यही चाह, हमारी संपत्तियां बनें अवध की पहचान: राजा महमूदाबाद
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संपत्ति अध्यादेश 2016 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाला राजा महमूदाबाद मोहम्मद अमीर मोहम्मद खान का विशेष इंटरव्यू...
राजा महमूदाबाद मोहम्मद अमीर मोहम्मद खान ने शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 में संशोधन के लिए लाए गए शत्रु संपत्ति अध्यादेश 2016 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
वे 2010 में इसी अधिनियम पर लाए गए अध्यादेश को भी चुनौती दे चुके हैं, जिसकी भी सुनवाई फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। 2010 के अध्यादेश के तहत सभी शत्रु संपत्तियां कस्टोडियन को सौंप दी गई थीं।
अमर उजाला ने उनसे विशेष बातचीत कर पूरे मामले और कानूनी विवाद पर उनका नजरिया जानने का प्रयास किया। इस दौरान अमीर मोहम्मद खान और उनके पिता पूर्व राजा महमूदाबाद स्व. मोहम्मद अमीर अहमद के जीवन से जुड़े कई प्रसंग और घटनाओं पर भी चर्चा हुई।
देश के हालात से घबराकर छोड़ा था भारत
राजा महमूदाबाद : तब देश में जो हालात थे, उनसे घबराकर हमारा परिवार पाकिस्तान, ईरान और ईराक में भटक रहा था। आजादी के वर्ष के अगस्त महीने में यह सब शुरू हुआ और अगले वर्ष जनवरी में हम भारत लौट आए। यहां लखनऊ में रहे, लेकिन पिता ईराक चले गए।
1950 में मैं अपनी मां और बहनों के साथ उनके साथ रहने ईराक पहुंचा। तब मैं सात साल का था। इस बीच पिता पाकिस्तान और भारत दोनों ही देशों में आते रहे।
आपके पिता मो. अमीर अहमद खान ने पाकिस्तान की नागरिकता स्वीकारी, इसकी क्या वजहें रहीं?
- आजादी के बाद हम करीब तीन वर्ष ईरान व ईराक में रहे। पाकिस्तान आना जाना हुआ तो भारत भी आए। हर दफा भारतीय पासपोर्ट का उपयोग हुआ। आजादी के 10 वर्षों तक मेरे पिता भारतीय नागरिक ही थे। 1957 में उन्हाेंने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली।
उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसके बारे में कई बातें हैं। जो मुझे समझ में आया वह यह था कि जैसा पाकिस्तान सोचा गया था, वह उस रास्ते से भटक रहा था। मेरे पिता चाहते थे कि जो लोग भारत छोड़कर पाकिस्तान आ रहे हैं, उन्हें भी वही दर्जा मिले, जो दूसरों को मिल रहा है।
ऐसे में उनसे उम्मीद की जाने लगी कि वे मुस्लिम लीग को फिर से जिंदा करके पाकिस्तान के सपने को पूरा कर सकें। कुछ यह मानते थे कि नई पार्टी बनाकर पाकिस्तान के लिए काम करने की जरूरत है। इन उद्देश्यों के लिए उन्हाेंने खुद सोचा होगा, फिर उनके साथियों ने इसके लिए राजी कराया।
मेरे पिता रूमानी विचारों के थे
... लेकिन पाकिस्तान में वे राजनीति में नहीं आ सके, ऐसा क्यों हुआ?
- दरअसल मेरे पिता राजनीतिज्ञ थे ही नहीं। वे रुमानी विचारों के व्यक्ति थे। इकबाल, मजाज, फैज, आदि से उनकी करीबी दोस्ती रही। वे मानते थे कि पाकिस्तान को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। हर व्यक्ति बराबर होना चाहिए। वे विचारों के वामपंथी थे।
चाहते थे, कि पाकिस्तान में आर्थिक एजेंडे और मुद्दों पर बात करने वाली पार्टी और विचारधारा का शासन हो। फ्रंटियर गांधी के नाम से मशहूर खान अब्दुल गफ्फार खान के भाई डॉ. खान अब्दुल जब्बार खान, पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के मौलाना अब्दुल हमीद भाषानी, बलूचिस्तान के कई नेताओं और वामपंथी नेताओं ने उन्हें नई पार्टी बनाने के लिए प्रोत्साहित किया।
यह पाकिस्तान के सत्ता पक्ष को स्वीकार्य नहीं था। सरकार उनसे सीधे पूछने लगी कि वे किस तरफ हैं। इसका जवाब उन्हाेंने एक पत्र के रूप में दिया जिसमें उन्होंने अपने विचार स्पष्ट किए।
पत्र को इंग्लैंड के टाइम्स अखबार ने प्रकाशित किया। ऐसे विचार सत्ता पर काबिज लोगों को पसंद नहीं आए। ऐसे में उनके लिए राजनीति में आने के हालात नहीं बन सके।
फौजी तानाशाह अयूब खान की उन्हाेंने सीधी मुखालफत नहीं की, लेकिन यह जाहिर था कि वे अयूब का पाकिस्तान पर शासन पसंद नहीं कर रहे हैं। ऐसे में उन्हाेंने पाकिस्तान से निकलकर अधिकतर समय लंदन और मिडिल ईस्ट में गुजारा।
आखिरी वक्त पर बोले पिता, स्विट्जरलैंड तो महमूदाबाद है
- हां। अंतिम समय में उन्हाेंने मुझसे कहा था कि मैं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरागांधी से इस बारे में बात करुं। 1971 में उन्हें दूसरा हार्ट अटैक आया था और उनका इंग्लैंड के एक अस्पताल के जनरल वार्ड में इलाज हो रहा था। साथियों ने उन्हें स्विट्जरलैंड जाने की सलाह दी तो उन्होंने कहा कि ‘मेरा स्विट्जरलैंड तो महमूदाबाद है।
’ इससे एक साल पहले वे भारत आए थे। महमूदाबाद भी आए। इसी दौरान इंदिरागांधी से मिले। मैं चाय के समय तक वहां था, लेकिन इसके बाद पिता ने मुझे बाहर जाने को कहा और अकेले में इंदिरागांधी से बातचीत की।
बाद में उन्हाेंने बताया कि हिंदुस्तान व पािकस्तान में संबंध बेहतर बनाने को लेकर बात हुई थी। कुछ समय बाद उन्हाेंने कहा कि वे अपना अंतिम समय महमूदाबाद में गुजारना चाहते हैं और इसके लिए मैं इंदिरा गांधी से बात करुं। मैंने इसमें असमर्थता जाहिर कि जिससे शायद उन्हें दुख पहुंचा। 1973 में उनकी मृत्यु हुई।
शत्रु संपत्ति को लेकर विवाद कब शुरू हुआ?
- भारत में शत्रु संपत्ति पर कस्टोडियन रखने की व्यवस्था पहले विश्वयुद्ध के दौरान 1914 से 1919 तक थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज सरकार ने भारत में ऐसे लोगों की संपत्ति पर कस्टोडियन लगाने की व्यवस्था की जो उन देशों के नागरिक थे, जिनसे सरकार का युद्ध चल रहा था।
इसका ऑफिस बॉम्बे में बनाया गया। 1962 में चीन से युद्ध के दौरान डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (डीआईआर) बनाकर इन जायदादों का संरक्षण सरकार अपने हाथ में लेने लगी। ऐसा इसलिए ताकि युद्ध के माहौल में शत्रु देश के नागरिक की देश में मौजूद संपत्ति को नुकसान न पहुंचे, लूटमार न हो। न ही शत्रु देश इस संपत्ति का उपयोग कर सके। 1968 में यही डीआईआर शत्रु संपत्ति अधिनियम के रूप में सामने आया।
भारत सरकार को लिखे थे कई खत
संपत्ति रिलीज करवाने के लिए राजनीतिक स्तर पर आपने क्या किया?
- मैंने भारत सरकार को लगातार कई खत लिखे, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। 1977 में तत्कालीन पीएम मोरारी देसाई से मिला। जब मैंने पूरे मामले के बारे में बताया तो उन्हाेंने इस पर निराशा जाहिर करते हुए कहा कि ‘यह कैसे हो सकता है!’ तुरंत अपने वाणिज्य मंत्री मोहन धारिया को बुलाया और मामले की फाइल खुलवाई। साथ ही कहा कि सरकार इस पर निर्णय लेगी। कुछ ही समय बाद उनकी सरकार गिर गई। फिर मैंने उनसे इस विषय पर बात नहीं की।
इंदिरा सरकार से बातचीत जारी रह सकी?
- इंदिराजी फिर से प्रधानमंत्री बनीं तो मैंने उनसे मुलाकात कर संपत्ति रिलीज करवाने के लिए कहा। उन्होंने फाइल खुलवाई और कहा कि आप इसकी प्रगति पर नजर रखिए। किसी मौके पर कुछ कहना हो तो कह सकते हैं। कुछ समय बाद 1981 में सूचना दी गई कि उनकी 25 प्रतिशत संपत्ति सरकार द्वारा रिलीज की जा रही है।
... लेकिन संपत्ति रिलीज क्यों नहीं हुई?
- मैंने जायदाद को लेकर कभी आगे होकर कोर्ट में दावा नहीं किया। हमेशा सरकार में विश्वास बनाए रखा। मुझे आज भी विश्वास है कि भारत सरकार ही इस विवाद का सही समाधान कर सकती है। तब इंदिरा सरकार ने लिखित में निर्णय दिया था कि ‘राजा महमूदाबाद की शत्रु संपत्ति जो संरक्षक के पास है, उसे उनके वारिसों को जो कि हमेशा भारतीय थे और हैं, उन्हें दे दी जाए।’ इसके बाद मैंने वसीयतनामा लेकर लखनऊ सिविल कोर्ट में अर्जी दी। 1986 में मुझे एकल वारिस माना गया। लेकिन वाणिज्य मंत्रालय ने मेरी संपत्ति रिलीज नहीं की। इसकी वजह वही बेहतर बता सकते हैं।
अवध की पहचान सुरक्षित रखने की कोशिश
आप राजनीति में चले गए, इससे कुछ मदद मिली?
- 1985 में राजीव गांधी ने मुझे महमूदाबाद से टिकट दिया और मैं विधायक बना। 1989 में जब बोफोर्स मामले के चलते कांग्रेसी हार रहे थे, मैं फिर से जीत कर आया। अपनी जायदाद वापस पाने के लिए मैंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को पत्र लिखे, जिनके जवाब में ‘आपके मामले पर विचार किया जा रहा है’ ही लिखा आता। इन वर्षों में मैंने राजनीति का वाणिज्यीकरण, धार्मिकीकरण और अपराधीकरण देखा और फिर कभी इसमें न लौटने का मन बनाया। राजीव गांधी को मैंने इस निर्णय की जानकारी दी। उन्हाेंने सैम पित्रोदा के जरिए मेरा विचार बदलने की कोशिश की।
मदद कहां से मिली?
- इन हालात के बाद मैंने 1997 में बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें निर्णय मेरे हक में आया। भारत सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 2005 में उनकी अपील भी खारिज करते हुए जायदाद पर मेरे अधिकार और भारतीय नागरिकता पर हक में निर्णय आया। अंतत: मुझे जायदाद पर असली हक मिला।
तब क्या सभी संपत्तियां मिल गईं?
- जी हां, सभी संपत्तियां मिलीं। केवल हजरतगंज की जायदाद में किरायेदारों का मामला फंस गया। उसे छोड़कर कर नैनीताल का मेट्रोपोल होटल और लखनऊ का बटलर पैलेस मिला। वहीं महमूदाबाद के किले पर भी अधिकार मिला। मैंने अपनी पत्नी के साथ इन खस्ताहाल हो रही जगहों को सुधारने का प्रयास शुरू किया। इसके लिए सरकार और बैंकों से लोन लिया। मेरा लक्ष्य इन जायदादों को अवध के स्थापत्य के नमूने के तौर पर प्रदर्शित व संरक्षित करने का था।
2010 के अध्यादेश ने क्या ऩुकसान किया?
- पांच साल के भीतर ही केंद्र सरकार अध्यादेश ले आई जिसमें शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 में बदलाव किए गए। इसके तहत जुलाई 2010 में सभी कुछ वापस ले लिया गया। मैं इस विषय में नहीं पड़ना चाहता कि इस अध्यादेश के तहत कितनी और शत्रु संपत्तियां वापस ली गईं, लेकिन इतना ही कहना चाहूंगा कि क्या भारत सरकार किसी एक व्यक्ति के लिए कानून बना सकती है? यह अध्यादेश बाद में लैप्स हो गया, लेकिन हमारी जायदाद ले ली गईं।
अब आप क्या कर रहे हैं?
- विवाद फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। इसकी सुनवाई शुरू होेने ही जा रही थी कि जनवरी 2016 में सरकार फिर से नया अध्यादेश ले आई है जो पिछले अध्यादेश से अलग नहीं हैं। इसके खिलाफ भी हमने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी है। मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरा लक्ष्य इस जायदाद को संरक्षित करने का है, इसके जरिए पर्यटन को बढ़ाने की सोच है। यह कोशिश केवल मेरे लिए् नहीं है, बल्कि अवध की पहचान को संरक्षित रखने के लिए है।