बदहाल यूपी, लाचार अखिलेश, फेल हुआ PPP मॉडल!
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कुशीनगर को अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के रूप में विकसित करने में पीपीपी मॉडल का फेल होना चौंकाने वाली बात नहीं है। राजधानी में स्थापित हो रहे आईटी सिटी को छोड़ दें तो पिछले ढाई साल में इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में बड़े बजट वाली ज्यादातर परियोजनाएं इस मॉडल पर आगे नहीं बढ़ पाई हैं।
प्रदेश सरकार के सपनों की कई योजनाएं इसकी वजह से कई साल पीछे हो गई हैं। आखिर इस सबके पीछे वजह क्या है? आखिर क्यों रुचि लेने के बाद ऐन मौके पर निवेशक अपनी पूंजी लगाने से यहां से कन्नी काट जाते हैं। सूबे में हालात और इन्हीं सवालों पर पेश है यह खास रिपोर्ट....
निवेशक यह तो मानते हैं कि सरकार ने हाल में कई सुधार के कदम उठाए हैं। हो सकता है कि आगे उसका कुछ फायदा मिले। पर जब तक ये कदम उठाए गए तब तक पीपीपी से जुड़े कई प्रोजेक्ट में यह फॉर्मूला फेल हो चुका था।
ऐसे प्रोजेक्ट को या तो सरकार को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा या फिर सरकारी बजट लगाना पड़ा। हाल ही में आईआईएम के एक कार्यक्रम में शामिल होने आए रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर डॉ. सुबीर गोकर्ण ने इसकी वजहें भी उजागर कीं। उन्होंने इसके विकल्प पर विचार करने की जरूरत बताई।
पीपीपी के कारण इन योजनाओं में लगा वक्त
कुशीनगर एयरपोर्ट : अब एएआई से ही उम्मीद
प्रदेश सरकार ने कुशीनगर एयरपोर्ट को पहले पीपीपी मॉडल पर आगे बढ़ाने का फैसला किया था। इसके लिए टेंडर मांगे गए। टेक्निकल बिड में कई कंपनियां आईं। मगर जब फाइनेंसियल बिड का मौका आया तो कोई निवेशक नहीं पहुंचा।
आखिरकार सरकार को इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए पीपीपी मॉडल का विचार छोड़ना पड़ा। हालांकि मुख्य सचिव आलोक रंजन ने परियोजना के लिए यह कहकर उम्मीद बढ़ाई है कि एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) इसके निर्माण के लिए तैयार हो गई है। प्रदेश सरकार ने इसका प्रस्ताव भी उसे भेज दिया है।
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे: पीपीपी के चक्कर में एक साल पीछे हुई
प्रदेश सरकार ने आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे को पहले पीपीपी मॉडल पर बनाने का फैसला किया था। पिछले साल नवंबर तक सरकार इसी फॉर्मूले पर आगे बढ़ी। तकनीकी बिड में छह विकासकर्ताओं का चयन किया गया था। मगर, फाइनेंसियल बिड में कोई भी आगे नहीं आया।
इस पर मुख्यमंत्री ने प्रोजेक्ट को सरकारी बजट से तैयार कराने का फैसला किया। सरकार को 15,000 करोड़ रुपये का निवेश करना पड़ रहा है। इसकी वजह से यह परियोजना करीब एक साल पीछे हो गई।
इन मामलों में तो मुश्किल से बची सरकार की इज्जत
आईटी सिटी: किसी तरह बची लाज
राजधानी में आईटी सिटी की स्थापना पीपीपी मॉडल पर हो रही है। इसके डवलपर के रूप में एचसीएल टेक्नालॉजी समूह की वामा सुंदरी इंवेस्टमेंट को चुना गया। खास बात यह रही कि इसके लिए केवल यही संस्था आगे आई थी।
सामान्यत: एक ही आवेदक होने और प्रतिस्पर्धी न होने की वजह प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से बचा जाता है। मगर, सरकार ने यह स्पष्ट करते हुए एचसीएल को मंजूरी दी कि एक मात्र कंपनी आने की वजह से प्रक्रिया आगे बढ़ाने में कोई रोक नहीं है।
हवाई सेवा : 12 रूट, सिर्फ एक ऑपरेटर
प्रदेश के प्रमुख शहरों के बीच वायुसेवा शुरू करने की योजना उड़ान नहीं भर सकी। सरकार ने पहले 12 हवाई मार्गों पर शेड्यूल्ड या नॉन शेड्यूल्ड एयरलाइंस ऑपरेटरों के जरिये इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की तैयारी की थी।
शुरुआत में 18 प्राइवेट ऑपरेटरों ने इस प्रस्ताव पर रुचि दिखाई। मगर, बाद में केवल एक ही आगे आया। फिलहाल इसी एक ऑपरेटर के जरिये इस सेवा का शुभारंभ होने की संभावना है।
इन दिक्कतों से कतराते हैं निवेशक
आगरा इनर रिंग रोड : तमाम सहूलियतों के बावजूद खींच लिए हाथ
100 मीटर चौड़ी और 22.80 किमी. लंबी छह लेन की सड़क पीपीपी के आधार पर बनाने का फैसला किया गया था। कैबिनेट ने इस मार्ग को बनाने वाले निवेशक के लिए कई सहूलियतों का भी ऐलान किया। मसलन, सड़क पर होने वाले खर्च की व्यवस्था के लिए टोल वसूलने व सड़क किनारे 9.5 हेक्टेयर जमीन पर वे-साइड एमेनिटीज का उपयोग करने का अधिकार देने की बात कही गई।
इसके अलावा विकासकर्ता को इस बेशकीमती रिंग रोड के किनारे दोनों ओर तीन किलोमीटर के दायरे में 20 हेक्टेयर जमीन भी अपने खर्च पर खरीदने का अधिकार देने की बात तय हो गई थी। मगर फाइनेंसियल बिड में कोई आगे नहीं आया। अब सरकार इसे भी अपने बजट से आगे बढ़ा रही है।
निवेशकों के भागने के पीछे असल वजह
विशेषज्ञ बताते हैं कि कोई भी निवेशक किसी भी राज्य में तभी निवेश करना चाहता है जब वहां इंडस्ट्री फ्रेंडली वातावरण हो। उन्हें छोटी-छोटी चीजों के लिए बेवजह परेशान न होना पड़े। क्लीयरेंस की प्रक्रिया सहज हो। उसे राज्य में अपने निवेश पर बेहतर लाभ की उम्मीद हो। कानून-व्यवस्था बेहतर हो।
मगर, प्रदेश में पिछले कुछ सालों से इससे जुड़ी कई तरह की चुनौतियां बनी हुई हैं। शायद यही वजह है कि आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे, आगरा इनर रिंग रोड व एयरपोर्ट जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट में तमाम प्रयास के बावजूद निवेशकों ने रुचि नहीं दिखाई।
इंवेस्टर ज्यादा रियायतें चाहते हैं
वहीं मामले पर मुख्य सचिव आलोक रंजन का कहना है कि निवेशक इंफ्रास्ट्रक्चर की परियोजनाओं में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल में निवेश में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
नेशनल हाईवे अथॉरिटी तक को अपने तमाम प्रोजेक्ट पीपीपी से ईपीसी मॉडल पर लाना पड़ा है। इसकी एक वजह ये है कि अर्थव्यवस्था अभी मंदी के दौर से गुजरी है। इंवेस्टर ज्यादा रियायतें चाहते हैं। वर्तमान में दी जा रही सहूलियतों में वह आगे नहीं आ रहे। हालांकि सरकार ने निवेशकों के लिए अच्छी नीति बनाई है।
इंडस्ट्री के लिए जरूरी सभी 18 क्लीयरेंस ऑनलाइन कर दिए हैं। आगे माहौल बदलने की उम्मीद है। सरकार विकास में प्राइवेट प्लयेर की अहम भूमिका मानती है। आगे देखा जाएगा कि उनका निवेश लाने के लिए और क्या-क्या कदम उठाए जा सकते हैं।