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छब्बे बनने और दूबे बनकर लौटे
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 17 Jun 2014 12:00 PM IST
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कहावत है कि चौबे जी गए थे छब्बे बनने और दूबे बनकर लौटे। पिछले दिनों एक भाजपा नेता के साथ ऐसा ही हुआ।
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बेचारे गए थे एक बड़े नेता के पास यह सोचकर कि उनकी सलाह पर इनाम मिलेगा। पर, हो गया उल्टा। जैसे ही वे बड़े नेताजी के कान में फुसफुसाए, नेताजी उखड़ गए। चेहरा लाल। तमतमाते हुए बोले, ‘क्या कह रहे हो।
अपनी सलाह अपने पास ही रखो। वैसे ही तुम लोगों की मूर्खता को मैं कम नहीं झेल रहा हूं। बता रहे हो कि उसे चुनाव लड़ा दूं। तुम लोगों को कुछ दिखाई नहीं देता।
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तुम्हारी समझ में नहीं आता कि प्रधानमंत्री जी ने क्या कहा, ‘न परिवारवाद और न रिश्तेदारी व नातेदारी।’ वह यहीं नहीं रुके।
एक वरिष्ठ नेता को बुलाकर कहा कि इन्हें समझा दो वरना नेतागीरी छोड़ कचहरी में वकालत करें। बेचारे! वकील से नेता बने ठाकुर साहब। घूम-घूमकर लोगों से पूछे रहे हैं, ‘क्या हुआ! नेताजी ऐसे तो न थे।’
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