सपा-कांग्रेस मजबूरियों को गठबंधन, अमेठी-रायबरेली की सीटों पर अब भी किचकिच
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सपा-कांग्रेस के बीच मजबूरी की दोस्ती अभी ठीक से परवान भी नहीं चढ़ पाई कि फिर किचकिच शुरू हो गई है। दोनों में रार की वजह अमेठी व रायबरेली है। कांग्रेस इन दोनों जिलों की सभी सीटों पर अपना दावा ठोंक रही है जबकि सपा 2012 में जीती हुई अपनी सभी सीटें छोड़ने को राजी नहीं है।
अलबत्ता वह गठबंधन की मजबूरी को देखते हुए कुछ सीटें जरूर छोड़ने को तैयार हो गई है। बताया जाता है कि अमेठी व रायबरेली की ज्यादा से ज्यादा सीटों के लिए कांग्रेस सपा पर दबाव बनाने में जुटी है लेकिन सपा पांच से ज्यादा देने के मूड में नहीं है।
इसे लेकर दोनों दलों में फिर से रस्साकशी शुरू होने के आसार हैं। इसका असर साझा चुनाव अभियान पर भी पड़ सकता है। फिलहाल चुनाव के लिए सियासी केमेस्ट्री तैयार करने में दोनों को खासी मशक्कत करनी पड़ रही है।
दरअसल, कांग्रेस अमेठी व रायबरेली को अपना परंपरागत गढ़ मानती है। यह बात दीगर है कि दोनों ही जिलों में उसका किला दरक गया है और अपने सियासी किले को महफूज रखना उसके सामने बड़ी चुनौती है। यह चुनाव तो महज दिखावा है।
2019 चुनाव पर है निशाना
दरअसल, कांग्रेस की नजर 2019 के लोकसभा चुनाव पर है। उसे लग रहा है कि अगर इस बार दोनों जिलों में उसकी ताकत में इजाफा होता है तो 2019 में उसे उतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी जितनी 2014 में दोनों सीटें बचाने के लिए करनी पड़ी थी।
2012 में मिली थी सिर्फ दो सीटें
अमेठी और रायबरेली में कुल मिलाकर 10 सीटें हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अमेठी की तीन में एक तथा रायबरेली की सात में एक सीट ही जीत सकी थी। रायबरेली सदर सीट पीस पार्टी के अखिलेश सिंह ने जीती थी जबकि बाकी सीटें सपा के खाते में आई थीं।
इसके बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अमेठी सीट बचाने में पसीने छूट गए थे। इस चुनाव के जरिये कांग्रेस आलाकमान अपना सियासी किला महफूज करने में जुटा है। इसी नाते वह ज्यादा सीटों पर अपने प्रत्याशियों को खड़ा करना चाहता है।
सिटिंग सीटों पर फंसा है पेंच
सूत्रों के अनुसार, अमेठी की जगदीशपुर व रायबरेली की सदर व तिलोई सीट तो कांग्रेस को समझौते में मिलना तय है। इसके अलावा कांग्रेस का दावा अमेठी, सरेनी, गौरीगंज व ऊंचाहार सीटों पर भी है। अमेठी से कांग्रेस अमिता सिंह को लड़ाना चाहती थी लेकिन भाजपा की ओर से गरिमा सिंह को मैदान में उतारने से समीकरण बदल गए हैं।
कांग्रेस के रणनीतिकार अमेठी राजघराने की महिलाओं के बीच मुकाबले में सियासी नुकसान देख रहे हैं। इसलिए अब अमेठी सीट के लिए ज्यादा दबाव नहीं बनाया जा रहा है।
शायद यही वजह रही कि रविवार को गरिमा सिंह की उम्मीदवारी के एलान के बाद कांग्रेस का ठंडा रुख देखते हुए सपा ने अमेठी से मौजूदा विधायक व मंत्री गायत्री प्रजापति को उम्मीदवार घोषित कर दिया।
गौरीगंज सीट पर भी सपा ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। चूंकि अमिता सिंह के पति डॉ. संजय सिंह सुल्तानपुर से एमपी रह चुके हैं इसलिए उन्हें सुल्तानपुर की किसी सीट से उतारने का सुझाव दिया गया है। सरेनी, गौरीगंज व ऊंचाहार सीट अभी सपा के पास है। ऊंचाहार से पार्टी ने मौजूदा विधायक व मंत्री मनोज कुमार पांडेय को उम्मीदवार घोषित कर दिया है। इसलिए इस सीट पर कांग्रेस की दावेदारी बहुत ज्यादा मजबूत नहीं रह गई है। गौरीगंज सीट भी सपा छोड़ने को तैयार नहीं है। अलबत्ता सरेनी सीट छोड़ने की तैयारी है।
ये सीटें छोड़ी जा सकती हैं कांग्रेस के लिए
सूत्रों का कहना है कि सलोन, बछरावां व हरचंदपुर सीटों में से एकाध कांग्रेस के लिए छोड़ी जा सकती हैं लेकिन यह बहुत आसान नहीं होगा।
कांग्रेस की प्रतिष्ठा का सवाल
रायबरेली और अमेठी की सीटें कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बनी हुई हैं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी यहीं से लड़ते हैं। सियासी गलियारे में सवाल यह भी तैर रहे हैं कि क्या गठबंधन के बाद कांग्रेस सपा को अमेठी और रायबरेली के लिए मना पाएगी?
इसके अलावा कुछ और सीटों पर भी विवाद है। मसलन कांग्रेस अलीगढ़ सीट चाहती है। यहां सपा ने अपने सिटिंग विधायक जफर आलम को टिकट दिया है। कांग्रेस यह सीट पूर्व विधायक विवेक बंसल के लिए मांग रही है।
वह लखनऊ कैंट की सिटिंग सीट के एवज में भी लखनऊ शहर में एक सीट मांग रही है। साथ ही मोहनलालगंज सीट भी चाहती है। पूर्वांचल की कई सीटों को लेकर भी विवाद है। सपा पूर्वांचल की गिनी-चुनी सीटें ही छोड़ने को तैयार है।