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कोरोना मरीजों को राहत: पेट के बल लिटाकर ऑक्सीजन देना कारगर, ऐसे काम करती है तकनीक

Mon, 28 Sep 2020 01:45 AM IST
लखनऊ ब्यूरो चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ
चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ Published by: लखनऊ ब्यूरो Updated Mon, 28 Sep 2020 01:45 AM IST
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prone ventilation is good for corona patients
प्रोन वेंटिलेशन से पहले फेफड़े की ऐसी थी हालत। मरीज के साथ डॉ विपिन कुमार सिंह - फोटो : amar ujala
तीन से पांच दिन में ही आने लगा सुधार
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केस-1

35 साल युवक का ऑक्सीजन लेवल 60 के आसपास आ गया था। खांसते वक्त मुंह से खून निकल रहा था। तमाम प्रयास के बाद भी ऑक्सीजन लेवल गिरता देख उसे पेट के बल लिटा कर ऑक्सीजन देना शुरू किया गया। हर दिन पांच से छह घंटे प्रोन वेंटिलेशन देने के बाद पांचवें दिन उसमें सुधार नजर आया। मरीज स्वस्थ होकर 12 में दिन डिस्चार्ज हो गया।
केस-2
मरीज का ऑक्सीजन लेवल तेजी से बढ़ा

70 वर्षीय वृद्ध को आईसीयू में भर्ती कराया गया। हाई फ्लो ऑक्सीजन नोजल का प्रयोग करने के बाद भी ऑक्सीजन लेवल नहीं बढ़ रहा था। पेट के बल लेटा कर ऑक्सीजन दिया गया तो तीसरे दिन रिकवरी होने लगी। अब मरीज निगेटिव आ गया है और ऑक्सीजन लेवल 94 तक पहुंच गया है।
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कोरोना के गंभीर मरीजों के इलाज में प्रोन वेंटिलेशन यानी पेट के बल लिटाकर ऑक्सीजन देने की तकनीक कारगर साबित हो रही है। केजीएमयू के लिंब सेंटर की आईसीयू में इस तकनीक से पांच मरीजों की जान बचाने में सफलता मिली है। इसके नतीजों से उत्साहित टीम अब इस तकनीक के प्रभाव के विस्तृत अध्ययन की योजना बना रही है।
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30 फीसदी तक रिकवरी की संभावना बढ़ी

इस तकनीक से बचने वाले मरीजों के डाटा का मूल्यांकन किया जाएगा। विदेशों में हुए शोध में इस तकनीक को बेहतर माना गया है। अमेरिका के मेडिकल जनरल में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रोन वेंटिलेशन तकनीक से कोरोना के गंभीर मरीजों में 30 फीसदी तक रिकवरी की संभावना बढ़ी है।

केजीएमयू के कोविड अस्पताल लिंब सेंटर में 28 बेड का नया आईसीयू तैयार किया गया है, जबकि दो आईसीयू गांधी वार्ड और संक्रामक रोग विभाग (आईडीएच) में चल रहे हैं। लिंब सेंटर की आईसीयू की पहली टीम का नेतृत्व एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विपिन कुमार सिंह कर रहे हैं।

आईसीयू प्रबंधन में बरती गई तत्परता का नतीजा रहा कि 28 बेड के इस आईसीयू में 14 दिन के अंदर दो मरीजों की जान गई, बाकी सभी को बचा लिया गया। 10 मरीज डिस्चार्ज हो गए हैं। अन्य की स्थिति बेहतर है। उन्होंने बताया कि आईसीयू में गंभीर मरीजों को प्रोन वेंटिलेशन तकनीक का बेहतर परिणाम मिला है। 
 

पहले भी कर चुके हैं प्रयोग

आईसीयू में पांच ऐसे मरीज थे, जिनका ऑक्सीजन लेवल नहीं बढ़ रहा था। इन्हें पेट के बल लिटा कर 5 से 6 घंटे तक सांस लेने के लिए कहा गया। इसके बाद से इनका ऑक्सीजन लेवल धीरे-धीरे बढ़ने लगा है। उन्होंने बताया कि पहले भी ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट में वह यह प्रयोग कर चुके हैं। आईसीयू की टीम कोरोना मरीजों पर प्रोन वेंटिलेशन तकनीक के प्रभाव पर अध्ययन शुरू करने जा रही है। 

डॉ. विपिन के मुताबिक, ज्यादातर कोरोना मरीज एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (एआरडीएस) के शिकार हो रहे हैं। फेफड़ों में इंफेक्शन के कारण इसमें फूलने की ताकत नहीं बचती है। फेफड़ों के बाहर एक दीवार जैसा बना जाता है। मरीज सांस नहीं ले पता और ऑक्सीजन लेवल गिर जाता है।

ऑक्सीजन की कमी से दूसरे अंग भी कम करना बंद कर देते हैं। पेट के बल लेटने से फेफड़े खुलते हैं। नोजल से ज्यादा ऑक्सीजन जाती है। जब मरीज धीरे-धीरे सांस खींचने लगता है तो फेफड़े सपोर्ट करते हैं।
 
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