{"_id":"7b2e291e405734ab5a1b2a512670e15d","slug":"play-at-bali-prekshagrih-16","type":"story","status":"publish","title_hn":"तंगी में खानम बी ने नहीं छोड़े अपने उसूल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
तंगी में खानम बी ने नहीं छोड़े अपने उसूल
नीरज 'अम्बुज'/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 24 Jun 2014 11:13 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आजादी से पहले मुजरों से खानम बी की कोठी गुलजार रहती थी। यही उसकी रोजी-रोटी का जरिया भी था।
विज्ञापन
इधर अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिली। उधर, मुल्क तक्सीम हो गया। सभी नवाब व रोअसा (पैसे वाले) अपनी जायदाद बेचकर पाकिस्तान चले गए। पहले तो तालुकेदार बनाए गए, फिर उन्हें भी खत्म कर दिया गया।
कोठों की रौनक पर अंधेरे काबिज होने लगे। यहां तक की फांके पड़ने की नौबत आ गई। कोठों पर लोग आते तो थे, पर तवायफों से जिस्म फरोशी की उम्मीद लेकर, जो खानम बी को कतई मंजूर न था।
विज्ञापन
तंगी के बावजूद उसने उसूलों से समझौता नहीं किया। खानम बी पूरा मोहर्रम और महीने भर के रोजे रखती। वक्त का कारवां कुछ आगे बढ़ा और खानम बी के हालात बदल गए।
विज्ञापन
सरकार ने कथक सिखाने की जिम्मेदारी खानम और कोठे की तवायफों को सौंप दी, जो उनके गुजारे का रास्ता बना।
हिंदी उर्दू साहित्य अवॉर्ड कमेटी के तीन दिवसीय साहित्यिक सम्मेलन के अंतिम दिन सोमवार को तवायफों की ये कहानी संत गाडगे प्रेक्षागृह में मंचित नाटक ‘खानम बी’ में उभरी।
एसएन लाल के लिखे नाटक का निर्देशन मिद्दत खान ने किया। नाटक में मीर जाफर अब्दुल्ला, नवाब मसूद अब्दुल्ला ने नवाबों का किरदार निभाया जबकि शबी जाफरी ने खानम बी के रोल के साथ न्याय किया।
इसके अलावा इदरीस मोहन, भारती, जावेद खान, फरीद, शकील, विनय घोषाल, अली अब्बास, अल्तमश, आफरीन, वर्षा व असिया ने भी अभिनय किया। लाइटिंग एम हफीज, मेकअप उपेंद्र सोनी व मंच सज्जा शकील की रही।