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MP ने 2.9 लाख गरीबों को दी शिक्षा, यूपी ने 94
सचिन त्रिपाठी/लखनऊ
Updated Mon, 04 Nov 2013 01:50 PM IST
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गरीब बच्चों का निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा का सपना पूरा कर पाने में यूपी फिसड्डी साबित हुआ है।
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जहां पड़ोसी राज्यों में हजारों गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला मिला, वहीं यूपी दहाई के आंकड़े को भी पार नहीं कर सका।
सर्व शिक्षा अभियान की ओर से शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत हुए दाखिलों की दो तिमाही की जारी रिपोर्ट से ये खुलासा हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में महज 94 गरीब बच्चों को, जबकि इसी दौरान बिहार, राजस्थान और उत्तराखंड में हजारों बच्चों को निजी स्कूलों में एडमिशन मिला।
मध्य प्रदेश में तो यह आंकड़ा 2 लाख 86 हजार तो छत्तीसगढ़ में 1 लाख 63 हजार से भी अधिक जा पहुंचा है।
अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 की धारा 12 के तहत निजी स्कूलों की 25 फीसदी सीटों पर गरीब बच्चों को मुफ्त दाखिले का अधिकार दिया गया।
इन बच्चों के खर्च की प्रतिपूर्ति राज्य सरकारों को करनी थी। प्रदेश सरकार ने अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए शासनादेश जारी किया, लेकिन इसकी जटिलताओं के कारण गरीब बच्चों के लिए निजी स्कूलों की राह आसान नहीं हो पाई।
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दाखिले के लिए पापड़ बेलने वाली प्रक्रिया
दरअसल प्रदेश सरकार ने केवल शहरी क्षेत्र के निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को दाखिला देने संबंधी शासनादेश जारी किया। इसमें सभी स्कूलों के बजाय केवल जिला अधिकारी द्वारा चुने गए विद्यालयों में ही एडमिशन देने की व्यवस्था की गई। इसके बाद दाखिले की भी प्रक्रिया बेहद जटिल है।
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अधिनियम के तहत सूबे के निजी स्कूलों में एडमिशन पाने के लिए पहले बेसिक शिक्षा अधिकारी के पास आवेदन करना होता है।
आवेदन के साथ आय प्रमाण पत्र और निवास का प्रमाण पत्र लगाना होता है। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के संतुष्ट होने पर आवेदन जिला अधिकारी के यहां भेजा जाता है।
डीएम के आदेश के बाद ही बच्चे को निजी स्कूल में दाखिला मिल सकता है। झुग्गी-झोपड़ी और गरीबी में जीवन बिताने वाले व्यक्ति के लिए पहले तो आय और निवास प्रमाण पत्र बनवाना काफी कठिन काम है।
इसके बाद रोजी-रोटी की फिक्र छोड़कर जिला बेसिक शिक्षा कार्यालय और जिलाधिकारी कार्यालय के चक्कर काटना किसी दिहाड़ी मजदूर के लिए मुमकिन नहीं है।
लखनऊ में नहीं हुआ एक भी एडमिशन
राजधानी लखनऊ में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत निजी स्कूलों में एक भी बच्चे को एडमिशन नहीं मिल पाया। जिलाधिकारी ने केवल उन वार्डों के निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को एडमिशन देने के लिए कहा, जहां एक भी परिषदीय विद्यालय नहीं है।
लखनऊ में 27 वार्ड ऐसे हैं जहां एक भी परिषदीय स्कूल नहीं है। इन वार्डों में रहने वाले कई अभिभावकों ने अपने बच्चे के निजी स्कूल में दाखिले के लिए आवेदन किया पर कोई न कोई कमी बताकर एडमिशन नहीं दिया गया।
नहीं उठा बेसिक शिक्षा निदेशक का फोन
यूपी में इतने कम गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला मिलने को लेकर बेसिक शिक्षा निदेशक बासुदेव यादव से बात करने की कोशिश की गई। शुक्रवार को उन्हें कई बार फोन किया गया लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की।
इसके बाद उनके मोबाइल पर मैसेज भी किया गया, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया। शनिवार को भी उनके फोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने मोबाइल नहीं उठाया।