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ढांचा ध्वंस पर फैसला बढ़ाएगा सियासी हलचल
Wed, 26 Aug 2020 06:24 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Wed, 26 Aug 2020 06:24 PM IST
सार
राजनीतिक बिसात पर सजेंगी गोटियां, 30 सितंबर तक सुनाया जाना है फैसला
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supreme court
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण का काम शुरू होने की बाधाएं दूर हो गई हैं, पर अयोध्या मामले में सियासी चालों पर अभी पूरी तरह विराम नहीं लगा है। ढांचा ध्वंस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई कोर्ट को 30 सितंबर तक फैसला सुनाने को कहा है। यह फैसला प्रदेश के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मचाए बिना नहीं रहेगा।
मंदिर के पक्ष में आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का तकनीकी व व्यावहारिक कारणों से सभी राजनीतिक दलों ने स्वागत किया। गत 5 अगस्त को मंदिर निर्माण की शुरुआत पर भी भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों के नेताओं ने स्वागत करते हुए सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दी हों, लेकिन ढांचा ध्वंस मामले में आने वाले फैसले के सहारे सियासी दल एक-दूसरे पर निशाना साधे बिना नहीं रहने वाले हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि दोनों मामलों में अंतर है। वह मामला विवादित स्थल पर मंदिर-मस्जिद से जुड़ा था। फिर फैसला सर्वोच्च न्यायालय का था। ऐसे में भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों के सामने न्यायालय और हिंदुओं की नाराजगी का खतरा था। पर, ढांचा ध्वंस मामले की प्रकृति बिल्कुल अलग है। इसमें लालकृष्ण आडवाणी, विनय कटियार, उमा भारती सहित अन्य लोग शामिल हैं। इस फैसले का अयोध्या स्थित स्थल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है, लेकिन फैसले से वोटों के सरोकारों को सान देने का पूरा मौका है। ऐसे में राजनीतिक दल सियासी गोटें चले बिना नहीं रहेंगे।
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कारण ये भी ः आरोपी यदि बरी हो जाते हैं तो भाजपा, विहिप और संघ परिवार इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस सहित अन्य विरोधी दलों पर हमला बोले बिना नहीं रहेगा। वे इस मामले को कांग्रेस की तुष्टीकरण और हिंदुत्व विरोधी राजनीति का उदाहरण बताते हुए कांग्रेस की हिंदुत्व पर नरम छवि बनाने के प्रयास को निशाना बनाने की कोशिश करेंगे। यह संदेश देने की भी कोशिश होगी कि हिंदुत्व के सरोकारों से जुड़े सवाल पर भाजपा और संघ परिवार ने किस स्तर तक जाकर काम किया। पर फैसला कुछ और आता है तो विपक्ष की तरफ से भाजपा को घेरने की कोशिश होगी। खासतौर से प्रदेश में खोई जड़ों को तलाश कर रही कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि उसकी तत्कालीन केंद्र सरकार ने किस स्तर तक ढांचा बचाने का प्रयास किया। प्रदेश में उस समय भाजपा सरकार के कारण वे ढांचा बचा भले नहीं पाए, लेकिन ऐसा करने वालों को सजा दिलाने की नींव उन्होंने ही रखी। ऐसा करके कांग्रेस मुस्लिमों के बीच भी अपनी जगह मजबूत बनाने की कोशिश कर सकती है। अन्य दल भी इस मुद्दे पर भाजपा के विरोध में मुखर होकर सियासी समीकरण दुरुस्त करने की कोशिश करेंगे।
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मंदिर के पक्ष में आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का तकनीकी व व्यावहारिक कारणों से सभी राजनीतिक दलों ने स्वागत किया। गत 5 अगस्त को मंदिर निर्माण की शुरुआत पर भी भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों के नेताओं ने स्वागत करते हुए सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दी हों, लेकिन ढांचा ध्वंस मामले में आने वाले फैसले के सहारे सियासी दल एक-दूसरे पर निशाना साधे बिना नहीं रहने वाले हैं।
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राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि दोनों मामलों में अंतर है। वह मामला विवादित स्थल पर मंदिर-मस्जिद से जुड़ा था। फिर फैसला सर्वोच्च न्यायालय का था। ऐसे में भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों के सामने न्यायालय और हिंदुओं की नाराजगी का खतरा था। पर, ढांचा ध्वंस मामले की प्रकृति बिल्कुल अलग है। इसमें लालकृष्ण आडवाणी, विनय कटियार, उमा भारती सहित अन्य लोग शामिल हैं। इस फैसले का अयोध्या स्थित स्थल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है, लेकिन फैसले से वोटों के सरोकारों को सान देने का पूरा मौका है। ऐसे में राजनीतिक दल सियासी गोटें चले बिना नहीं रहेंगे।
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कारण ये भी ः आरोपी यदि बरी हो जाते हैं तो भाजपा, विहिप और संघ परिवार इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस सहित अन्य विरोधी दलों पर हमला बोले बिना नहीं रहेगा। वे इस मामले को कांग्रेस की तुष्टीकरण और हिंदुत्व विरोधी राजनीति का उदाहरण बताते हुए कांग्रेस की हिंदुत्व पर नरम छवि बनाने के प्रयास को निशाना बनाने की कोशिश करेंगे। यह संदेश देने की भी कोशिश होगी कि हिंदुत्व के सरोकारों से जुड़े सवाल पर भाजपा और संघ परिवार ने किस स्तर तक जाकर काम किया। पर फैसला कुछ और आता है तो विपक्ष की तरफ से भाजपा को घेरने की कोशिश होगी। खासतौर से प्रदेश में खोई जड़ों को तलाश कर रही कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि उसकी तत्कालीन केंद्र सरकार ने किस स्तर तक ढांचा बचाने का प्रयास किया। प्रदेश में उस समय भाजपा सरकार के कारण वे ढांचा बचा भले नहीं पाए, लेकिन ऐसा करने वालों को सजा दिलाने की नींव उन्होंने ही रखी। ऐसा करके कांग्रेस मुस्लिमों के बीच भी अपनी जगह मजबूत बनाने की कोशिश कर सकती है। अन्य दल भी इस मुद्दे पर भाजपा के विरोध में मुखर होकर सियासी समीकरण दुरुस्त करने की कोशिश करेंगे।