लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने के पीछे छिपी है ये सियासी चाल
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लंबी कवायद के बाद आखिरकार लखनऊ स्मार्ट सिटी बनने की कतार में शामिल हो ही गया। पर, फैसले के पीछे सिर्फ अंकों का खेल ही नहीं दिख रहा है बल्कि राजनीतिक गणित भी नजर आ रहा है। ऐसा लगता है कि प्रदेश में कुछ महीनों बाद शुरू होने वाले चुनावी समर को ध्यान में रखते हुए केंद्र ने सियासी समीकरण साधने के साथ ही सपा और बसपा जैसे दलों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।
पूरी स्थिति और लखनऊ को स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल करने के लिए प्रक्रिया में किए गए बदलाव से यह बात और साफ तौर पर दिखाई देती है। यही नहीं, कहीं न कहीं इसके पीछे केंद्र और राज्य सरकारों में काम करने का श्रेय लेने की होड़ भी नजर आ रही है।
जिसके चलते केंद्र सरकार ने लखनऊ को स्मार्ट सिटी की सूची में नंबर एक पर रखकर यूपी को अपने पूरे एजेंडे में सबसे टॉप पर रखने का संदेश देने की कोशिश की है। साथ ही उसकी मंशा यह जानकारी देने की भी दिख रही है कि यूपी सरकार भले ही सूबे के लोगों की सुविधाओं की अनदेखी कर रही हो, लेकिन केंद्र उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं देने के लिए बेहद गंभीर है।
जून 2015 से शुरू हुई लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद के एक साल बाद जिस तरह मुकाम पर पहुंची है, उससे लग रहा है कि चुनावी समर में भाजपा का एक मुद्दा स्मार्ट सिटी भी होगा।
बनेगा हमले का बहाना
माना जा रहा है कि केंद्र सरकार ने इस फैसले के बहाने राज्य सरकार और बसपा को कठघरे में भी खड़ा करने की कोशिश की है। पहले चरण में लखनऊ का स्मार्ट सिटी की कतार से बाहर होना और फिर फॉस्ट ट्रैक प्रक्रिया के जरिये शामिल होना इसका प्रमाण है।
संभवत: केंद्र सरकार यूपी के लोगों को यह बताना चाहती है कि सूबे में इन पार्टियों की सरकारों ने 12-13 साल में गांव तो दूर लखनऊ जैसे महानगर तक के विकास के लिए ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे देश के सबसे बड़े सूबे की राजधानी लखनऊ भी लोगों को बेहतर सुख सुविधा देने की कसौटी पर खरी उतर जाती।
केंद्र ने यह भी बताने की कोशिश की है कि वह उत्तर प्रदेश के विकास को लेकर इतना चिंतित है कि राजधानी लखनऊ को स्मार्ट सिटी के दायरे में लाने के लिए प्रक्रिया बदल कर फॉस्ट ट्रैक नाम की पद्धति लाई। जिससे कम से कम उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की राजधानी तो स्मार्ट सिटी बन ही जाए।
यह भी है वजह
चुनावी साल में लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने के प्रस्ताव पर मुहर के पीछे सियासी संदेश के साथ भाजपा के अपने समीकरण भी रहे हैं। एक तो लखनऊ देश के गृहमंत्री और मोदी की कैबिनेट में नंबर दो का रुतबा रखने वाले राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र भी है। दूसरे लखनऊ नगर निगम पर भाजपा का पिछले लगभग 20 सालों से कब्जा है।
यही नहीं, लखनऊ भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी का न सिर्फ संसदीय क्षेत्र बल्कि उनकी कर्मस्थली भी रही है। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भी लखनऊ को केंद्र बनाकर न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे उत्तर भारत में काम किया था। अगर लखनऊ में स्मार्ट सिटी बनने की कतार में न शामिल हो पाता तो कहीं न कहीं इन सबकी उपेक्षा का सवाल खड़ा होता।
इसका कुछ न कुछ नकारात्मक संदेश चुनाव में भाजपा के विरोध में भी जा सकता था। आरोप लगते कि मोदी की सरकार को उत्तर प्रदेश तो दूर, अटल और दीनदयाल की कर्मस्थली की भी चिंता नहीं है।
राजनाथ सिंह भले ही कहने को नंबर दो के नेता माने जाते हों, लेकिन उनका भी कोई महत्व नहीं है। जिसका असर 2017 के चुनावी समर पर भी पड़ सकता था।
यह भी सियासी चाल
मेरठ और रायबरेली के मामले में केंद्र ने एक तरह से गेंद फिर सूबे के पाले में डाल दी है। उसने मेरठ और रायबरेली दोनों को ही स्मार्ट सिटी की दौड़ वाली सूची में शामिल कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि विकास की कसौटी और लोगों की सुविधा के नाम पर केंद्र सरकार कोई सियासत नहीं करना चाहती।
भले ही वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की रायबरेली ही क्यों न हो। अब प्रदेश सरकार से इन दोनों शहरों के लिए भेजे जाने वाले प्रस्ताव के आधार पर कोई एक बाहर होता है तो केंद्र सरकार को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि वह तो पूर्व फैसले को बदलकर यूपी के 13 की जगह 14 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए सभी सुविधाएं और धन देने को तैयार थी।
पर, प्रदेश सरकार अमुक शहर को स्मार्ट सिटी के मानकों की कसौटी पर खरा उतरने लायक भी नहीं बना पाई। ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने प्रदेश की चाल समझ ली थी। उसे एहसास था कि मेरठ को सूची से बाहर करेगी तो पश्चिम में उसके वोटों पर असर पड़ सकता है।
रायबरेली को बाहर करेगी तो विपक्ष की तरफ से राजनीतिक विरोध की आड़ में विकास को ठप रखने का आरोप लगेगा। इसीलिए उसने दोनों को ही सूची में शामिल कर चुनाव के लिए एक मुद्दा और तलाश लिया है। भाजपा के नेता अब कह सकते हैं कि प्रदेश सरकार विकास पर भी किस तरह राजनीति कर रही है।
इसका उदाहरण मेरठ और रायबरेली हैं। केंद्र ने स्मार्ट सिटी बनाने के लिए 13 शहर मांगे थे लेकिन सपा सरकार ने जानबूझकर 14 भेज दिए। जिससे किसी का भी चयन न हो पाए। पर, केंद्र ने दोनों को शामिल कर लिया।