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कांग्रेस को अब 'प्रियंका कार्ड' का सहारा

Thu, 09 Jan 2014 11:07 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 09 Jan 2014 11:07 AM IST
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priyanka gandhi active in politics

प्रियंका गांधी ने मंगलवार को दिल्ली में जिस तरह कांग्रेस के दिग्गजों के साथ बैठक की, वह कांग्रेस में उनकी बदलती भूमिका का संकेत देती है।

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उससे पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा चुनाव बाद पीएम पद की दावेदारी से अलग होने के ऐलान की पृष्ठभूमि में प्रियंका की सक्रियता को देखें तो यह बात और साफ हो जाती है।
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संभवत: कांग्रेस नेतृत्व लोकसभा का आगामी चुनाव बदलाव का संदेश देने के साथ लड़ना चाहता है। कांग्रेस अध्यक्ष समझ चुकी हैं कि चुनावी मैदान में मुकाबला केंद्र सरकार की नाकामियों पर लोगों में नाराजगी झेलनी पड़ेगी।
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महंगाई और भ्रष्टाचार का ठीकरा भी कांग्रेस के सिर फूट सकता है। इसीलिए राहुल के साथ-साथ ट्रंप कार्ड के रूप में प्रियंका को मैदान में उतारने की कवायद की जा रही है।


दरअसल, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में से हिंदी भाषी चार राज्यों दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जिस तरह कांग्रेस औंधे मुंह गिरी है।

खासतौर से दिल्ली में। उसको देखते हुए लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस में बैचैनी होना स्वाभाविक है। कांग्रेस के रणनीतिकार ही नहीं, पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी भी इस बात को समझ चुकी हैं कि मौजूदा ढर्रे पर चुनावी समर जीतना बहुत आसान नहीं है।

हवा उनके खिलाफ है। इसीलिए वह इन चेहरों के जरिये बदलाव का संदेश देना चाहती हैं। युवा सोच का लाभ मिलेगा: रायबरेली के एफजी महाविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शैलेद्र त्रिपाठी कहते हैं कि राहुल और प्रियंका युवा हैं।

उनकी सोच युवा है। इस समय देश की 65 फीसदी आबादी भी युवा वर्ग की है। ऐसे में राहुल के साथ प्रियंका सक्रिय राजनीति में आती हैं और रायबरेली संसदीय सीट से चुनाव लड़ती हैं तो देश के परिदृश्य में बदलाव से इन्कार नहीं किया जा सकता है।


साख बचाने की कोशिश

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी कहते हैं कि इस फैसले से कांग्रेस की हवा बनने की उम्मीद मुझे नहीं दिखाई देती। यूपी में आज मुसलमान कांग्रेस से दूर खड़ा है।

राहुल व प्रियंका ने ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे इनके आने से मुसलमान कांग्रेस से जुड़ जाएगा। कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण का शिगूफा छोड़ा। सच्चर कमेटी की सिफारिशों को हवा में उछाला। पर, कुछ हुआ नहीं। इसलिए काग्रेंस इन बदलावों के जरिये सिर्फ साख बचाने की कोशिश कर रही है।


यह भी है वजह

समीक्षक कहते हैं कि न सिर्फ राजनीतिक बल्कि सामाजिक व पारिवारिक स्थितियों के मद्देनजर भी सोनिया गांधी के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। अब सोनिया के लिए भी जरूरी हो गया है कि वे इंदिरा-नेहरू परिवार का एक चेहरा शीर्ष पद के लिए उतार दें।

कांग्रेस को उम्मीद है कि दागियों पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने वाले अध्यादेश को फाड़कर और फिर लोकपाल विधेयक की पैरवी करने वाले राहुल और आम लोगों से लोकप्रिय प्रियंका कांग्रेस की नैया पार लगा सकती हैं।

पर, बड़ा सवाल यह है कि जो पार्टी यूपी में अभी अपना संगठनात्मक ढांचे को लेकर हिचकोले खा रही हो, वह इस बदलाव का लाभ कैसे उठाएगी।

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