इन रेप के मामलों में तो पुलिस ने ही दबा दिया सच
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ये वो मामले हैं जिनमें खुद पुलिस ने ही बलात्कार पीड़िताओं के साथ ज्यादती की। कभी उन्हें चरित्रहीन बता दिया तो कभी सत्ता के दबाव में मुजरिमों का बचाव किया।
बांदा में तत्कालीन बसपा विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी के आवास पर वहां काम करने वाली दलित महिला से दुराचार के मामले में विधायक को बचाने के लिए जिले के कप्तान से लेकर उच्च स्तर तक के अधिकारी जुट गए।
पुलिस ने सारी हदें तोड़ते हुए उल्टे पीड़िता को ही मोबाइल फोन चुराने का आरोप में जेल भेज दिया। जिले के कप्तान तक जेल में जाकर पीड़िता पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाते रहे।
ऐसा न करने पर गंभीर परिणामों की चेतावनी भी दी। मामले के तूल पकड़ने पर पुलिस को पीड़िता का मुकदमा दर्ज कर आरोपी विधायक की गिरफ्तारी करनी पड़ी। बाद में पीड़िता पर लगाए गए चोरी के फर्जी आरोप को वापस लिया गया।
दूसरा केस- छात्रा के चरित्र पर उठाए सवाल
कानपुर में कक्षा छह की छात्रा के साथ स्कूल परिसर में ही कॉलेज प्रबंधन से जुड़े एक व्यक्ति ने दुराचार किया।
अत्यधिक रक्तस्राव से छात्रा की मौत हो गई, लेकिन कॉलेज प्रबंधन के लोगों की सियासी पहुंच के कारण पुलिस ने आरोपियों को दबोचने के बजाय बच्ची के चरित्र पर ही लांछन लगा दिया।
संबंधित क्षेत्र के तत्कालीन सीओ जो इस समय डीजीपी मुख्यालय के एक आला अफसर के साथ तैनात हैं, ने तो बच्ची को चरित्रहीन साबित करने के लिए अपनी एक करीबी महिला डॉक्टर से इस बाबत बयान भी दिला दिया था कि बच्ची यौन क्रिया में अभ्यस्त थी।
जब मामले ने तूल पकड़ा तब पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया। वहीं, दो-एक अफसरों को निलंबित और कुछ का तबादला भी किया गया।
तीसरा केस- खाकी ने ही किया बलात्कार
निघासन थाने में तो पुलिसकर्मियों ने ही एक दलित मंदबुद्धि किशोरी के साथ दुराचार के प्रयास के दौरान उसकी गला दबाकर हत्या कर दी और थाना परिसर में गिरे पड़े पेड़ की डाल से उसे लटका दिया।
थाने में लाश बरामद होने की जानकारी पर कई आला अफसर भी मौके पर पहुंचे और मामले को आत्महत्या ठहराने की कोशिश की।
अफसरों ने अपने मातहतों को बचाने के लिए किशोरी के परिवार के सदस्यों पर दबाव भी बनाया। यह भी कोशिश की गई कि मीडिया मामले को अधिक तूल न दे, लेकिन बात बन नहीं पाई।
महिला आयोग व मानवाधिकार आयोग के दखल के बाद मामले की दोबारा जांच हुई तो असलियत सामने आई। इसके बाद थाने के कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया, लेकिन आला अफसरों पर कोई आंच न आई।
बदायूं कांड को अलग रंग देने की कोशिश
बदायूं कांड कोई पहला मामला नहीं है जब किसी सनसनीखेज अपराध को लेकर पुलिस ने मनमानी तफ्तीश की या घटना को कुछ और रंग देने की कोशिश की।
सरकार किसी भी दल की हो, पुलिस गंभीर अपराधों में सियासी आकाओं के इशारे या दबाव में मनमाने खेल करती है। ऐसे कई मामले हैं, जिनमें पुलिस के मनमाने रवैये और अफसरों की मनमर्जी से सरकारों की खासी किरकिरी हुई।
आला अफसरों का यह रवैया खास तौर पर ऐसे मामलों में सामने आया है, जिनमें कानून-व्यवस्था प्रभावित होने का अंदेशा रहा हो या फिर सियासी आकाओं की मंशा पर उसे अधिक हवा न देने की नीयत से काम हुआ।
ऐसे भी कई मामले रहे हैं, जिनमें राजनेताओं के दखल या आला अफसरों की सीधी संलिप्तता को नजरअंदाज करने के लिए अफसर मनमानी पर उतारू हुए।
सरकार पर बना दबाव
बदायूं कांड में जिस तरह दो नाबालिग लड़कियों के साथ गैंगरेप के बाद उनकी हत्या कर शव पेड़ से टांग दिए गए। इस वारदात को लेकर सियासी हलचल तो मची ही, कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर पहले से ही घिरी सरकार के सामने एक और परेशानी खड़ी हो गई।
मामले को किसी भी तरह संभालने के लिए आला अफसरों ने जिले के अफसरों को पीड़ित पक्ष की एकतरफा सुनवाई करते हुए कार्रवाई के लिए दबाव बनाया। जिला पुलिस ने नामजद लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
इस मामले में जिन पुलिसकर्मियों पर आरोप लगे, उन्हें बर्खास्त तक किया गया और कुछ को निलंबित किया गया। अब इस कांड को ऑनर किलिंग बताया जा रहा है।
बताया ऑनर किलिंग का मामला
डीजीपी एएल बनर्जी ने मुख्य सचिव आलोक रंजन और प्रमुख सचिव गृह दीपक सिंघल की मौजूदगी में सार्वजनिक बयान दिया कि यह ऑनर किलिंग का मामला हो सकता है।
साथ ही यह भी कहा कि दो में से एक ही किशोरी के साथ दुराचार होने की पुष्टि हुई है, जबकि जिले के कप्तान ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दोनों किशोरियों के साथ बलात्कार होने की बात स्वीकारी थी।
बदायूं गैंगरेप एवं हत्याकांड में पुलिस की नई थ्योरी से पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता इत्तिफाक नहीं रखते। बकौल गुप्ता यह या तो ऑनर किलिंग हो सकती है या फिर दुराचार के बाद हत्या का मामला।
वे कहते हैं कि जब एक किशोरी के साथ दुराचार की पुष्टि हो रही है तो फिर इसमें ऑनर किलिंग का मामला कैसे बन रहा है। यदि संपत्ति की लालच में एक की हत्या की गई होगी तो दूसरे की हत्या का फिर क्या कारण है। एक ही घटना में तीन संभावित कारण बताने से तो मामला उलझता ही है।
दफनाई लाश का कराया पोस्टमार्टम
सूबे में पहले भी ऐसी कई घटनाएं हुईं, जब पुलिस के आला अफसरों ने मामले के तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश की। लखनऊ के चिनहट इलाके में बलात्कार के मामले में पुलिस ने जो खेल करने की कोशिश की, उसमें उसे मुंह की खानी पड़ी थी।
सिलाई-कढ़ाई सीखने जाने वाली एक किशोरी की दुराचार के बाद हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने पीड़ित परिवार के सदस्यों पर दबाव बनाया और आनन-फानन में लाश को दफन करवा दिया।
पुलिस ने बलात्कार के मामले को ही दबा लिया। पीड़ित परिवार के बार-बार कहने पर भी पुलिस ने बलात्कार के आरोप में न रिपोर्ट दर्ज की और न ही पोस्टमार्टम के दौरान बलात्कार की जांच कराई।
मामले के तूल पकड़ने पर लाश को निकाल कर डॉक्टरों के एक पैनल से दोबारा पोस्टमार्टम कराया गया, जिसमें बलात्कार की पुष्टि हुई। थी। इसके बाद ही आरोपियों की गिरफ्तारी की गई।
नहीं हुई हत्या की पुष्टि
डॉ. सचान का सुसाइड नोट आज तक नहीं हुआ बरामद बसपा शासन में एनआरचएम घोटाले में गिरफ्तार कर लखनऊ जिला कारागार में लाए गए डिप्टी सीएमओ डॉ. वाईपी सचान के साथ जो हुआ, वह पुलिस और राजनेताओं के गठजोड़ का सीधा नतीजा था।
घोटालेबाजों की राह में रोड़ा बने परिवार कल्याण विभाग के सीएमओ डॉ. विनोद आर्य और डॉ. बीपी सिंह, दोनों की ही हत्या के आरोपियों में डॉ. सचान का नाम भी जोड़ दिया गया।
इसके बाद जिला कारागार के अस्पताल में ही डॉ. सचान की लाश बरामद कर यह कह दिया गया कि उन्होंने आत्महत्या की थी। इसे साबित करने के लिए तमाम साक्ष्यों को नजरअंदाज कर दिया गया।
पुलिस ने दावा किया था कि डॉ. सचान ने मरने से पहले सुसाइड नोट लिखा था, लेकिन मामले की सीबीआई जांच होने के बाद भी इस नोट की मूल प्रति आज तक बरामद नहीं की जा सकी है।
यह कहते हैं पूर्व डीजीपी
पुलिस के रवैये पर सवाल उठाते हुए पूर्व डीजीपी श्रीराम अरूण का कहना है कि पुलिस अगर सनसनीखेज मामलों में नीर-क्षीर विवेक से काम नहीं करेगी तो उसे ऐसे ही हालात का समाना करना पड़ेगा।
जब संविधान से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने मुकदमा दर्ज कर तफ्तीश करने की व्यवस्था दी हुई है तो मुकदमा दर्ज करने में कोताही नहीं होनी चाहिए।
विवेचना भी सही तरीके से करनी होगी। पीड़ित व आरोपी दोनों से ही व्यापक पूछताछ कर साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसा न होने पर विवाद उत्पन्न होंगे और अफसरों को भी आरोपों के कठघरे में खड़ा होना होगा।
पुलिस राजनैतिक दबाव से हो मुक्त
ऐसी घटनाओं पर पुलिस की ढिलाई पर समाजशास्त्री प्रो. विनोद चंद्रा का कहना है कि घटना कैसी भी हो, पुलिस को राजनैतिक या किसी अन्य तरह के दबाव में नहीं आना चाहिए।
आला अफसर जब तक निष्पक्ष होकर काम नहीं करेंगे, ऐसे ही आम का अमरूद बनता रहेगा।
बहुचर्चित बदायूं कांड में जब आरोपियों को गिरफ्तारी की जा चुकी है और पुलिस कर्मचारियों की बर्खास्तगी तक कर दी गई है, तो यह कार्रवाई पूरी तफ्तीश के बाद ही हुई होगी।
अब अगर इस मामले में ऑनर किलिंग की थ्योरी बताई जा रही है, तो यह अपने आपमें हास्यास्पद है। आला अफसरों को यह समझना होगा कि वे जैसा संदेश देंगे वैसा ही मातहत करेंगे।