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पीवी नरसिम्हा राव: यूं ही नहीं माने जाते थे राजनीति के चाणक्य, 1992 में मंदिर निर्माण योजना को दे दी थी मात

Thu, 01 Oct 2020 12:19 PM IST
प्राची प्रियम अखिलेश वाजपेयी, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, लखनऊ Published by: प्राची प्रियम Updated Thu, 01 Oct 2020 12:19 PM IST
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PV Narsimha Rao was called Chanakya of Politics played vital role in stopping Ram mandir construction in 1992
पीवी नरसिम्हा राव (फाइल फोटो)

पामुलापति वेंकट नरसिंह राव यानी पीवी नरसिम्हा राव को लोग राजनीति का चाणक्य यूं ही नहीं कहते हैं। देखने में शांत और सौम्य, पर अंदर से उतने ही दूरदर्शी और सियासी शतरंज के उस्ताद। लोग उन्हें मौनी बाबा के नाम से भी पुकारते थे। 

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पर, इन्हीं मौनी बाबा ने बतौर प्रधानमंत्री अपनी मौन चाल से 1992 में संघ परिवार और विहिप की मंदिर निर्माण की योजना को न सिर्फ मात दे दी, बल्कि संतों, विहिप और भाजपा में भी करीब-करीब दो फाड़ कर ही दिए थे।
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दरअसल, प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद ही संत और हिंदू समाज का बड़ा वर्ग अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण का सपना देखने लगा था। उन्हें लग रहा था कि जब प्रदेश में भाजपा की सरकार आ चुकी है, तो फिर मंदिर निर्माण में विलंब क्यों हो रहा है? 
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मंदिर निर्माण में विलंब से हिंदुओं और संतों का बढ़ता आक्रोश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा नेतृत्व को भी चिंता में डाल रहा था। ऐसे में जब अक्तूबर 1991 में हिंदुओं के एक गुट ने संबंधित स्थल पर तोड़फोड़ की और भगवा फहराया तो प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार चिंता में पड़ गई।

यह थी योजना: 
नतीजतन, सुनियोजित योजना के तहत प्रदेश सरकार ने लगभग 42 एकड़ भूमि श्रीराम कथा कुंज के लिए श्रीराम जन्मभूमि न्यास को सौंप दी, ताकि लोगों को यह संदेश दिया जा सके कि सरकार और संघ परिवार अयोध्या में मंदिर निर्माण को कटिबद्ध है। 

साथ ही प्रदेश सरकार ने भी 2.77 एकड़ भूमि अधिग्रहण कर उसका समतलीकरण कराना शुरू कर दिया। ढांचे की सुरक्षा के लिए दीवार बनवाई। मुस्लिम पक्ष ने समतलीकरण का विरोध शुरू किया पर, सरकार और विहिप अपना काम करती रहीं। 

इस बीच तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री शंकर राव चह्वाण सहित केंद्र के अन्य कई मंत्रियों ने कल्याण सरकार को समतलीकरण न रुकने पर गंभीर नतीजों की चेतावनी दी, लेकिन समतलीकरण का काम चलता रहा।

राव ने चली चाल
विहिप ने विवादित ढांचे को तोड़े बिना मंदिर का काम इस अविवादित जमीन से शुरू करने की योजना बना रखी थी, ताकि लोग भी संतुष्ट हो जाएं और सरकार भी चलती रहे। पर, राव को इसकी भनक लग गई। राव को शायद लगा कि संघ परिवार की रणनीति कामयाब रही तो भाजपा के पक्ष में जबरदस्त माहौल बन जाएगा। 

संघ परिवार के एक महत्वपूर्ण पूर्व पदाधिकारी दावे के साथ बताते हैं कि राव ने उस समय मंदिर आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में काम करने वाले एक सज्जन को जो उन दिनों दिल्ली में ही थे, प्रेम से बुलाया। उनसे बातचीत की। राम मंदिर के प्रति अपनी आस्था जताई और कहा कि वे भी दिल से चाहते हैं कि मंदिर बन जाए। पर, यह बनेगा कैसे, क्योंकि मुस्लिम पक्ष विरोध कर रहा है।

न्यायालय से स्थगनादेश
बताते हैं कि मंदिर आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में काम करने वाले व्यक्ति राव की सज्जनता और विनम्रता में फंस गए। उत्साहित होकर पूरी योजना बता बैठे कि अविवादित भूमि के अमुक टुकड़े से काम शुरू होगा। माना जाता है कि राव ने मुस्लिम पक्ष के बीच यह जानकारी पहुंचाई, जिसके बाद मुस्लिम पक्ष ने उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर कर दी। 

इस पर अदालत ने मार्च 1992 में सरकार को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दे दिया। मामला लटक गया। हालांकि बाद में ढांचा ध्वंस का कारण मंदिर निर्माण में देरी से उफनाया गुस्सा ही बना। इसमें इस मामले को लटकाना प्रमुख वजह थी।

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