmers condition in bundelkhand

यहां के रेलवे स्टेशन पर उतरते ही अकाल की आहट मिलने लगती है। चाहे दिल्ली की तरफ जाने वाली ट्रेन हो या फिर मुंबई, चेन्नई, अहमदाबाद की ओर जाने वाली ट्रेन, सभी के जनरल डिब्बों में घुसने की मारामारी है।

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प्लास्टिक की बोरियों में कुछ बर्तन व दो-चार दिन का राशन भरे बाहरी शहरों का रुख करने वाले ये वे किसान हैं, जो फसल तबाह होने के बाद पेट की आग बुझाने के लिए पलायन करने को मजबूर हैं।
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मऊरानीपुर ब्लॉक के धवाकर गांव के रामलाल रायकवार भी पत्नी व तीन बच्चों के साथ सूरत जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहे हैं। कुरेदने पर मानो फट पड़ते हैं- ‘साब, न दैव सुन रओ न दाता, ऐसे में इतै रये तो बस मरनई है’।
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सात बीघा जमीन के मालिक रामलाल कहते हैं- ‘घर में पांच सेर चून बचो तो, दो सेर की लुचईं बना लई रस्ता खों ओर बाकी बुरिया में रख लओ।

अब सूरत पोंच के कमायें तबईं मोड़ी-मोड़ा पल पयें’। यह कहानी रामलाल नहीं बल्कि उन जैसे हजारों किसानों की की है जो रोटी की तलाश में अपना गांव छोड़ गए हैं।

खरीफ की तबाही ने तोड़ी कमर

real farmers condition in bundelkhand

यानी, जमीन का मालिक धीरे-धीरे मजदूर बनता जा रहा है। झांसी जिले के बंगरा व मऊरानीपुर ब्लॉकों में सूखे ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया है। प्रशासन के पास किसानों के पलायन के कोई आंकड़े नहीं हैं, पर गांवों में हर दूसरे घर में लटकता ताला कहानी खुद बयां करता है।

झांसी-खजुराहो हाईवे पर ब्लॉक मुख्यालय बंगरा पहुंचते ही सूखे की छाया लंबी होने लगती है। मगरवारा की पहाड़ियों पर दूर-दूर तक सूखी झाड़ियों का साम्राज्य है, हरियाली के नाम पर इक्का-दुक्का बबूल या नागफनी ही दिखते हैं।

तीन साल से सूखे व फसलों पर कुदरती कोप का सामना कर रहे किसानों की कमर खरीफ की तबाही ने तोड़ दी है। करीब ढाई लाख हेक्टेयर में बोई गई खरीफ की फसल में से पौने दो लाख हेक्टेयर फसल सामान्य से एक तिहाई बारिश ही होने के कारण बर्बाद हो गई। सिर्फ तिल की ही छिटपुट फसल बच पाई।


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