यूपी: परिसीमन बाद से चौंका रहा है लखनऊ का चुनाव परिणाम, 2012 में सपा व 2017 में भाजपा ने किया था हैरान
लखनऊ की नौ विधानसभा सीटों का परिणाम परिसीमन के बाद से ही चौंका रहा है। आकलन के विपरीत वर्ष 2012 में सपा व 2017 में भाजपा ने अप्रत्याशित जीत दर्ज कराई थी।
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यूपी विधानसभा चुनावों में लखनऊ का मिजाज रहस्यमयी बनता जा रहा है। खासतौर पर परिसीमन के बाद हुए दो चुनावों में इसने अप्रत्याशित परिणाम दिए हैं। दोनों चुनावों में पूर्व में किए आकलन को शहर के मतदाताओं ने गलत साबित कर दिया। वर्ष 2012 में नौ में से सात सीटें हासिल कर सपा ने चौंकाया था तो 2017 में भाजपा ने नौ में से आठ सीटें लेकर सारे कयास झुठला दिए थे। इस बार क्या होगा? इसका परिणाम 10 मार्च को आएगा।
2012 के चुनावों को देखें तो शहर के क्षेत्रों में बदलाव के बाद पहली बार नौ सीटों पर चुनाव हुए थे। महोना सीट को खत्म करके बीकेटी व लखनऊ उत्तर नई सीट बनी थी। सपा में अखिलेश यादव की सक्रिय राजनीति की शुरुआत का यह पहला चुनाव था। ऐसे में प्रदेश में सपा का जोर तो था, लेकिन अटल का गढ़ रहे लखनऊ में भाजपा का दबदबा बना रहने के कयास लग रहे थे। वर्ष 2007 में आठ में से शहर की चार सीटों पर जीती भाजपा के लिए कहा जा रहा था कि 2012 में भी पार्टी को बहुत नुकसान नहीं होगा, लेकिन हुआ उल्टा। 2012 में नौ में से सात सीटों पर सपा ने जीत दर्ज कराई। सिर्फ लखनऊ पूर्व सीट पर भाजपा से वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र और कैंट से कांग्रेस से रीता बहुगुणा जोशी ने जीत दर्ज कराई। वहीं, लखनऊ पश्चिम, मध्य की परंपरागत सीट भी भाजपा ने खो दी। अधिवक्ता शचींद्र मिश्र कहते हैं कि शायद किसी को इस परिणाम का अनुमान नहीं था।
कुछ ऐसा ही 2017 के चुनावों में हुआ। भाजपा ने नौ में से आठ सीटें जीती। यही नहीं मलिहाबाद जैसी सीट जहां पार्टी कभी नहीं जीती थी, उसने वहां जीत के साथ खाता खोला। बीकेटी यानी पुरानी महोना सीट, जहां रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी एक बार हार चुके हैं, वहां जीत की उम्मीद 2017 में कम ही लोग लगाए थे, लेकिन यहां भी नए चेहरे के रूप में उतरे अविनाश त्रिवेदी भाजपा से जीते। वर्ष 1993 से सपा, बसपा के खाते में जाने वाली सरोजनीनगर सीट में भी पहली बार भाजपा से स्वाति सिंह ने जीत दर्ज कराई। सिर्फ मोहनलालगंज सीट भाजपा को नहीं मिली, जहां वह प्रत्याशी नहीं उतार सकी थी और आरके चौधरी को समर्थन दिया था।
लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. एसके द्विवेदी का कहना है कि एकतरफा परिणाम के बारे में तो सटीक कारण नहीं बताया जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि लखनऊ का मतदाता पढ़ा-लिखा व विश्लेषक है। खासतौर पर शहरी मतदाता प्रत्याशियों व पार्टियों को अपनी कसौटी पर कसने के बाद वोट देता है। इधर, यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। बाकी पार्टियों की ओर से उठाए जाने वाले मुद्दों पर भी वह विचार करता है। ऐसे में परिणाम भी बदल रहे हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संजय गुप्ता का कहना है कि राजनीति में संयोग के लिए बहुत स्थान नहीं होता। मेरा मानना है कि 2012 तक सपा, बसपा के नेतृत्व में ही सरकार जनता तलाश रही थी। 2014 के बाद उसे भाजपा में भी संभावना दिखी। साथ ही 2007 में पांच वर्ष के लिए सरकार चुनी गई तो लोगों को उनके काम का मूल्यांकन करने का मौका मिला। 2012 में इसीलिए बदलाव हुआ और फिर 2017 में भाजपा की सरकार बनी। अब जनता सोच समझकर, काम के आधार पर नेता चुन रही है।