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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   political hate speeches during loksabha election 2014

लोकसभा 2014: खूब चले सियासत के जुबानी बाण

Wed, 07 May 2014 09:07 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 07 May 2014 09:07 AM IST
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political hate speeches during loksabha election 2014

जुबान पर विकास और दिमाग में बिसात, कुछ यही हाल रहा है इस बार चुनावी समर में उतरे नेताओं का।

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न कोई एक पार्टी और न गिने-चुने नेता बल्कि सभी दल और सभी नेता चुनावी समर में अपने सियासी बाणों पर सांप्रदायिकता के रंगों की सान चढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। मुजफ्फरनगर से लेकर मंदिर के मॉडल वाले फोटो तक इसका प्रमाण है।

किसी एक-दो चरण में नहीं बल्कि हर चरण में इन कोशिशों को ज्यादा परवान चढ़ाने की कोशिश हुई। आयोग ने प्रतिबंध लगाया तो कुछ ने आयोग पर ही निशाना साध दिया।

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आजम और अमित शाह पर लगा प्रतिबंध

political hate speeches during loksabha election 2014

सभाएं करने पर प्रतिबंध से नाराज सपा के वरिष्ठ नेता मो. आजम खां ने आयोग को चुनौती दी कि उसमें दम हो तो उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करके दिखाए।

सपा के कुछ नेताओं ने आयोग पर भाजपा की मदद करने तक का आरोप लगाया।

अमित शाह आयोग की पाबंदी पर चुप तो रहे लेकिन पाबंदी हटने के बाद वह भी यह कहे बिना नहीं रहे कि उनके बयान की सपा के मंत्री मो. आजम खां से तुलना नहीं की जा सकती।

उन्होंने तो बदला लेने की बात महंगाई के सिलसिले में कही थी। महंगाई बढ़ाने वालों से बदला लेने के लिए आह्वान वैसा मामला नहीं है जैसा आजम ने कारगिल शहीदों के बारे में कहा था।

दंगे की आंच में सेंकीं रोटियां

political hate speeches during loksabha election 2014

मुजफ्फरनगर दंगा भले ही आम लोगों के लिए बड़ा दुख लेकर आया हो लेकिन सियासी दलों ने इस दंगे की आंच पर अपनी सियासी रोटियां सेंकने में कसर नहीं छोड़ी।

चुनाव की शुरुआत इसी इलाके से हुई। सपा, बसपा और कांग्रेस मुसलमानों की लामबंदी के लिए तरह-तरह के फॉर्मूले लिए नजर आईं।

भाजपा ने भी इस घटना को लेकर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। पहले चरण का चुनाव निपटते-निपटते भाजपा को बढ़त मिलने की चर्चा फैली तो ये कोशिशें और बढ़ती दिखी।

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इन बातों पर भी वोटों के ध्रुवीकरण की छाया

political hate speeches during loksabha election 2014

तीसरे चरण के चुनाव से पहले आयोग ने अमित शाह पर से तो प्रतिबंध हटा लिया, पर आजम खां को रियायत नहीं दी।

सपा ने इस पर भी वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश की। साफ-साफ न सही लेकिन इशारों में आजम के मुद्दे पर मुस्लिम वोटों को सपा के साथ लामबंद करने की कोशिश की गई।

हो सकता है कि नरेंद्र मोदी के नामांकन की तारीख तय करने के पीछे वोटों का ध्रुवीकरण करना मकसद न रहा हो लेकिन भाजपा विरोधी दलों ने आरोप इसी तरह के लगाए।

कहा कि वोटों को लामबंद करने के लिए जानबूझकर मोदी का यह कार्यक्रम बनाया गया। इसीलिए मोदी ने जानबूझकर रोड शो किया। गंगा और विश्वनाथ के बहाने वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की।

आजमगढ़ पर भी गरमाई बयानबाजी

political hate speeches during loksabha election 2014

चुनाव अंतिम चरण में पहुंच गए हैं लेकिन नेता वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश से बाज आने को तैयार नहीं हैं।

सपा नेता अबू आजमी कह रहे हैं कि सपा को वोट न देने वाले मुसलमानों का डीएनए टेस्ट कराना चाहिए। अमित शाह बयान देते हैं कि मुलायम सिंह यादव ने पैरवी कर-करके आजमगढ़ को आतंकवादियों का अड्डा बना दिया है।

शाह के बहाने आजम फिर वोटों की लामबंदी में जुटे नजर आ रहे हैं। चुनाव आयोग पर फिर हमला बोल दिया है।

कहा है, ‘आयोग ने अमित शाह जैसे अपराधी को इसलिए छूट दी है कि वह मुलायम सिंह जैसे इंसानियत के दोस्त पर कीचड़ उछाल सके और फिरकापरस्त ताकतें मजबूत हो सकें।’

जाहिर है कि आजम का निशाना कहां है। मोदी फैजाबाद में पार्टी प्रत्याशी लल्लू सिंह के समर्थन में सभा के लिए आते हैं तो वह भले ही श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पर मौन साधे रहते हैं लेकिन उनके मंच पर मौजूद श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के मॉडल वाला चित्र परोक्ष रूप से वोटों के ध्रुवीकरण का संदेश देता ही नजर आता है।

शुरुआत अमित शाह और आजम से

political hate speeches during loksabha election 2014

भाजपा के अमित शाह और सपा के मो. आजम खां आगे दिखे। शाह बोले, अन्याय का बदला लेने का वक्त आ गया है। ईवीएम का बटन दबाकर बदला लें।

सपा, बसपा और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि शाह हिंदुओं को भड़काकर वोटों का ध्रुवीकरण करना चाह रहे हैं। यह मामला शांत होने से पहले ही आजम खां ने कारगिल युद्ध पर विवादित बयान दे दिया।

कहा, ‘हिंदुओं की वजह से नहीं मुसलमानों की वजह से कारगिल युद्ध में जीत मिली।’ दोनों ही विवादित बयानों पर बवाल मच गया।

आयोग ने आजम और अमित शाह दोनों की सभाओं व भाषणों पर प्रतिबंध लगा दिया। आयोग के फैसले पर भन्नाए खां साहब ने इसकी काट निकाल ही ली। उनके लिखित भाषण दूसरे किसी नेता द्वारा पढ़े जाने लगे।

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