अयोध्या कूच: तोगड़िया ने हलचल तो मचाई, पर कामयाबी की राह आसान नहीं
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विहिप से अलग हुए डॉ. प्रवीण भाई तोगिड़या के विद्रोही तेवरों ने हलचल जरूर मचा दी है लेकिन उनके बहुत बड़ा उलटफेर करने में सफल होने की राह आसान नहीं है। हालांकि उन्होंने अयोध्या में नई पार्टी बनाने के फैसले को ऐन वक्त टाल दिया है। पर, उनकी गतिविधियां भगवा टोली पर दबाव बनाती जरूर दिख रही हैं।
तोगड़िया और उनके समर्थक इसे अपनी उपलब्धि मान सकते हैं। पर, इसे उनकी बड़ी और टिकाऊ सफलता मानना जल्दबाजी होगी। कारण संघ परिवार के ही अतीत के कई उदाहरण तोगड़िया की राह की सफलता की बहुत उम्मीद नहीं बंधाते। यह बात अलग है कि वह भी औरों की तरह संघ परिवार व भाजपा को राजनीतिक रूप से थोड़ा-बहुत नुकसान पहुंचा दें।
डॉ. तोगड़िया को लखनऊ और अयोध्या में सभा की इजाजत और दोनों स्थानों पर उनके मनमुताबिक कार्यक्रम करने में सफल रहने से भगवा टोली पर उनकी गतिविधियों के दबाव को समझा जा सकता है।
इससे पहले संघ परिवार के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार की देखरेख में काम कर रहे मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का मुस्लिमों के सरयू में वजू और मंदिर निर्माण के लिए दुआएं मांगने का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया था।
तोगड़िया की सक्रियता हिंदुत्व और राममंदिर पर अभी तक शांत और संघ परिवार एवं भाजपा की रणनीति के साथ चल रहे संतों को भी मुखर होने के लिए मजबूर कर सकती है। संघ परिवार और विहिप के विरोधी संत भी उनके साथ खड़े होकर भगवा टोली के लिए समस्या बढ़ा सकते हैं।
बावजूद इसके अतीत के उदाहरण और मंदिर मद्दे पर हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षकारों की तरफ से उनकी गतिविधियों पर सामने आई टिप्पणियां उनकी कामयाबी की राह को बहुत लंबी और बड़ी होने की उम्मीद नहीं बंधाती।
ये हैं उदाहरण
कानपुर में जनसंघ का अधिवेशन था, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का फैसला हुआ। बलराज मधोक ने इस फैसले का विरोध किया, पर आडवाणी अध्यक्ष हो गए। मधोक बागी हो गए। उन्होंने अंतिम सांस तक संघ और भाजपा का विरोध किया, लेकिन बड़ी सफलता नहीं मिली।
ये भी हैं उदाहरण
मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद कल्याण सिंह ने भी बगावत की राह पकड़ी। उन्होंने दो बार भाजपा छोड़ी और पार्टी बनाई, पर बहुत कामयाब नहीं हो पाए। आखिरकार वह लौटकर भाजपा में ही आ गए। अब राजस्थान के राज्यपाल हैं। नेतृत्व के फैसलों से असहमत होने पर उमा भारती ने भी बगावत की राह पकड़ी।
उन्होंने अयोध्या तक ‘राम रोटी यात्रा’ निकाली और सरयू के तट पर भाजपा का विकल्प खड़ा करने की घोषणा की। पर, उनकी भी बागी राह बड़ा मुकाम नहीं हासिल कर पाई। वह भी भाजपा में लौट आईं। मदनलाल खुराना का भी उदाहरण है।
अलबत्ता एक उदाहरण बाबूलाल मरांडी का जरूर है जो तोगड़िया की उम्मीद बंधा सकता है। पर, मरांडी की परिस्थितियां अलग थीं। हालांकि मरांडी भी बगावत के बाद पहले चुनाव में ही थोड़ा-बहुत असर दिखा पाए, लेकिन अकेले दम पर झारखंड में भाजपा का विकल्प नहीं बन पाए।