जानिए, देश के गृहमंत्री के इलाके का असली हाल
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बेती गांव। एक खास गांव। खास इसलिए कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इसे गोद लिया है। सात महीने बीते। पर आज भी बेटियों को इंटर के बाद पढ़ाई के लिए 25 किमी दूर जाना पड़ता है। बीमार पड़े तो इलाज से पहले 15 किमी का चक्कर लगाना ही पड़ेगा। तो बदला क्या? एक बैंक की शाखा खुली और तो कुछ नहीं। सांसद गोद लेने के बाद दोबारा गांव आए नहीं, लोग हैं कि इंतजार किए जा रहे हैं।
जिला मुख्यालय से 40 कि मी दूर सरोजनीनगर ब्लॉक का यह गांव सात महीने पहले खास बना। हम बेती गांव पहुंचते हैं तो गड्ढों वाली सड़क हमारा इस्तकबाल करती है। साथ ही यह भी बता देती है कि गांव के उम्मीदों की राह अब भी पथरीली ही है। इसी सड़क के किनारे आंगनबाड़ी केंद्र है। हम उधर मुड़ लेते हैं।
केंद्र में महिला कार्यकर्त्रियां और बच्चे बेहाल हैं। हम इधर-उधर देखते हैं। पूछते हैं, बिजली? महिला कार्यकर्त्रियां कहती हैं-कहां है बिजली? कई बार लिखा-पढ़ी हुई, पर हर बार भरोसा ही मिलता है। गर्मी में वहां खड़ा रहना भी मुश्किल होता है। हम थोड़ा आगे बढ़ते हैं।
एक बदहाल, खंडहरनुमा घर को देखकर लगा शायद इसमें कोई न रहता हो, पर जब वहां पहुंचे तो पता चला कि एक दो नहीं बल्कि दस लोगों का परिवार उसमें रहता है। इसमें रहने वाले राम किशोर व राम लखन बताते हैं कि वे पेशे से नाई हैं। गरीब हैं। किसी तरह गुजारा हो रहा है।
इसी बीच और लोग यहां जुट जाते हैं। भीड़ देखते ही हमने भी बदलाव का सवाल दागा। लोग बोल पड़े- का कही भइया, सुना रहे कि दिल्ली कै बड़का सांसद गउवां का गोद लिहे हैं। पर ऊ त गोद लिहे आवा रहें, उकरे बाद तौ एकउ बार झांकइ तक नाहीं आएन, कमवा के बात त छोड़इ द। सड़किया ठीक भइ न स्कूलवा...। कहत रहें अच्छे दिन आइ गवा। का इहै है अच्छे दिन...।
बस उम्मीद ही बढ़ी....कुछ हुआ नहीं
बेती में खड़ंजे, कच्ची सड़क ही है। ग्राम प्रधान केघर की ओर जाने वाली और रामगढ़ी मजरे में थोड़ी बहुत अलबत्ता सड़क आरसीसी दिख जाती है। गांव के लल्लन तिवारी बताते हैं कि पिछड़ी जाति बहुल गांव होने के बाद भी न तो यह कभी लोहिया ग्राम योजना में आया और न ही कांशीराम आवास योजना में।
जब सांसद व केंद्रीय गृहमंत्री ने गोद लिया तो सभी की उम्मीद परवान चढ़ी की अब गांव में अच्छे दिन आएंगे। पर अब तक कुछ नहीं हुआ। गांव की बच्चियों के लिए डिग्री कॉलेज, सरकारी अस्पताल और पुलिस चौकी जैसी अहम मांग भी अब तक अटकी पड़ी है।
महिलाएं बोलीं- शौचालय बनवाने का वादा भी तो नहीं पूरा हुआ
स्वच्छता मिशन को लेकर बड़े-बड़े वादे किए गए। महिलाओं से चर्चा छिड़ते ही वे वादों को आईना दिखाने लगती हैं। गांव की बिटान देवी और श्यामा कुमारी कहती हैं कि सांसदजी के गोद लिए जाने के बाद हमने गांव में शौचालय न होने की समस्या बताई थी। तब उन्होंने कहा था कि प्राथमिकता पर यह काम कराया जाएगा। पर अब तक कुछ खास काम नहीं हुआ।
तीन महीने का वादा बीता, आज तक नहीं आई बिजली
गांव बेती से मजरा रामगढ़ी जुड़ा है। पर आज तक यहां के लोगों के लिए बिजली एक सपना भर ही है। ग्रामीण अपने घर दिखाते हैं। कहते हैं, देखिए पक्का मकान है, दुकान है। पर बिजली नहीं है। लक्ष्मी कहती हैं-जेकरे पास पैसा है ऊ त अपने घर मा सोलर पैनल लगवाइ लिहें। पर बाकी के त सहारा लालटेनइ अहै।
एक ग्रामीण कहते हैं- गोद लेते समय सांसद ने वादा किया था कि तीन महीने में आपको बिजली मिल जाएगी। देखते हैं, कब तीन महीना पूरा होता है।
स्कूल सड़क से सटा पर बाउंड्रीवॉल तक नहीं
हम बेती के पूर्व माध्यमिक स्कूल पहुंचते हैं। बाहर से ही स्कूल की हालत सही नजर नहीं आती। हम क्लासरूम में गए। हालत खस्ता मिली। शौचालय देखा तो वह भी जर्जर। गांव के 170 बच्चे यहां पढ़ते हैं।
यहां कुछ समय पहले ही तैनात हुई विद्यालय की वरिष्ठ शिक्षिका मालती त्रिवेदी सड़क की ओर दिखाती हैं। कहती हैं- स्कूल सड़क से सटा है पर बाउंड्रीवॉल तक नहीं है। हर समय बच्चों पर निगाह रखनी पड़ती है। क्याेंकि सड़क से सटे होने के कारण हादसों का डर बना रहता है।
बेती गांव एक नजर
करीब चार सौ साल पुराना गांव
कुल आबादी 10 से 11 हजार
गांव में आने वाले मजरे -बेती, कल्लनखेड़ा, दयालखेड़ा, तारखेड़ा, जोखीखेड़ा, मिरजापुर, नरेरा, भोकापुर, रामगढ़ी, लैकाखेड़ा
प्राथमिक व उच्चतर माध्यमिक विद्यालय - पांच
बदलाव जो हुआ
गोद लिए जाने के बाद ओरिएंटल बैक ऑफ कामर्स की शाखा गांव में खुली
पर इसके लिए इंतजार
सरकारी अस्पताल, कन्या डिग्री कॉलेज, पशु चिकित्सा केंद्र, नए हैंडपंप, सिंचाई के लिए नलकूप, शौचालय, गांव के अंदर जलनिकासी की समस्या दूर कराने के लिए नाला, मजरा रामगढ़ी में बिजली, सड़क।