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'फजीहत से बचने के लिए राहुल का ड्रामा'
मनोज श्रीवास्तव/लखनऊ
Updated Sat, 28 Sep 2013 08:29 AM IST
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फजीहत से बचने के लिए ड्रामा। सजायाफ्ता लोगों की सांसदी-विधायकी बरकरार रखने को लेकर यूपीए सरकार के अध्यादेश के खिलाफ राहुल गांधी के स्टैंड लेने पर यह टिप्पणी थी लोकप्रहरी संस्था के महासचिव व रिटायर्ड आईएएस एसएन शुक्ला की।
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शुक्ल ने इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी और फैसला भी उनके पक्ष में आया था।
शुक्ला ने इस संदर्भ में पहले 24 अगस्त और फिर 24 सितंबर 2013 को राष्ट्रपति को पत्र भेजकर कहा था कि संबंधित बिल या अध्यादेश को मंजूरी देने से पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रोशनी में उसकी वैधता को परख लें।
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केंद्र के अध्यादेश के खिलाफ राहुल गांधी के बयान के बाद अमर उजाला से बातचीत में शुक्ला ने कहा कि लालू यादव व रशीद मसूद सरीखों की सदस्यता बचाने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अध्यादेश मंजूर कराकर राष्ट्रपति के पास भेज दिया।
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कहा, मेरा आकलन है कि राष्ट्रपति ने अध्यादेश पर लीगल ओपीनियन ली होगी और उन्हें समझ में आ गया होगा कि यह मसला कोर्ट में एक मिनट स्टैंड नहीं कर पाएगा।
इस बात की भनक जब कांग्रेस को लगी तब उसने फजीहत से बचने के लिए राहुल गांधी को आगे कर पैंतरा चला। इस पैंतरेबाजी के दो निहितार्थ हो सकते हैं।
एक तो राहुल गांधी को श्रेय दिलवाकर उनकी छवि में इजाफा करना और दूसरा कोर्ट में किरकिरी से बचना। पर अब जनता सब कुछ समझने लगी है।
जनवरी 2005 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था कि सजायाफ्ता चुनाव नहीं लड़ सकता। तभी मेरे दिमाग में कौंधा कि फिर सजायाफ्ता किसी सदन का सदस्य भी नहीं रह सकता।
कुछ चेहरे मेरे जेहन में चमके। मैंने कानून की किताबों की शरण ली, उनमें भी यही भाव उभरता था कि जो चुनाव लड़ नहीं सकता वह सदन का सदस्य भी नहीं हो सकता।
बस इसी आधार पर मैंने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी। 10 जुलाई को फैसला हमारे पक्ष में आया कि सजायाफ्ता व्यक्ति किसी सदन का सदस्य नहीं रह सकता। इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार रिव्यू पिटीशन में गई पर 4 सितंबर को वह भी खारिज हो गया।
खिसियाई सरकार तब एक बिल राज्यसभा में ले आई पर उसे पारित कराने के बजाय स्टैंडिंग कमेटी को रेफर कर दिया गया। बाद में 24 सितंबर को संबंधित अध्यादेश को कैबिनेट से मंजूरी दिलाकर राष्ट्रपति के पास भिजवा दिया।