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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Rann of UP: Industrialization is still a dream in every field, the industrialist said… not money, the attention of the government is needed

यूपी का रण : हर क्षेत्र में औद्योगीकरण अब भी सपना, उद्योगपति बोले.. धन नहीं, सरकार का ध्यान चाहिए

Fri, 24 Dec 2021 04:08 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ
अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Fri, 24 Dec 2021 04:08 AM IST
सार

साल दर साल। चुनाव दर चुनाव। वादे होते हैं। तरक्की के सपने दिखाए जाते हैं। औद्योगीकरण को उम्मीदों और बदलाव की चाशनी में लपेटकर पेश भी किया जाता है। ढांचागत सुविधाएं बढ़ती हैं। यूपी को एक्सप्रेसवे का प्रदेश भी कहा जाने लगता है। पर, अधिकतर बडे़ उद्योग और निवेश नोएडा व गाजियाबाद तक ही सिमटकर रह गए हैं। प्रदेश के बाकी क्षेत्र अब भी औद्योगीकरण की राह ही ताक रहे हैं। क्यों...?  अन्य क्षेत्रों के लिए प्रयास तो हुए, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। पर, उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिल सके। बहरहाल, उद्योगपति कहते हैं, ढांचागत सुविधाएं औद्योगिक विकास का सिर्फ मार्ग प्रशस्त करते हैं। वास्तविक औद्योगीकरण तो विजन से होता है। असंतुलित औद्योगिक विकास पर मतदाता चुनाव में राजनीतिक दलों से हिसाब जरूर मांगेगा।

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Rann of UP: Industrialization is still a dream in every field, the industrialist said… not money, the attention of the government is needed
demo pic - फोटो : पीटीआई

विस्तार

डिफेंस कॉरिडोर ने उद्योगों के विकास की उम्मीदें जगाई हैं। इससे बहुत हद तक प्रदेश के कई इलाकों में औद्योगिक पिछड़ापन दूर होगा। पर, यह भी उतना ही सच है कि इसके नतीजे अभी आने बाकी हैं। औद्योगिक विकास की बात करें तो पूर्वांचल, रुहेलखंड, बुंदेलखंड अब भी पिछड़े हुए हैं। ये इलाके उद्योग और निवेश की बाट ही जोह रहे हैं। उद्यमियों का कहना है कि हर हिस्से में उद्योग और निवेश लाने के लिए राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही और उद्योगपतियों को एक मंच पर आना होगा। एक-दूसरे से संवाद बढ़ाना होगा।  

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यूपी की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में रसायन, इंजीनियरिंग और खाद्य  प्रसंस्करण जैसे उद्योगों की प्रधानता रही है। इनमें से ज्यादातर औद्योगिक  इकाइयां लघु और मध्यम आकार की हैं। प्रदेश में ऐसी 22.34 लाख गैर-पंजीकृत इकाइयां हैं, जो कि 37,024 करोड़ रुपये का उत्पादन करती हैं और करीब 51.76 लाख लोग इनमें काम करते हैं। राज्य की औद्योगिक आय में इन इकाइयों का 49 फीसदी का योगदान है। अधिकतर औद्योगिक अर्थव्यवस्था में पारंपरिक हुनर और कारीगरी पर आधारित उद्योगों की बड़ी तादाद है। इनमें हथकरघा, जरदोजी, चिकन के काम, इत्र, पीतल, कांच, पॉटरी, ताले, जूते, लकड़ी के फर्नीचर और खिलौने से संबंधित उद्योग हैं। हालांकि, कॉर्पोरेट कंपनियां नाममात्र ही हैं। 
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अस्सी के दशक में उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास की तेज दर का मुख्य कारण केंद्र व राज्य की कांग्रेसी सरकारों द्वारा किया गया सार्वजनिक निवेश और निजी क्षेत्र को दिए गए प्रोत्साहन थे। मगर ये मुख्यत: रायबरेली व अमेठी के आस-पास सीमित थे। हालांकि 1991 के बाद के उदारीकरण के दौर में सार्वजनिक निवेश पर आधारित यह औद्योगीकरण नहीं टिक पाया। पिछले 25 वर्षों में औद्योगिक विकास में क्षेत्रीय असंतुलन और बढ़ा। वर्ष 1987-88 और 2010-11 के मध्यकाल में पश्चिमी यूपी के रोजगारशुदा लोगों का हिस्सा 52 फीसदी से बढ़कर 74 फीसदी हो गया, जबकि बड़ी आबादी वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड का हिस्सा 48 फीसदी से घटकर 26 फीसदी रह गया। औद्योगिक विकास की वृद्धि राष्ट्रीय राजधानी से सटे नोएडा और गाजियाबाद में नजर आई।

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एक्सप्रेसवे संस्कृति के 14 साल

यूपी में एक्सप्रेस-वे की संस्कृति लाने का श्रेय मायावती सरकार को जाता है। उन्होंने वर्ष 2007-12 के बीच ग्रेटर नोएडा और आगरा के बीच 165.5 किमी लंबा एक्सप्रेसवे का निर्माण कराया। उसके बाद आई अखिलेश सरकार ने आगरा को लखनऊ से एक्सप्रेसवे के माध्यम से जोड़ा। इसकी कुल लंबाई 302 किमी. है। तब वह देश के सबसे लंबे एक्सप्रेसवे में शुमार था। योगी सरकार ने 340.824 किमी. लंबे पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का निर्माण कराकर इस क्रम को आगे बढ़ाया। अब यह देश सबसे लंबा एक्सप्रेसवे है। इसके अलावा बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे निर्माणाधीन हैं। जबकि पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए मेरठ-प्रयागराज गंगा एक्सप्रेसवे भी रफ्तार पकड़ रहा है। यह 594 किमी लंबा होगा। इसके निर्माण के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जमीन भी ली जा चुकी है।

एफडीआई से बढ़ रहीं उम्मीदें
प्रदेश में अक्तूबर 2019 से मार्च 2021 के बीच 664.66 बिलियन डॉलर ( 66466 करोड़ डॉलर) का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आया। अगस्त 2020 में एशियन डेवलपमेंट बैंक ने दिल्ली और मेरठ के बीच हाई स्पीड रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) कॉरिडोर के लिए 1 बिलियन (100 करोड़) डॉलर का लोन स्वीकृत किया।

संभावनाओं का द्वार डिफेंस कॉरिडोर
लखनऊ, कानपुर, अलीगढ़, आगरा और झांसी में बनाए जा रहे डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर से बड़े पैमाने पर निवेश और रोजगार सृजन होगा। अक्तूबर-2020 के आंकड़ों के अनुसार, यूपी में 21 अधिसूचित व 13 संचालित स्पेशल इकोनॉमिक जोन और 24 औपचारिक रूप से स्वीकृत एसईजेड हैं। इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्च्यूरिंग पॉलिसी, 2020 के तहत राज्य में 40 हजार करोड़ रुपये का निवेश लाने के प्रयास राज्य स्तर से हो रहे हैं।

निवेश मित्र और सिंगल विंडो से दूर हुईं निवेशकों की दिक्कतें : महाना
लखनऊ। औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने कहा कि उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने कई अहम फैसले किए हैं। उद्योग लगाने वालों की सुविधा के लिए निवेश मित्र के माध्यम से सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया गया है। प्रदेश सरकार ने निवेशक व उद्योगों के अनुकूल नीति बनाई है। एक ऐसा ईको सिस्टम तैयार कराया गया है जिससे उद्यमियों को काम कराने के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता है। हमारी सरकार ने लैंड में बड़े रिफाॅर्म किए हैं। 12.5 एकड़ की सीलिंग की सीमा समाप्त कर दी गई है। 

उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए जमीनों का रजिस्ट्री शुल्क माफ किया गया है। पूर्वांचल व बुंदेलखंड में उद्योग लगाने वाले उद्यमियों की जीएसटी की भरपाई के लिए प्रावधान किया गया है। हमारी डाटा सेंटर पाॅलिसी पूरे देश में सबसे अच्छी है। इसी का नतीजा है कि हर निवेशक यूपी में ही डाटा सेंटर स्थापित करना चाहता है। हमने लॉजिस्टिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया है। 

एक्सप्रेस-वे व हाईवे का जितना बड़ा नेटवर्क यूपी में है उतना देश में कहीं भी नहीं है। जमीनों के आवंटन की पारदर्शी व्यवस्था की गई है। ईज ऑफ डूईंग बिजनेस में यूपी  पहले 12वें स्थान पर था। अब दूसरे नंबर पर आ गया है। पहले उद्यमियों को जिन समस्याओं से जूझना पड़ता था, उन्हें हमारी सरकार ने दूर कराकर इन्वेस्टर फ्रेंडली माहौल बनाया है। nचुनाव डेस्क

विदेशी निवेशक की कद्र, स्थानीय की पूछ नहीं

सड़कें औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक हैं। पर, सिर्फ सड़कों के दम पर ही स्वत: औद्योगिक विकास आज तक न कहीं हुआ है और न भविष्य में होगा। एनसीआर दिल्ली से जुड़ा है। दिल्ली में जगह उपलब्ध नहीं है, इसलिए नोएडा में बड़े निवेशक आए। वास्तविक निवेश तभी आता है, जब सभी स्टेक होल्डर्स के बीच भरोसे का माहौल हो। फिलहाल प्रदेश में हमें इसकी कमी दिखती है। यह तब है जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के औद्योगिक विकास के सकारात्मक प्रयासों को कोई नकार नहीं सकता।

अगर जापान से कोई एक हजार करोड़ रुपये का निवेशक आ जाए तो पूरी सरकारी मशीनरी उसके लिए जुट जाती है। किसी भी तरह वह निवेश करे और कहीं और न जाने पाए, ऐसी कोशिशें होती हैं। लेकिन, स्थानीय उद्यमी 5 हजार करोड़ रुपये का निवेश भी करने की बात कहे तो ‘घर की मुर्गी साग बराबर’ वाली कहावत चरितार्थ होती है।

सरकार चाहे जिसकी रही हो, उद्यमियों की नहीं सुनी जाती। जिनके लिए औद्योगिक नीति लाई जाती है, उनके ही सुझाव नहीं लिए जाते। औद्योगिक विकास के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है-राजनीतिक बॉस, नौकरशाही और उद्योगपतियों के बीच लगातार संवाद हो। जो बाधाएं आ रही हैं, उनका रियल टाइम में समाधान हो। निवेशक को यह महसूस कराया जाए कि नौकरशाही और पूरा सिस्टम आपकी समस्याओं के समाधान के लिए है। - चंद्रप्रकाश अग्रवाल (गैलंट इस्पात लिमिटेड के चेयरमैन)


कुशल श्रमिकों की कमी से असंतुलित विकास 
बरेली समेत रूहेलखंड के प्रमुख जिलों में बड़े उद्योग क्यों नहीं आए? ये उद्योग एनसीआर में क्यों केंद्रित होकर रह गए? यह हमारे लिए चिंता का विषय जरूर होना चाहिए। बड़ी इंडस्ट्री को उन्नत तकनीक और कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। कुशल श्रमिक ऐसे चाहिए जो उन्नत हो रही तकनीक के अनुरूप अपने को तैयार करने में सक्षम हों। 

हमें विचार करना होगा कि बरेली में आजादी से पहले आईटीआर और आजादी के बाद रबर व विमको फैक्टरी न सिर्फ स्थापित हुईं, बल्कि खूब फली-फूलीं। यह सब तब हुआ जब कनेक्टिविटी के संसाधन आज से कहीं कमजोर थे। बेहतर रोड की तो बात छोड़िए, रेल ट्रैक भी सिंगल लेन का हुआ करता था। 

आज कनेक्टिविटी बेहतर होने के बाद भी 90 प्रतिशत से ज्यादा बड़े उद्योग नोएडा और एनसीआर में ही लग रहे हैं। तो इसकी मुख्य वजह है छोटे शहरों में कुशल श्रमिकों का बेहद अभाव। तकनीकी संस्थानों व विश्वविद्यालयों में जो लोग तैयार किए जा रहे हैं, वे उद्योगों के लिहाज से किसी काम के नहीं। इनका पाठ्यक्रम उद्योगों की जरूरत के हिसाब से बिल्कुल भी नहीं है। छोटे शहरों में पर्याप्त कुशल श्रमिक मिले, इसके लिए हमें रणनीति बनानी होगी। इसी से प्रदेश का संतुलित औद्योगिक विकास हो पाएगा। दूसरा बड़ा कारण है, बैंक छोटे शहरों की ओर रुख करने वाले उद्योगपतियों को आसानी से कर्ज मुहैया नहीं कराते। जबकि एनसीआर में यह दिक्कत नहीं आती है। - घनश्याम खंडेलवाल (बीएल एग्रो लिमिटेड के चेयरमैन )


नीति के साथ नीयत भी ठीक होना जरूरी
हमें विचार करना होगा कि पूर्वांचल में बड़े उद्योग क्यों नहीं आए। वाराणसी तक में 70 के दशक में लगे रेल कारखाने के अलावा आज तक कोई मेगा इंडस्ट्री नहीं आई। सरकार चाहे जिसकी रही हो, नीतियां अच्छी मंशा से बनाई गईं। पर, नीतियों को अमली जामा पहनाने की स्थिति अच्छी नहीं रही। पूर्वांचल निर्यात का हब बन सकता है। उत्पादन बढ़ाए जाने की यहां अपार संभावनाएं हैं। लेकिन, संबंधित पोर्टल पर आप निवेश के लिए आवेदन करते हैं तो ऐसा महसूस नहीं होता कि उससे जुड़े अधिकारी समस्या के समाधान के लिए बैठे हों।

अगर सर्किल रेट से चार गुना दाम पर जमीन खरीदकर हमें इंडस्ट्री लगानी है, तो साफ है कि अंबानी और अडानी जैसे उद्योगपति ही लगा पाएंगे। औद्योगिक क्षेत्रों में काफी जमीन अनुपयोगी पड़ी हुई हैं। अगर इन जमीनों को उद्योग लगाने के लिए ही किसी दूसरे को बेचने की अनुमति मिल जाए तो वहां उत्पादन भी बढ़ेगा और रोजगार के अवसर भी।

पूर्वांचल में सड़कों का अच्छा नेटवर्क है। यूपी को एक्सप्रेसवे का प्रदेश कहा जाने लगा है। ऐसा नहीं है कि स्थानीय स्तर पर निवेशक नहीं हैं। उन्हें बाहर से ही लाना पड़ेगा। 50-100 करोड़ रुपये तक का निवेश कर सकने की क्षमता वाले कई उद्यमी पूर्वांचल में ही मौजूद हैं। बस, उन्हें साथ बैठाकर व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करते हुए नियम बनाए जाएं। -आरके चौधरी (वाराणसी के उद्यमी)


ढांचागत सुविधाएं बढ़ीं, उद्योग भी बढ़ेंगे
10-15 वर्षों में हमारे यहां ढांचागत सुविधाओं में जबरदस्त वृद्धि हुई है। एक्सप्रेसवे और हवाई यातायात की सुविधाएं बेहतर हुई हैं। एक्सप्रेसवे के दोनों ओर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर विकसित करने की योजना भी सामने रखी जा रही है। इसलिए कहा जा सकता है कि इन सभी क्षेत्रों में अब औद्योगिक विकास बढ़ेगा। यह  सही है कि अभी तक औद्योगिक विकास यूपी के कुछ इलाकों में ही केंद्रित होकर रह गया, लेकिन इन इलाकों में अब जमीन मिलने में दिक्कतें आ रही हैं। इसलिए उद्योगों के विस्तार या नए उद्योग लगाने के लिए उद्यमियों को दूरदराज के क्षेत्रों में जाना होगा। बड़े उद्योग लगेंगे तभी एमएसएमई सेक्टर भी फलेगा-फूलेगा। - पंकज गुप्ता (आईआईए से जुड़े हैं)


औद्योगिक रनवे अब उड़ान के लिए तैयार
5-6 महीने पहले मैंने हरिद्वार से लखनऊ और फिर नोएडा तक की यात्रा की। हाईवे, सड़कें, फ्रेट कॉरिडोर और फ्लाईओवर जगह-जगह तैयार मिले या फिर इनका निर्माण हो रहा था। इसे देखकर महसूस हुआ कि यूपी का औद्योगिक रनवे अब उड़ान के लिए तैयार है। वर्ष 2007-08 में मैं आईआईए का मेंबर था। कोई समस्या आने पर पहले हमें एसडीएम का समय मिलता। लेकिन ऐन मौके पर वह आने के लिए मना कर देते। कह देते कि मैं व्यस्त हूं। ...या फिर अपनी जगह तहसीलदार को भेज देते। आज बड़ा बदलाव आया है। आईआईए की बैठक में उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा तक पहुंचते हैं। समय के साथ ‘तहसीलदार वर्सेज उप मुख्यमंत्री’...इतना बड़ा बदलाव आया है। - वरुण कुमार तिवारी (चेयरमैन, त्रिवेणी अलमीरा ग्रुप)
 

सरकार का रवैया अच्छा, नौकरशाही रोड़े अटकाती है

इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (आईआईए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार अग्रवाल प्रदेश में असंतुलित औद्योगिक विकास को एक बड़ी चुनौती मानते हैं। वे कहते हैं, केंद्र व राज्य सरकार का निवेशकों के प्रति रवैया सकारात्मक है। काफी प्रयास भी नजर आ रहे हैं। पर, अफसरों की मानसिकता नहीं बदल सकी है। जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, पिछड़े क्षेत्रों में निवेश की चुनौती बनी रहेगी। पेश है महेंद्र तिवारी की उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...


असंतुलित विकास से किस तरह की चुनौतियां हैं?
प्रदेश का पश्चिम क्षेत्र दिल्ली के नजदीक है। हवाई व अन्य सभी आवश्यक यात्रा सुविधाओं के साथ ही आवासीय सुविधाएं भी यहां हैं। अन्य क्षेत्रों में इस तरह की सुविधाएं अभी नहीं हैं। दूसरा, प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने हरियाणा और राजस्थान से जुड़े हैं। ये घरानेे दिल्ली के आसपास निवेश करने को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए उनकी प्राथमिकता में एनसीआर रहता है। तीसरा, पश्चिम के लोग अपने काम के प्रति जुझारू हैं। वे सड़क पर आकर अपना काम करा लेते हैं। चौथा, पिछली सरकारों की प्राथमिकता ही पश्चिम यूपी तक केंद्रित रही। इसके उलट प्रदेश के अन्य क्षेत्र उद्यमशीलता को लेकर पश्चिम की तरह जागरूक नहीं हैं।


असंतुलित विकास को दूर करने के लिए क्या करना चाहिए?
पांच काम प्राथमिकता पर होने चाहिए। पहला, अधिकारियों की मानसिकता बदलनी होगी। उन्हें इंडस्ट्री फ्रेंडली बनाना होगा। सभी सेवाएं तय समय में सहज व पारदर्शी तरीके से उपलब्ध होनी चाहिए। दूसरा, पिछड़े क्षेत्रों में तेजी से रोड व हवाई नेटवर्क का विकास हो। तीसरा, उद्योगों के लिए भूमि की उपलब्धता हो। जमीन के इंतजार में प्रोजेक्ट को रोकना न पड़े। चौथा, नीति के अनुसार लाभ की गणना का फॉर्मूला स्पष्ट हो। पांचवां, जिस तरह शिक्षक व स्नातक के लिए विधान परिषद में सीट सुरक्षित है, उसी तरह कुछ सीट उद्योग सेक्टर के लिए तय की जाएं। इससे उद्योगों की बात उठाने वाला भी कोई होगा। अभी उद्यमियों को अपनी बात रखने के लिए या तो पिछलग्गू बनना पड़ता हैं या फिर धक्के खाने पड़ते हैं। 


जो कदम उठाए गए उनके अपेक्षित नतीजे क्यों नजर नहीं आ रहे हैं?
औद्योगीकरण को लेकर सरकार की सोच तो बदली, पर अफसरशाही पुराने ढर्रे पर ही है। । सुविधाएं ऑनलाइन कर दी गईं, लेकिन इतनी तकनीकी चीजें बढ़ा दीं कि बिना दफ्तर गए आवेदन ही नहीं कर सकते। अधिकारियों को उद्यमियों से मिलने के लिए समय नहीं है। सरकार ने भी एक-एक अफसर को कई-कई विभाग पकड़ा दिए, जो समय ही नहीं देते। वास्तव में सरकार बदल जाती है, मंत्री और नेता बदल जाते हैं, लेकिन अधिकारी नहीं बदलते। अधिकारी उद्यमी को सरकारी चंगुल से बाहर नहीं जाने देना चाहते।

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