गैंगरेप: किसी 'खास' को बचा रही यूपी पुलिस?
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मोहनलालगंज मामले में फॉरेंसिक रिपोर्ट से पुलिस के दावों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट की धज्जियां उड़ने के बाद यह सवाल उठ गया है कि आरोपी रामसेवक ने किसके कहने पर सारा आरोप खुद पर ले लिया।
उस पर पुलिस का दबाव था या मुख्य आरोपियों का। ऐसे ढेरों सवाल हैं जिसकी सच्चाई जानने के लिए आला अफसर मानने लगे हैं कि रामसेवक का पॉलीग्राफ या नारको टेस्ट कराया जाना चाहिए।
फॉरेंसिक रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि होने और उसमें एक से अधिक लोगों के शामिल होने की बात सामने आने के बाद पुलिस के ये दावे झूठे साबित हो गए हैं कि महिला के साथ दुराचार नहीं हुआ था और वारदात अकेले रामसेवक ने अंजाम दी।
रामसेवक ने ऐसा क्यों किया?
पुलिस ने अपने दावों को मजबूत करने के लिए न सिर्फ रामसेवक के अपराध कुबूलने का बयान दिया बल्कि यह भी बताया कि आरोपी ने अदालत में हुए कलमबंद बयान में भी यही कहा है।
अब बदले हालात से इतना तो साफ हो गया है कि रामसेवक ने झूठ बोला। ऐसा उसने क्यों किया, इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं।
क्या उस पर पुलिस का दबाव था? अगर ऐसा था तो पुलिस किसको बचाने के लिए उस पर दबाव बना रही थी?
अगर पुलिस का दबाव नहीं था तो फिर रामसेवक ने खुद पर सारा आरोप क्यों लिया? क्या उस पर मुख्य आरोपियों का दबाव था या फिर उसने मुख्य आरोपियों के डर से ऐसा किया?
पुख्ता हुए, पुलिस पर उठे सवाल
रामसेवक के सच को जानने के लिए उसका पॉलीग्राफ टेस्ट या नारको टेस्ट कराने का ही रास्ता बच रहा है। उच्च स्तर पर रामसेवक का पॉलीग्राफ टेस्ट कराने की बात पर पहले से ही मंथन चल रहा था, लेकिन उस पर फैसला नहीं हो सका था।
फॉरेंसिक रिपोर्ट ने जिस तरह से पुलिस की थ्योरी और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर खड़े सवालों को पुख्ता किया है उससे सरकार के सामने दो ही रास्ते बच रहे हैं।
या तो सरकार पीड़ित परिवार की मांग को मद्देनजर रखते हुए मामले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश करे या फिर सच्चाई जानने के लिए राम सेवक का पॉलीग्राफ टेस्ट कराए।
मामले पर अपर महानिदेशक कानून-व्यवस्था मुकुल गोयल का कहना है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट में दूसरे तथ्य सामने आने के बाद तो रामसेवक का पॉलीग्राफ टेस्ट कराया जाना चाहिए।