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तुष्टीकरण बनाम ध्रुवीकरण की राजनीति: शुरुआत में असमंजस में रही भाजपा, ...और फिर बदल लिए तेवर

Thu, 14 Mar 2024 11:08 AM IST
शाहरुख खान अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: शाहरुख खान Updated Thu, 14 Mar 2024 11:08 AM IST
सार

अब तक आपने पढ़ा कि कैसे दोहरी सदस्यता का विवाद खड़ा हुआ। कैसे 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी बनी। अब आगे पढ़ें...
 

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Politics of Appeasement vs Polarization Was confused in beginning and then BJP changed its stance
लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा में नरेंद्र मोदी। - फोटो : narendramodi.in

विस्तार

6 अप्रैल 1980 को जब भारतीय जनता पार्टी बनी, उस दौर में मुस्लिम तुष्टीकरण चरम पर था। ज्यादातर दलों को लगता था कि मुस्लिमों को रिझाए बिना राजनीतिक सफलता हासिल करना मुश्किल है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मुख्य चिंता राजनीति में मुस्लिम वर्चस्व की थी। संघ इसे तोड़ना चाहता था।
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लोहियावादी मधु लिमये जैसे नेताओं को शायद यह डर था कि यदि मुस्लिम वोट खिसक गया तो कांग्रेस से निपटना मुश्किल होगा। संघ और विश्व हिंदू परिषद सहित कई संगठन मुस्लिम तुष्टीकरण नीति पर हमलावर थे। इन संगठनों को मुस्लिम मानस पसंद नहीं करता था। जनता पार्टी से जनसंघ के नेता बाहर हों, उससे पहले ही सतर्क संघ ने हिंदुओं की लामबंदी शुरू कर दी।
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कांग्रेस से ही तो नहीं ली सीख
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि और ईदगाह और काशी में काशी-विश्वनाथ मंदिर बनाम ज्ञानवापी मस्जिद विवाद चर्चा में थे। संघ से जुड़े संगठन एवं अन्य हिंदू संगठन इनकी मुक्ति की मांग करते रहते थे। शीर्ष स्तर पर काफी मनन-मंथन के बाद संघ ने सबसे पहले अयोध्या विवाद को लेकर आंदोलन का निश्चय किया। उसने अपने पांच प्रचारकों अशोक सिंहल, महेश नारायण सिंह, मोरोपंत पिंगले, आचार्य गिरिराज किशोर, ओंकार भावे को कार्ययोजना बनाने पर लगा दिया। 
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राम और हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने का सिलसिला कांग्रेस ने ही शुरू किया। 1948 में विधानसभा की फैजाबाद सीट पर हुए उपचुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने कांग्रेस प्रत्याशी बाबा राघवदास के समर्थन में राम और हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगा। नतीजा यह हुआ कि प्रख्यात समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव हार गए। बाबा राघव दास उन पांच लोगों में शामिल थे, जिन पर अयोध्या में विवादित ढांचे में रामलला का विग्रह रखने का आरोप लगा था।

शुरुआत में असमंजस में रही भाजपा 
दोहरी सदस्यता के विवाद पर जनसंघ के नेता जनता पार्टी से अलग हो चुके थे। 6 अप्रैल 1980 को भाजपा का गठन हो चुका था। पर, ऐसा नहीं है कि भाजपा ने गठन के साथ ही अयोध्या आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी हो। काफी दिनों तक वह असमंजस में रही। इस बीच केरल के मीनाक्षीपुरम में धर्मांतरण की बड़ी घटना हुई।

एक गांव के सभी लोगों ने इस्लाम अपना लिया। संघ और विहिप ने इसको लेकर तत्कालीन सरकारों की मुस्लिम तुष्टीकरण नीति पर निशाना साधा। कांग्रेस के भीतर से भी असंतोष के स्वर सार्वजनिक हुए। यह सब देखते हुए संघ और विहिप ने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति के मुद्दे को जनता के  बीच ले जाने का फैसला किया। रथयात्राएं निकलीं ।

...और भाजपा ने बदल लिए तेवर
भाजपा ने मुस्लिम तुष्टीकरण का तो विरोध किया। पर, राम मंदिर आंदोलन में उसकी बहुत ज्यादा सक्रियता नहीं दिखी। वह गांधीवादी समाजवाद के नारे के साथ काम करती रही। भाजपा को 1980 और 1984 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश में एक भी सीट नहीं मिली।

विधानसभा के 1980 में हुए चुनाव में भाजपा को प्रदेश में 425 सीटों में से सिर्फ 11 और 1985 में केवल 16 सीटों पर ही जीत हासिल हुई, तो उसने पुरानी लीक पर लौटने का फैसला किया। वर्ष 1989 में भाजपा के पालमपुर अधिवेशन में राम मंदिर के  निर्माण का समर्थन करते हुए इसे पार्टी के घोषणापत्र में शामिल किया गया।
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