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सेंसरबोर्ड, बोल्ड किरदार और आने वाली फिल्म पर राजीव खंडेलवाल ने की बात

Sun, 03 Jul 2016 03:18 PM IST
आलोक पराड़कर/अमर उजाला, लखनऊ
आलोक पराड़कर/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 03 Jul 2016 03:18 PM IST
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rajeev khandelwal interviev with amar uajal
राजीव खंडेलवाल - फोटो : amar ujala

फिल्म अभिनेता राजीव खंडेलवाल के खाते में फिल्मों की संख्या कम है, लेकिन उनकी फिल्में कुछ हटकर होती है। ‘आमिर’, शैतान, ‘साउंडट्रैक’, ‘टेबिल नंबर 21’ जैसी फिल्मों का अपना प्रशंसक वर्ग है। फिल्मों के पहले और फिल्मों के साथ भी उन्होंने टेलीविजन पर लंबी पारी खेली है।

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बाद के कार्यक्रमों में उन्हें ‘सच का सामना’ के प्रस्तोता के रूप में याद किया जाता है। खंडेलवाल की इस माह ‘फीवर’ प्रदर्शित होने वाली है, जो एक अलग ढंग की कहानी है। वे लखनऊ में इन दिनों ‘प्रणाम’ की शूटिंग भी कर रहे हैं। शूटिंग के दौरान उन्होंने ‘अमर उजाला’ से लंबी बातचीत की...
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‘फीवर’ किस तरह की फिल्म है?
- यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसकी याद्दाश्त चली जाती है और उसे सिर्फ यह याद रहता है कि उससे पहले कोई गुनाह हो चुका है। वह इस डर में जीवन व्यतीत करता है, जिसका तनाव उसके साथ है। 
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फिल्म के अंशों के पूर्वावलोकन से लगता है कि इसमें आपकी भूमिका नायक और खलनायक दोनों ही तरह के प्रभाव लिए हुए है?
- हां, इसमें कई तरह शेड्स हैं लेकिन मैं फिल्म की कहानी के बारे में अभी कुछ नहीं बता सकता हूं। यह मेरे लिए एक अलग तरह की भूमिका है। मैंने इस तरह की भूमिका पहले कभी नहीं की है। यह नहीं कहूंगा कि यह एक आसान भूमिका थी।

यह काफी बोल्ड फिल्म भी लगती है। क्या आपको इसे लेकर कोई हिचकिचाहट भी थी?
- यह फिल्म जैसी बनी है, वैसी ही मुझे सुनाई गई थी। स्विट्जरलैंड की कहानी है तो वहां का माहौल दिखाया जाना तो जरूरी है, लेकिन इसमें जो खुलापन है वह कहानी कहने का एक अंदाज है। 

आप कम फिल्में करते हैं, लेकिन आपकी फिल्में पूरी तरह आपके दम पर होती है। उसमें कोई बहुत लोकप्रिय कलाकार शामिल नहीं होता है। इसके पीछे जो आपका आत्मविश्वास है, उसका आधार क्या है?
- मेरी फिल्मों में मुझसे बड़ा हीरो फिल्म की स्क्रिप्ट होती है। मैं सिर्फ उस पटकथा का हिस्सा होता हूं। उसमें हीरो स्क्रिप्ट होती है। बाकी जिन लोकप्रिय कलाकारों की बात आप कर रहे हैं, उसमें हीरो तो वे ही होते हैं, स्क्रिप्ट प्राय: होती ही नहीं है। मुझे मालूम है कि मैं इतना काबिल नहीं हूं कि आप मुझे कुछ भी दे दें और मैं फिल्म कर ले जाऊं। मैं एक अच्छी स्क्रिप्ट ढूंढता हूं और मैं चाहता हूं कि लोग मुझे नहीं, फिल्म को देखने आएं जिसका मैं सिर्फ एक हिस्सा होता हूं। मेरी फिल्मों में कहानी का बहुत महत्व होता है, फिल्म कहने का अंदाज महत्वपूर्ण होता है।

‌सेंसर के दखल पर ये बोले राजीव

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राजीव ने अमर उजाला से साझा की कई बातें - फोटो : amar ujala

क्या आपको लगता है कि फिल्मों में एक बदलाव आया है?
- बिल्कुल। बदलाव तो आया है। मैं यह नहीं कहूंगा कि एकदम से भूचाल आ गया है लेकिन बदलाव आया है। 2008 में जब मैंने ‘आमिर’ की थी तो वह एक अलग तरह की फिल्म थी, एक हीरो था, कोई गाने नहीं थे, अभिनेत्री नहीं थी। उसके बाद कई फिल्में आईं। अब काफी बड़ी-बड़ी फिल्मों को ठुकराया जाने लगा है। जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ेगी, बौद्धिकता बढ़ेगी तो लोग कथ्य की मांग करेंगे।

इधर सेंसर की दखल पर काफी विवाद हुआ है, आपका क्या मानना है?
- एक मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए, लेकिन फिल्मों में सेंसर की बहुत दखल को मैं ठीक नहीं मानता। श्रेणी होनी चाहिए। अगर कोई ऐसी बातें फिल्मों में हों तो उन्हें दूसरी श्रेणी में डाल देना चाहिए।

आपकी पहचान तो अलग ढंग की, छोटी बजट की फिल्मों से है लेकिन क्या आपका मन नहीं करता कि बड़े बजट की, बड़े लोकप्रिय अभिनेता-अभिनेत्रियों की फिल्मों में काम करे?
- नहीं, बिल्कुल इच्छा नहीं होती। मुझे ऐसा लगता है कि पांच-छह साल बाद भी लोग फिल्में देखें और उसकी सराहना करें। जो फिल्म सिर्फ तीन दिन केलिए चले और दर्शकों के जेहन से निकल जाए, मेरे लिए वे फिल्में महत्वपूर्ण नहीं। 

कुछ वर्षों पूर्व आई आपकी ‘सम्राट एंड कंपनी’ की बहुत चर्चा नहीं हुई? क्या आपको लगता है कि इसका चयन गलत था?
- नहीं वास्तव में यह फिल्म ठीक ढंग से सिनेमा हालों में प्रदर्शित ही नहीं हो पाई जबकि यह राजश्री की फिल्म थी। लोगों को पता ही नहीं चल पाया।

‘प्रणाम’ किस तरह की फिल्म है?
- यह मेरी बिल्कुल अलग तरह की फिल्म है। मैंने कई तरह की फिल्म की है लेकिन इसमें बहुत सादगी से कहानी कही गई है। क्लासिक जैसी फिल्म है। बहुत ताजगी देने वाली फिल्म है। जिस तरह की फिल्में बन रहीं हैं, उसमें इस तरह की फिल्में बननी बंद हो गई थीं।

टीवी पर वापसी का कोई प्रस्ताव तो नहीं?
- अभी तो नहीं क्योंकि जो भी आता है वह एक साल-दो साल का प्रस्ताव लेकर आता है।

खुद कोई कहानी, फिल्म बनाने का मन नहीं होता?
- जरूर होता है। इच्छा होती है कि अपने ढंग से कुछ कहूं। जरूर करूंगा। चार-पांच साल इंतजार करिए।

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