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नागरिकता कानून : हवा-हवाई साबित हुई पुलिस की तैयारी, धरी रह गई सारी कवायद, ये रही वजह
Fri, 20 Dec 2019 10:43 PM IST
Avdhesh Kumar
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Fri, 20 Dec 2019 10:43 PM IST
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पुलिस फोर्स
- फोटो : अमर उजाला
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नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में पिछले सप्ताह शुरू हुए प्रदर्शनों केबाद प्रदेश में 19 और 20 दिसंबर को बड़े विरोध-प्रदर्शन की सूचनाएं पहले से आ रही थीं। लेकिन, पुलिस की आधी-अधूरी तैयारी और निर्णय न ले पाने की क्षमता के चलते कई जिले हिंसा की चपेट में आ गए।
इन दो दिनों के प्रदर्शन को लेकर खुफिया विभाग ने आगाह भी किया था। अधिकतर जिलों ने धारा 144 लागू करके जुलूस-प्रदर्शन पर रोक लगा दी, लेकिन प्रदर्शन न हो, इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। समुदाय विशेष में गुस्से की वजह, गुस्से को शांत करने के तरीकों और प्रदर्शन को रोकने के लिए निरंतर संवाद की कमी भी देखी गई। यही वजह रही कि प्रदर्शनकारियों ने कानून हाथ में लेकर हिंसा फैलाई।
पुलिस को कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए डिजिटल मैकेनिज्म पर पूरा भरोसा था। इसके लिए प्लान सी एप तैयार किया गया था, जिसमें हर वर्ग के 11 लाख से अधिक लोगों को शामिल किया गया था। इनका काम किसी भी तरह की सूचना को पुलिस के साथ साझा करना और जरूरत पड़ने पर पुलिस का संदेश लोगों तक पहुंचाना था। साथ ही हर थाना स्तर पर डिजिटल वालंटियर ग्रुप बनाए गए थे, जिसमें क्षेत्र के संभ्रांत लोगों को शामिल किया गया था।
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इंटरनेट ठप होने से ये दोनों बड़े तंत्र पूरी तरह फेल हो गए। सूचनाएं एकत्र करने के लिए पुलिस का सबसे पुराना और कारगर तरीका मुखबिर तंत्र हुआ करता था, लेकिन यह भी पूरी तरह फेल साबित हुआ। कुछ ही दिन पहले प्रदेश में सभी जिलों के लिए नोडल अधिकारियों की तलाश होती रही। अलग-अलग जिलों के लिए बनाए गए नोडल अधिकारी कहां थे? इसकी सुध किसी ने नहीं ली।
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इन दो दिनों के प्रदर्शन को लेकर खुफिया विभाग ने आगाह भी किया था। अधिकतर जिलों ने धारा 144 लागू करके जुलूस-प्रदर्शन पर रोक लगा दी, लेकिन प्रदर्शन न हो, इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। समुदाय विशेष में गुस्से की वजह, गुस्से को शांत करने के तरीकों और प्रदर्शन को रोकने के लिए निरंतर संवाद की कमी भी देखी गई। यही वजह रही कि प्रदर्शनकारियों ने कानून हाथ में लेकर हिंसा फैलाई।
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पुलिस को कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए डिजिटल मैकेनिज्म पर पूरा भरोसा था। इसके लिए प्लान सी एप तैयार किया गया था, जिसमें हर वर्ग के 11 लाख से अधिक लोगों को शामिल किया गया था। इनका काम किसी भी तरह की सूचना को पुलिस के साथ साझा करना और जरूरत पड़ने पर पुलिस का संदेश लोगों तक पहुंचाना था। साथ ही हर थाना स्तर पर डिजिटल वालंटियर ग्रुप बनाए गए थे, जिसमें क्षेत्र के संभ्रांत लोगों को शामिल किया गया था।
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इंटरनेट ठप होने से ये दोनों बड़े तंत्र पूरी तरह फेल हो गए। सूचनाएं एकत्र करने के लिए पुलिस का सबसे पुराना और कारगर तरीका मुखबिर तंत्र हुआ करता था, लेकिन यह भी पूरी तरह फेल साबित हुआ। कुछ ही दिन पहले प्रदेश में सभी जिलों के लिए नोडल अधिकारियों की तलाश होती रही। अलग-अलग जिलों के लिए बनाए गए नोडल अधिकारी कहां थे? इसकी सुध किसी ने नहीं ली।
कुंभ के आयोजन और अयोध्या के फैसले पर पीठ ठोकती रही पुलिस
दरअसल दो बड़े मौकों कुंभ के आयोजन और अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दौरान की गई व्यवस्था को ही पुलिस ने अपनी नजीर मान लिया। हर मौके के लिए उसी रणनीति को अपनाने लगी। नतीजा यह हुआ कि सेक्टर और जोन की जो रणनीति कारगर साबित हुई थी, वह नागरिकता संशोधन कानून के विरोध-प्रदर्शन को रोकने में बुरी तरह नाकाम साबित हुई।
डीजीपी को खुद उठाना पड़ा डंडा, उतारनी पड़ी मुख्यालय की टीम
लखनऊ में बृहस्पतिवार को हालात बेकाबू हुए तो डीजीपी ओम प्रकाश सिंह खुद सड़क पर डंडा लेकर उतरे। उनके साथ पुलिस मुख्यालय की पूरी फौज उतर आई।
एडीजी स्तर के तीन अधिकारियों पीवी रामाशास्त्री, विनोद कुमार सिंह और एसएन साबत, आईजी रैंक के एसके भगत, प्रवीण कुमार और नवनीत सिकेरा, डीआईजी स्तर के पांच अधिकारियों अखिलेश कुमार, राजेश मोदक, विजय भूषण, राकेश शंकर और केबी सिंह के अलावा एसपी रैंक के कई अधिकारियों ने राजधानी के अलग-अलग हिस्सों में मोर्चा संभाला, तब जाकर स्थिति संभली।
एडीजी स्तर के तीन अधिकारियों पीवी रामाशास्त्री, विनोद कुमार सिंह और एसएन साबत, आईजी रैंक के एसके भगत, प्रवीण कुमार और नवनीत सिकेरा, डीआईजी स्तर के पांच अधिकारियों अखिलेश कुमार, राजेश मोदक, विजय भूषण, राकेश शंकर और केबी सिंह के अलावा एसपी रैंक के कई अधिकारियों ने राजधानी के अलग-अलग हिस्सों में मोर्चा संभाला, तब जाकर स्थिति संभली।