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Special Story: सियासी हाराकीरी की ओर सपा

Mon, 17 Oct 2016 03:56 PM IST
इंदुशेखर पंचोली/अमर उजाला, लखनऊ
इंदुशेखर पंचोली/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 17 Oct 2016 03:56 PM IST
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political analysis of crisis in sp by indushekhar pancholi
डेमो प‌िक - फोटो : amar ujala
समाजवादी पार्टी चंद दिन बाद ही अपनी स्थापना के रजत जयंती वर्ष में प्रवेश करने जा रही है। इस मौके पर पार्टी राजधानी में बड़ा जलसा भी करेगी। 24 साल के सफर में सपा ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 
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कई चुनौतियों से जूझी। सत्ता पाई, खोई भी। लेकिन सूबे की बड़ी सियासी ताकत बनी। पार्टी अब जिस अतंर्कलह से गुजर रही है, संभवत: वह उसका सबसे बड़ा संकट है। चुनाव के ऐन मौके पर उसकी सबसे बड़ी चुनौती इसी संकट से उबरने की है। इसके नतीजे ही सपा की दशा-दिशा के साथ उसका भविष्य तय करेंगे। सपा की सियासत का एक सिंहावलोकन।
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देश के सबसे बड़े सियासी परिवार की महाभारत इस मुकाम पर पहुंचेगी, विरोधियों को भी अंदाजा नहीं था। परिवार के पितामह मुलायम सिंह यादव का यह एलान कि सपा अपना अगला मुख्यमंत्री चुनाव में बहुमत हासिल करने के बाद तय करेगी, चौंकाने वाला है। 
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उन्होंने यह तक मानने से इन्कार कर दिया कि अखिलेश यादव 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा का चेहरा होंगे। अखिलेश समर्थक ही नहीं, उनसे खफा रहने वाले भी इस पर तो एकमत रहे हैं कि चुनाव में अखिलेश ही पार्टी का चेहरा होंगे। 

उनके चाचा और प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव तो सार्वजनिक एलान कर चुके हैं कि बहुमत मिलने पर अगले मुख्यमंत्री भी अखिलेश ही होंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि अब तो सपा में कोई विवाद नहीं रहना चाहिए। 

शनिवार को शिवपाल ने इटावा में दोहराया भी कि बहुमत आने पर वे खुद बतौर सीएम अखिलेश का नाम प्रस्तावित करेंगे। लेकिन, यह कहने से नहीं चूकेकि कुछ लोग नसीब और विरासत से सब कुछ पा लेते हैं, कुछ जिंदगी भर संघर्ष ही करते रह जाते हैं।

शिवपाल का बयान ही सच होता, तो मुलायम का बयान नहीं आना चाहिए था। अखिलेश और शिवपाल की सतही चुप्पी के पीछे दरअसल तल्खियों की खाई गहरा रही थी। समर्थक अति-आशावाद में जिसे सुलह-समझौते का दौर मान रहे थे, वैसा था नहीं। 

असलियत तो यह है कि दोनों के बीच दूरियां इतनी बढ़ र्गईं हैं कि सुलह की कोई गुंजाइश बची ही नहीं है। यह स्वाभाविक और तार्किक भी है कि सत्तारूढ़ सपा के चुनावी चेहरे अखिलेश ही रहें। 

द‌िखने लगीं प‌िता-पुत्र के बीच की दूर‌ियां

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अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala

सामान्य बच्चे को भी इतनी समझ तो होती ही है कि साल भर पढ़ाई उसने की है, तो इम्तिहान भी उसी का होगा। पैरेन्ट्स उसकी जगह इम्तिहान में नहीं बैठ सकते। यहां उलटा हो रहा है। स्टूडेन्ट तो इम्तिहान को तैयार है, लेकिन स्कूल में दाखिला दिलाने वाले पिता-चाचा उसे खारिज करने पर आमादा हैं।

किसी भी सियासी दल के लिए सत्ता हासिल करना एकमेव मकसद होता है। मुलायम ही नहीं, सियासत के तमाम दिग्गज कई बार और बार-बार यह कहते भी रहे हैं कि राजनीति में वे भजन करने नहीं आए हैं। 

ऐसे में, मौजूदा दौर के सबसे खांटी सियासतदां मुलायम का ताजा बयान न सिर्फ उनके भजनोन्मुख-भाव को प्रकट करता है, कहीं-न-कहीं आत्मघाती सियासत की तरफ बढ़ता भी दिखता है। 

आपसी संवाद बंद हो जाने तक पहुंच चुके पारिवारिक कलह के बावजूद खास-ओ-आम, दोनों ही तबकों में अब भी यह मानने वाले बहुतायत हैं, जिन्हें लगता है कि अपने मुख्यमंत्री बेटे की छवि निखारने के लिए सियासी दंगल के माहिर अखाड़ेबाज मुलायम सिंह का बड़ा दांव है।

लोकसभा चुनाव से पहले मुलायम सिंह ने जब सीएम बेटे को पार्टी मंच से सार्वजनिक तौर पर डांटने की शुरुआत की थी, तब शायद ऐसा ही था। कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए वे संदेश देना चाहते थे कि उनके लिए नेताजी मुख्यमंत्री तक को डांट देते हैं। 

वह दौर था, जब सत्ता के गलियारों से आम गलियों तक यादवी पराक्रम और मुस्लिमों को बढ़ावा देने से आम कार्यकर्ता पस्त हो रहा था। लेकिन, लोकसभा चुनाव में अपेक्षित नतीजे नहीं मिले। उलटे मुलायम की प्रधानमंत्री न बन पाने की हसरत कसक में बदल गई। 

इस कसक ने डांट के सियासी दांव को स्थायी भाव दे दिया। चचाजान और चाचा पहले से थे, कुछ और बीच वालों ने भी अपनी-अपनी भूमिका निभाई और पिता-पुत्र की दूरियां दिखनी शुरू हो गईं। यह दौर, साढ़े चार और साढ़े पांच मुख्यमंत्री की चर्चाओं का था और टीपू से असली सुल्तान बनते अखिलेश की इन ‘मुख्यमंत्रियों’ से मुक्ति की छटपटाहट का भी।

आसानी से नही छूटता सत्ता मोह

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डेमो प‌िक - फोटो : amar ujala

अखिलेश सत्ता के इकलौते केन्द्र के तौर पर खुद को स्थापित करने के लिए सक्रिय होने लगे, तो जाहिर है सुल्तान से ‘टीपू’ सा व्यवहार करने वाले चार कथित मुख्यमंत्रियों को ताकत कम होने का डर भी सताने लगा। 

उन्होंने मुलायम के गले यह उतारने की कवायद शुरू कर दी कि अखिलेश उनकी अथॉरिटी को चुनौती दे रहे हैं। सत्ता-मोह आसानी से छूटता भी कहां है? मुलायम सत्ता व संगठन, दोनों में अपनी सर्वोच्चता कायम रखना चाहते थे, तो बतौर मुख्यमंत्री अखिलेशं दूसरों के दखल से मुक्ति। 
अखिलेश के कुछ निर्णयों से मुलायम की रजामंदी नहीं दिखी, तो बाकी चार का काम और आसान हो गया। उधर, मुलायम का अमर-प्रेम भी हिलोरें लेने लगा। चतुर रामगोपाल यादव, अखिलेश के साथ खड़े हो गए।
 
भारी-भरकम बजट वाले विभागों केमालिक होने केबावजूद शिवपाल खफा हुए, तो मुलायम केसत्ता-संतुलन के मंत्र से सरकार-संगठन दोनों में उनका कद बढ़ा दिया गया। वे ताकतवर मंत्री के साथ पार्टी संविधान मेें व्यवस्था न होने केबावजूद सपा के प्रदेश प्रभारी भी हो गए। 

सरकार में वह जैसे सत्ता के अलग केंद्र थे, पंचायत चुनाव लड़वाने की जिम्मेदारी के साथ पार्टी में भी वैसा ही दबदबा हासिल हो गया। तुष्टि-संतुष्टि के बावजूद शिवपाल की चाहत वैसा ही सत्ता-केंद्र बनने की रही, जैसा वह मुलायम केमुख्यमंत्रित्व काल में थे। 

वहीं, आजम खां कभी दबाव तो कभी ब्लैकमेलिंग के टेक्टिकल ऑपरेशंस से अपने हित साधते रहे। लेकिन, अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क अखिलेश ने मौके-बेमौके सभी की मंशाओं पर ब्रेक लगाने का अवसर भी नहीं गंवाया।

श‌िवपाल के मंच से कराई थी तोताराम की ग‌िरफ्तारी

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शिवपाल यादव - फोटो : amar ujala

अखिलेश के लिए बड़ी चुनौती चार कथित मुख्यमंत्री ही नहीं, उनके बेलगाम समर्थक भी थे जो जगह-जगह शासन-प्रशासन के लिए मुश्किलें खड़ी कर सुर्खियां बटोरने लगे थे। पंचायत चुनाव में बागडोर शिवपाल को मिली, तो उनके एक नजदीकी पैकफेड के मुखिया और दर्जाधारी राज्यमंत्री तोताराम यादव मैनपुरी में बूथ लूटते टीवी कैमरों में कैद हो गए। 

सरकार की खासी किरकिरी हुई। अखिलेश को खुद-एतमाद होने का संदेश देने का मौका मिला, उन्होंने शिवपाल के मंच से ही तोताराम को गिरफ्तारी करा दिया। सार्वजनिक तौर पर यह पहला मौका था, जिसमें 5-कालिदास मार्ग के ही सत्ता-केंद्र होने का संदेश गया। 

यह नेताओं-अफसरों के  लिए भी कड़ा संदेश था कि परिक्रमा के लिए एक ही देहरी है। बाहुबली मुख्तार की पार्टी के विलय से नाइत्तफाकी उसी संदेश का विस्तार था। लेकिन, अफसरशाही का मुखिया तय करने में अखिलेश की खुद-एतमादी पर सवाल खड़े हो गए। चाचा शिवपाल बाजी मार ले गए।

अखिलेश जिस अफसर को मुखिया बनाना चाहते थे, उसे खुद केंद्रीय डेपुटेशन से छुड़वाकर लाए थे। अखिलेश नहीं चाहते थे कि उनकी स्टेट्समैनशिप पर सवाल उठें। हालांकि मौके के लिए उन्हें लंबा इंतजार नहीं करना पड़ा। यहीं से चाचा-भतीजे के वार-पलटवार शुरू हुए। घर का झगड़ा सतह पर आ गया। अखिलेश को प्रदेश अध्यक्षी गंवानी पड़ी, तो शिवपाल को अहम महकमे। 

नाराज मुलायम, बेटे को दरकिनार कर भाई के साथ खड़े हो गए। संवादहीनता ऐसी बढ़ी कि संदेश देने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ा। अखिलेश ने यह अतिरिक्त सावधानी बरती कि बार-बार मुलायम की सर्वोच्चता पर मुहर लगाते रहे। यह उनकी रणनीति है, ताकि किसी भी तरह अपने पसंदीदा चेहरों को ज्यादा टिकट दिलवा सकें। इसीलिए चुनावी चेहरे और भावी सीएम से मुलायम के इन्कार के बाद भी उन्होंने सीधी, सधी और संतुलित प्रतिक्रिया दी। लेकिन, मुलायम की कठोरता कम ही नहीं हो रही।

मुलायम के ल‌िए अख‌िलेश से बड़ा कोई तुरुप नहीं

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मुलायम सिंह यादव - फोटो : amar ujala

बतौर सीएम अखिलेश को विरासत में मंत्रियों-अफसरों की जो टीम मिली, वह मुलायम की थी। ज्यादातर को तो विभाग भी पुराने वाले ही मिले थे। सोच भी पुरानी और काम करने के तौर-तरीके भी। 

अखिलेश ने उनके साथ कदमताल में अपने को असहज पाया। उनसे कटने लगे, तो दूरियां बढ़ीं। अपने मुखिया से मिलने केलिए मंत्रियों को लंबे इंतजार पर मजबूर होना पड़ गया। नेता अपने दुखड़े लेकर मुलायम केदरबार में पहुंचने लगे। संवादहीनता ने इन दूरियों को खाई में बदल दिया।

अखिलेश का तुरुप जब आएगा, तब आएगा, लेकिन सपा और मुलायम के लिए तो अखिलेश से बड़ा तुरुप कोई नहीं, न हो सकता है। मुलायम-शिवपाल भी इसे समझते हैं। शिवपाल ने जो इटावा में दोहराया, उसके मायने भी यही हैं।

 मुख्तार, अमनमणि, मुकेश श्रीवास्तव ही नहीं, इन जैसे और ऐसे-वैसे कई अनपेक्षित, उपेक्षित, कुंठित, दंडित चेहरे सपा की कतार में हैं। इन चेहरों से शिवपाल की मुख्तारी तो बढ़ जाएगी, लेकिन पहले पार्टी, फिर सूबे की सियासत का क्या होगा? इन हालात में, मुलायम अपना तुरुप छोड़कर आत्मघाती नियति क्यों चुन रहे हैं, यह एक बड़ा सियासी सवाल है?

उदारता के साथ मुलायम का अच्छा या बुरा पक्ष यह भी है कि जिस पर मेहरबान होते हैं, उसके लिए चट्टान बन जाते हैं। फिर आरोप-प्रत्यारोप, पात्रता-अपात्रता अथवा अपनी छवि की भी परवाह नहीं करते । अमरसिंह, शिवपाल यादव से लेकर गायत्री प्रजापति तक इसकी मिसाल हैं।

कई सवाल, कई चर्चाएं

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डेमो

अखिलेश को यह प्रवृत्ति पिता से विरासत में मिली है। वे ‘अखिलेशवादी’ निष्कासित युवा नेताओं की वापसी के लिए मुलायम की तरह ही अड़े हैं। अब सवाल यह भी है कि गायत्री प्रजापति के लिए सारे अपयश झेलकर भी जो मुलायम दरियादिल बने रहे, वे अपने ही बेटे के लिए निष्ठुर कैसे हो सकते हैं? 

सवाल कई हैं, तो चर्चाएं भीं। क्या वे वास्तव में अपनी उपेक्षा से आहत हैं? क्या उन पर कोई दबाव है? क्या उनके आसपास जो हैं, उनका रिमोट कहीं और है? क्या सीबीआई का तोता अब भी उन्हें परेशान कर सकता है? लोहे-से इरादे वाले मुलायम की आखिर मजबूरी क्या है?

जवाब तलाशे जाते रहेंगे। अपने इम्तिहान में अखिलेश अपनी राह ले ही लेंगे। अपनी टीम वे बना चुके हैं। अब घर भी अपना है, प्रचार केलिए दफ्तर भी। यह इरादा भी जता चुकेहैं कि मुझे किसी का इंतजार किए बिना प्रचार पर निकलना होगा। 

तीन पीढ़ी तक परिवार केनिर्विवाद रहने की मुलायम की गर्वानुभूति इसमें आड़े नहीं आएगी। लेकिन, सियासी इम्तिहान में सब अलग-अलग परचे हल करते दिखेंगे। जो सवाल स़मान होंगे, उनकेजवाब भी अलग-अलग होंगे। मुलायम के लिए यक्षप्रश्न रामगोपाल खड़ा कर ही चुके हैं, जो जनता आपको पूजती है, सपा के पतन केलिए भी आपको ही जिम्मेदार मानेगी।

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